Sunday, September 13, 2026
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अस्कोट-आराकोट अभियान यात्रा- 2024 22 जून, 2024, ।। बिज्यूला की रात में चक्रव्यूह नाटक

अस्कोट-आराकोट अभियान यात्रा- 2024
22 जून, 2024
बिज्यूला की रात में चक्रव्यूह नाटक । 

@यात्रा संस्मरण : dr. Arun kuksal 

‘और वो देखिए, पंवाली कांठा बुग्याल। आखिर हम पहुँच ही गए! अब समझो एक लतड़ाग…’ राहुल ने लगभग चिल्लाते हुए कहा है।
‘नहीं बच्चू, वो तो रास्ते की छानियाँ है। उसके आगे की तीखी चढ़ाई और जंगल वाली पहाड़ी के पार है, पंवाली। कितना आगे कह नहीं सकता। अगर, जल्दी रात और बारिश नहीं हुई तो पंवाली पहुँच सकते हैं, नहीं तो इन्हीं छानियों में लमलेट होना पडेगा…’ ललिता सलाहकार की भूमिका में कहते हैं।

‘‘वो छानियाँ यहाँ से 2 किलोमीटर होगीं। मैं कहता हूँ।

‘‘नहीं, 3 किलोमीटर से कम नहीं हैं। नीचे उतर कर फिर गधेरे पार वाली चढ़ाई यहाँ से दिख नहीं रही है। इसलिए, आपको वहाँ तक पहुँचने की दूरी कम लग रही है।’’ ललिता अपनी स्वाभाविक मुस्कान के साथ कहते हैं।

ये मट्या बुग्याल की धार है। नीचे की ओर दूर तक पसरा मट्या बुग्याल पीछे छोड़ आये क्वीणी बुग्याल से ज्यादा फैला और समतल है। हमारे दायीं ओर नीचे बुग्याल की तलहटी में सैकडों भेड़-बकरियों और घोड़े-खच्चर चरते-चरते अपनी छानियों की ओर खिसक रहे हैं। उनका आज का मुकाम पूरा होने को है।

Panwali kantha
Panwali kantha

हम ऊँची धार से उन जानवरों के साथ के पशुचारक से पंवाली का रास्ता पूछते हैं। लेकिन, आगे के रास्ते की ओर उसके हाथ के इशारे ही हमें दिखाई दे रहें है। उसकी आवाज बस घूं-घूं गूंजती हुई ही हमारे हिस्से है।

रुमक (शाम के तुरंत बाद) होने वाली है। कई लकीरनुमा पगडंडियाँ हमारे आगे ऊपर-नीचे की ओर हैं। हम उस पशुचारक के हाथ के इशारे वाले रास्ते की ओर हैं। श्रेष्ठ और राहुल हमारे आज के स्वः घोषित गाइड़ पहले से ही हैं। ये अलग बात है कि उनको समय-समय पर सही रास्ते पर हम ही लाते आयें हैं।

हमारे नीचे की ओर कोई पशुचारक अपनी भैंसों को वापस छानियों की ओर चलने के लिए मोड़ रहा है। उसका कुत्ता उसकी साहयता में भैंसों के आगे भौंकते हुए उनसे वापस चलने गुहार लगाता हुआ ‘चल खुसरो, घर अपने’ की मुद्रा में यहाँ-वहाँ भाग रहा है। भैंसे हैं कि वापस जाने की मूड में नहीं है। हम उस पशुचारक से आगे का रास्ता पूछने के लिए अपनी-अपनी जगह खड़े हो गए हैं।

कुत्ते को अपनी ओर भौंकते हुए मुझे लगा कि वह हमसे कह रहा है कि, ‘‘आप लोग अपना रास्ता लगो, हमको देखकर अपना समय खोटी मत करो, बहुत दूर जाना है आपको और बारिश भी आने को है। ये तो रोज की बात और काम है, हमारा।’’

‘‘आपको बस ये रास्ता नहीं छोड़ना है। बस नीचे उतरते जाओ, वो सामने बिज्यूला खर्क की छानियाँ हैं। वहाँ से आगे उस पहाड़ी के पीछे है, पंवाली।’’ उस पशुचारक की नीचे से आती तेज आवाज़ पूरी घाटी में गूंजने के बाद हमारे पास आ रही हैं।

हमारे आस-पास कोहरे की तो ऊपर की ओर बादलों की आवा-जाही और घनघोर होती जा रही है। श्रेष्ठ और राहुल को बार-बार हिदायत है कि वो हमसे इतना आगे चले कि हमको दिखते रहें। रास्ता भटकने और जानवरों का खतरा तो है ही। पर वो कहाँ मानने वाले?

