Saturday, March 7, 2026
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नेहरू-मोदी और हिन्दू-इस्लाम से बहुत बड़ा है भारत

नेहरू-मोदी और हिन्दू-इस्लाम से बहुत बड़ा है भारत

By – Batrohi

तब मोदी युग शुरू नहीं हुआ था।
अल्मोड़ा के किसी कार्यक्रम में भाग लेकर मैं और मेरा रंगकर्मी छात्र ज़हूर आलम सरकारी बस से नैनीताल लौट रहे थे। हम लोग बाकी लोगों की तरह अपनी-अपनी रुचि के विषयों को लेकर बातें कर रहे थे, जाहिर है, बस के अन्य सहयात्रियों की चर्चाओं से बेखबर। ज़हूर के साथ मेरे अध्यापन के अलावा अनेक दूसरे रिश्ते रहे हैं। उसका बचपन उसी बाजार के मुहल्लों में बीता है जहाँ मेरा भी बचपन और युवाकाल बीता था। हम उस दौर के संस्कारों की उपज थे जब हमारे पड़ोसी घरों के साथ न सिर्फ खान-पान का लेन-देन होता था, सुख-दुख में लगातार बिना कहे सबकी आपसी भागीदारी रहती थी। चाचा-मामा के संबोधनों से हम आपस में बातें करते थे जो तब तक चलते रहे जब तक हम पड़ोसी रहे।
मकबूल हुसैन हमारे तत्काल पड़ोसी थे जो दर्जी का काम करते थे। आदमी की जरूरतों के हिसाब से ठिकाने बदलते ही हैं; मकबूल भाई का भी कुनबा बढ़ा, बड़े मकान की जरूरत हुई और एक दिन उन्होंने अपना छोटा-सा घर पास में ही बना लिया। यही हाल हमारा था।
हमारे ही मुहल्ले में एक और मशहूर टेलर एम अली थे जो बचपन से ही मेरे साथ जुड़े हुए और मेरी कहानियों के पाठक थे। जब मैं एमए में पढ़ रहा था, बार-बार वह मुझे छेड़ते कि मियां, शादी कब कर रहे हो? उन्होंने मुझसे वादा करवा लिया कि शादी की सूट वही सिलेंगे। उन दिनों मैं कॉलेज में प्राध्यापक हो गया था और वादे के मुताबिक मेरी शादी का पहला सूट उन्होंने ही सिला। अली बड़े लोगों के टेलर थे इसलिए वहाँ से कपड़े सिलवाना बहुत बड़ी चीज समझी जाती थी। मकबूल तो निम्न-मध्यवर्ग के दर्जी थे; उन्हें बुरा जरूर लगा मगर तब तक मैं उच्च वर्ग का हिस्सा बन चुका था, उनकी हिम्मत नहीं हुई कि मुझसे अपने मन की बात कह सकें। मैंने साफ महसूस किया कि कैसे वो अपने मन की बात को अंदर ही अंदर घोटकर पी गए थे।

