शिक्षा पर बनी फिल्म “विद्या ” : सपनों की उड़ान
@Dr Nandkishor Hatwal

गत रविवार 23 फरवरी को सेंट्रियो मॉल देहरादून पीवीआर में शिक्षा पर आधारित फिल्म ‘विद्या : सपनों की उड़ान’ का प्रीमियर शो हुआ।
फिल्म की कहानी का विषय हमारी सार्वजनिक शिक्षा और उसकी चिंताएं हैं। फिल्म की कथानुसार गाँव के कुछ बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के लिये बाहर जाते हैं और फिर वापस लौटकर गांव की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने का बीड़ा उठाते हैं। गांव में जागरूकता पैदा करना, प्रशासन एवं जनप्रतिलिनधियों का सहयोग प्राप्त करना, षडयंत्रकारी तत्वों से जूझना और इस राह की तमाम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करना इस फिल्म में दिखाया गया है।

इस फिल्म से मेरा कुछ खास लगाव भी है। शिक्षक होने से शिक्षा के मुद्दे मुझे खींचते-झकझोरते हैं। कलामाध्यमों के अधिकाधिक प्रयोग से शिक्षा को सरस, रूचिपूर्ण और लोकप्रिय बनाने के सपने मुझे भी दिखते रहते हैं। पंद्रह-बीस साल पहले मैंने एक नाटक लिखा था ‘सपनो की उड़ान’। इस नाटक का बच्चों से मंचन भी करवाया था। फिल्म के निर्देशक संजीव दास और कार्यकारी निर्माता सुदीप जुगराण इस फिल्म को उस नाटक से प्रेरित बात रहे हैं। एक शिक्षक होने के नाते मेरे लिए यह उत्साहजनक और सपनो को आकार मिलना सरीखा है। शिक्षा को लेकर की गई हमारी रचनात्मक चिंताओं को यदि विस्तार मिलता है तो यह हमारे लिए सुकूनप्रद होता है। उस नाटक में लिखे गए एक गीत का प्रयोग भी इस फिल्म में प्रभावशाली तरीके से किया गया है। लगाव का दूसरा कारण वाण गांव भी है। वहां मैं जितनी बार गया वापस आने का मन नहीं हुआ।

जनपद चमोली के अंतिम छोर पर बसे इसी वांण गांव में पूरी फिल्म की शूटिंग हुई है। यह गांव राजजात का अंतिम ग्रामीण पड़ाव भी है। इसके बाद निर्जन पड़ाव शुरू हो जाते हैं। वांण गांव के नैसर्गिक सौंन्दर्य के विविध आयामों को जिस तरह पर्दे पर उतारा गया है वह अविभूत करने वाला है। सघन हरियाली, जंगल, देवदार, लाटू मंदिर, रीतिरिवाज, वेशभूषा फिल्म को दर्शनीय बना देती है। बर्फ की चादर ओढ़े वांण गांव का ड्रोन शॉट तो दर्शकों को सम्मोहित कर देता है।

शिक्षा हमारे समाज का महत्वपूर्ण और बड़ा मुद्दा है। उत्तराखण्ड हिमालय के संदर्भ में यह ममला और अधिक चुनौतीभरा है। लेकिन इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। दृश्य माध्यमों के इस दौर में शिक्षा, सार्वजनिक शिक्षा, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों की शिक्षा की चुनौतियां, विमर्श और सरोकारों के दृश्य लगभग अदृश्य रहते हैं। चूंकि शिक्षा मनोरंजन नहीं होती इसलिए मनोरंजन का सर्वाधिक प्रभावशाली फिल्म का माध्यम भी शिक्षा के मुद्दों से दूरी बना कर रखता है। ऐसे समय में यदि शिक्षा को केन्द्र में रखकर कोई फिल्म बनाई जाती है तो निश्चित ही यह काबिले तारीफ और साहसिक कदम है। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को सार्वजनिक शिक्षा की महत्ता और चुनौतियों पर भी सोचने को वाध्य करती है। इसके लिए रियल कैलिबर प्रोडक्शंस के तेजोराज पटवाल, व्यंकट पुण्डीर, सतीश शर्मा, फिल्म के निर्देशक : संजीव दास, कार्यकारी निर्माता सुदीप जुगरान बेहद सुंदर कार्य किया है।