‘‘हे! भैजी, बीड़ी पैणा’’ मैं अपने रुकशैक को पास के पत्थर पर रखते हुए उनसे कहता हूँ।

‘‘सिगरट त आप जन बड़ा आदिम पैंदा, हम गरीब-गुरब्बा बीड़ी स्य हि काम चलोंदा, भैजी। पंवाली जाणा, देर करियेली आपन। यख्खी रुक जावा। अगनै चढ़ै भारि च। रात ह्वै गि, बरखा कु झमडाट भि हौंण वाळि च।’’ उनमें एक ने ये बोलते हुए बीड़ी के तीन गहरे कश भी लगा लिए हैं।

‘‘कितना किलोमीटर होगा यहाँ से पंवाली’’ लखपत ने उनसे पूछा है।

‘‘साढ़े तीन किलोमीटर। यहाँ से चढ़ाई सख्त़ है। होने को कुछ भी नहीं हुआ इतना दूर।’’ यह बोलते हुए उस सज्जन ने अपनी बीड़ी खत्म कर उसे जमीन के अंदर एक हाथ जोर से दबाया है।

‘‘यहाँ की ऊँचाई क्या होगी, भैजी? मैं उससे पूछता हूँ।

‘‘बिज्यूला खर्क समुद्रतल से 3258 मीटर की ऊँचाई पर है।’’ वह व्यक्ति पूरे विश्वास से कहता है।

पंचों की राय से यहीं बिज्यूला खर्क में रुकने का निर्णय हुआ है। यहां भगवान सिंह की दो कमरों की छानी है। कमरे की चारों दीवारों से सट कर सामानों के ढे़र हैं। जिनमें आपस में कोई साम्य नहीं है। गद्दे, कम्बल, घास, लकड़ियाँ, कुदाल-फावड़ा और खूंटियाँ बनी लकड़ी-पत्थर के सिरों पर लटके बर्तन। कमरे के बीचों-बीच खुला चूल्हा है। उसके दोनों ओर की जगह फिलहाल लेटने के लिए है। बगल वाला कमरा भगवान सिंह के निजी इस्तेमाल के लिए है। उसमें चार मुहँ वाला खूब फैला चूल्हा आग की लपटों से घिरा है। इस समय, वहां दाल, भात, सब्जी और रोटी बनाने में भगवान सिंह की बालिका सुनीता मददगार की भूमिका में है।

दोनों कमरों की बीच की दीवार पर आदान-प्रदान के लिए एक खुली खिड़की है। उसी में एक सोलर लाइट वाला बल्ब तेज चमक से दोनों कमरों को भरपूर उजाला दे रहा है।

एक तरफ़ राहुल, श्रेष्ठ और लखपत अधलेटे हैं। सीनियर सिटीजन होने के नाते ठंड से ज्यादा सुरक्षित और सम्मानजनक जगह पर मेरे और ललिता के कब्जे़ में है। बाहर बादलों की तीव्र गड़गडाहट और बारिश की बौछारों ने चेता दिया कि यहाँ रुक कर हमने सही निर्णय लिया है। जून के महीने की ये ठण्ड तो जाड़ों में क्या हाल होते होंगे?

लखपत, श्रेष्ठ और राहुल मंझे हुए अभिनयकर्ता हैं। पिता-पुत्र की जोड़ी लखपत और श्रेष्ठ ने ‘चक्रव्यहू’ नाटक में अभिमन्यु का रोल कई बार किया है। समय का सदुपयोग करते हुए तीनों गायन शैली के ‘चक्रव्यूह’ नाटक से सारे वातावरण को गुंजायमान कर रहे हैं। थाली, चम्मच, कटोरा , गिलास, तसला, कनस्तर ने वाद्ययंत्रों का रूप ले लिया है।

आवाज़े सुनकर बगल पड़ोस की छानियों के दो व्यक्ति भी हमारे साथ दर्शक दीर्घा में सिमटकर बैठ गए हैं। छोटी बालिका सुनीता और भगवान सिंह बीच की खिड़की से इस सांस्कृतिक संध्या का आनंद ले रहे हैं। भगवान सिंह बीच-बीच में जलती लकड़ी की आंच को जांचते हुए पकते खाने की स्थिति देखने पीछे भी पलट जाते हैं।