बहरहाल,किस्सा दूसरा है। अल्मोड़ा से लौटते हुए हमें बगल में बैठे सहयात्रियों के मुँह से बार-बार दुहराई जा रही हिन्दू-मुसलमान शब्दों की अप्रिय ध्वनियाँ सुनाई दे रही थी। ज़हूर ने भी उन्हें सुना ही होगा, मगर ऐसा लगता था कि वह उन बातों से बेखबर है। काफी देर तक सुनते रहने के बाद जब मुझसे नहीं रहा गया, मैंने उस उजड्ड युवक को डांटा कि वह ये क्या बकबास कर रहा है, जानते हो, जिनके साथ मैं बातें कर रहा हूँ, उनका नाम ज़हूर आलम है और नैनीताल में सांस्कृतिक चेतना पैदा करने में उनका वो योगदान है जो आज तक कोई दूसरा नहीं दे सका है। ज़हूर मुझे धकेलकर चुप कराने की कोशिश करता रहा, मगर थोड़ी देर बाद वह युवक भी यह कहते हुए चुप हो गया कि आप इन लोगों को नहीं जानते सर, आपको तब पता चलेगा जब आप अपने ही घर में अल्पसंख्यक बनकर रह जाओगे। उस अनाड़ी के साथ मैंने आगे बहस करना ठीक नहीं समझा और हम लोग अपने-अपने ठिकानों की ओर चल पड़े। यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मोदी युग अभी शुरू नहीं हुआ था, इसलिए निवेदन है कि इस प्रकरण को आज के सांप्रदायिक उन्माद के संदर्भ में न देखा जाए।
*****
हम सब जानते हैं कि वास्तविकता क्या है और हमें क्या करना है; अलबत्ता पिछले कुछ सालों से धर्म के नाम पर जो जहर फैलाया जा रहा है, उसे लेकर इन दिनों एक बेहूदी बहस छिड़ गई है, जिसमें जबरन आज के शासकों को घसीटा जा रहा है, असलियत यह है कि इसमें न नेहरू बीच में आते हैं और न मोदी। ये दोनों अपने-अपने वक़्त के शासक हैं और प्रत्येक शासक अपने समाज को अपनी समझ के हिसाब से आगे बढ़ाता ही है। आप उनसे असहमत हो सकते हैं मगर उसे बदलने की जिद कैसे कर सकते हैं? एक आम आदमी का काम अपनी राय रखना उसका जनतान्त्रिक अधिकार है, मगर किसी भी युग में सत्ताधीश के निर्णय को बदलना उसके हाथ में तो होता नहीं; इसके लिए अलग-अलग संसदीय समितियाँ होती हैं जिनमें देश के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क काम कर रहे होते हैं।
कोई भी, चाहे वह कितना ही निरंकुश शासक क्यों न हो, अपने समाज को नरक में तो नहीं धकेलना चाहेगा। और क्यों चाहेगा; क्या मिलेगा उसे ऐसा करके? कुछ उन्मादियों का तर्क है कि वर्तमान सरकार मुस्लिम विरोधी मुहिम छेड़े हुए है। इस सरकार का यह कहना कि भारत उसी का है जो इसे अपना घर समझता है, भारत में तो भारत की शर्तों पर ही रहना होगा; क्या गलत है? दुनिया इतनी बड़ी है, जो जहाँ चाहे रहने के लिए स्वतंत्र है, जो लोग भारत और हिन्दू को एक समझकर इसका एकपक्षीय अर्थ निकाल रहे हैं, उन्हें भारत के संविधान और यहाँ की सदियों पुरानी परंपराओं को जानना चाहिए; इतनी सारी राजनीतिक उथल-पुथल और राजशाही निरंकुशता के दौर में भी कोई इस देश का बाल तक बांका नहीं कर सका है, इस प्रबुद्ध दौर में यह बात ऐसे अनाड़ियों के लिए क्यों एक तर्क बनी हुई है? ये स्वयंभू धर्म और पश्चिमी विचारों के ठेकेदार कब तक हमारी दिशा तय करते रहेंगे?
मकबूल हुसैन, एम अली और मेरी पीढ़ियाँ आज अतीत बन चुकी हैं, हमारे बच्चे अपने-अपने तरीके से देश का नाम रोशन कर रहे हैं, अली का बेटा सैयद देश के लिए ओलंपिक खेल चुका है, मेरी बेटी सार्क देशों द्वारा भारत में स्थापित विवि साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में कूटनीति पढ़ाती है और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में सक्रिय है।… तब गड़बड़ कहाँ है? क्यों ये लोग अंधेरे में लठियाँ भाँज रहे हैं?
*****
गड़बड़ खुद हम बहुसंख्यकों की सोच में है।
अंत में एक किस्सा सुनिए।
मेरा एक प्रशंसक है, काठगोदाम निवासी इस्लाम हुसैन। मुझसे उम्र में काफी छोटा, मगर मेरा विद्यार्थी नहीं रहा है। यह जानते हुए कि मैं शुरू से विवि में प्राध्यापक रहा हूँ, वह हमेशा मुझे सम्मान के साथ ‘मास्साब’ कहकर पुकारता है। उसकी भावना को समझते हुए मैं हमेशा उसके साथ उसी सम्मान के भाव से संवाद करता रहा हूँ। हाल में नेहरू-मोदी को लेकर जब मेरी टिप्पणी प्रकाशित हुई तो अनेक लोगों के साथ इस्लाम ने भी मुझे लिखा कि इस तरह की टिप्पणी की उन्हें अपने मास्साब से उम्मीद नहीं थी, अप्रत्यक्ष रूप में उन्होंने कहा कि मानो मैं मोदी के हिन्दू राष्ट्र का समर्थन कर रहा हूँ।

हालाँकि मुझे न तो मोदी के हिन्दू राष्ट्र से कोई मतलब है और न नेहरू के केम्ब्रिजियन इंगलिस्तानी उपनिवेश से, मैं तो अपने अनपढ़, अभावग्रस्त देशवासियों की भावना की बात कर रहा था। बात ने तब तूल पकड़ लिया जब मुझसे उम्र में काफी बड़े, वारिष्ठ हिन्दी लेखक प्रदीप पंत ने इस्लाम को लिखा कि वो उनकी बात से पूरी तरह सहमत हैं और उन्हें अपने मास्साब को इस अप्रिय टिप्पणी के लिए माफ कर देना चाहिए।
लंबी, करीब चार दिनों तक चली इस बहस का उपसंहार बाजपुर निवासी एक युवा पाठक संजीव शर्मा ने किया, जिन्हें मैं कतई नहीं जानता। इस समापन वक्तव्य के लिए मैंने संजीव को विशेष रूप से धन्यवाद दिया। उनकी टिप्पणी है:
“नेहरू धनाढ्य और राजसी उपनिवेशवाद की उपज थे और मोदी गरीब लेकिन स्वतंत्र लोकतान्त्रिक भारत की उपज थे।

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