छानी के इस कमरे में इतनी जगह नहीं है कि यह नाटक नाच कर किया जा सके। पाडंव लीला का यह नाटक गढ़वाल में बेहद लोकप्रिय है।

कथा महाभारत में अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेदने की है। लखपत सभी पात्रों यथा- अभिमन्यु, युद्धिष्ठर, भीम, नकुल के सभी संवादों को पूरी भाव-भंगिमा से गा कर अभिनीत करते हैं तो उसके बाद श्रेष्ठ और राहुल उसमें लय-ताल देते हैं। ललिता भी बीच-बीच में उत्साह से नाचने को जैसे तैयार हो जाते हैं।

‘‘मिन त सोची कि जागर (देव पूजन) वाळा यी कु जी अयै ह्वळा।’’ मेरे बगल में बैठा व्यक्ति धीरे से मुझसे कहता है।

दर्शकों की कई फरमाइशों से होते हुए लगभग 2 घण्टे यह सांस्कृतिक संध्या चली है। दर्शकों की जबरदस्त मांग के बाद भी थके हैं इसलिए रात्रि भोजन के बाद यह गीतों का आयोजन नहीं हो पा रहा है। फिर कभी के वायदे के साथ, भोजन के बाद सभी बेसुध होकर लमलेट हो गए हैं।
23 जून, 2024
कोशिश है कि 6 बजे से पहले आगे की ओर चल देंगे। अभी 5 बजे भगवान सिंह ने गरम पानी और चाय हम दे दी है। बुग्यालों में सुबह का उजाला जल्दी हो जाता है। उसी तरह शाम के बाद रात भी झप्प से जल्दी हो जाती है।

छानी के कमरे से बाहर निकलते ही एक ही कतार में खड़ी भैंसे अवा्क नजरों से हमें देख रही हैं, जैसे कह रही हों-

‘‘कौन देश से हो आये हो महराज?’’

भगवान सिंह की 7 भैंसे हैं। इसी तरह अन्य पशुचारकों के पास हैं। कुल मिलाकर 50 भैंसे और अन्य जानवर इस खर्क में हैं। यहाँ से कुछ ही दूर पर पत्थरों से ढ़के कई ढे़र हैं। पता चला मुसलमान गूर्जरों का वह कब्रिस्तान है। मोबाइल के सिगनल केवल उसी कब्रिस्तान के पास आते हैं।

हमें समझा दिया गया है कि शौच के लिए नीचे की ओर सूखे गधेरे के पार जाना है। वहीं पानी है लेकिन बहुत कम धार है उसकी। किसी तरह उसे बचाया गया है। इसलिए ध्यान रहे वहाँ गंदगी और कोई टूट-फूट नहीं करनी है।

‘‘आप लोग पानी के श्रोत्र के नजदीक क्यों नहीं बनाते हैं अपनी छानियाँ?’’ मैं पास खड़े सज्ज़न से पूछता हूँ।

‘‘ बैठिए, मैं बताता हूँ। हम यहाँ पशुओं को चराने आते हैं। अतः ऊँची धार से जहाँ से चारों ओर दूर तक दिख जाए वहीं छानियाँ बनाना उपयुक्त होता है। इससे हम अपने जानवरों और जंगली जानवरों पर एक साथ नज़र रख पाते हैं। पानी के श्रोत्र अक्सर नीचे और संकरी जगह पर होते हैं। फिर एक बात बड़ी है कि ये ही पानी जंगली जानवर भी इस्तेमाल करते हैं। इसलिए इनकी ओर उनका आना-जाना दिन में कई बार होता है। इसीलिए, बचाव और जरूरत के हिसाब से छानियां को धार में ही बनाया जाता है…’’ दिलवर नाम के सज्जन ने विस्तार से समझाया है…..

यात्रा जारी है….
अरुण कुकसाल
यात्रा के साथी- श्रेष्ठ वर्धन राणा, राहुल राणा, लखपत सिंह राणा, ललिता प्रसाद भट्ट।
फोटो सौजन्य – राहुल राणा, श्रेष्ठ वर्धन राणा और लखपत सिंह राणा

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