सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री और हिमालय के चिंतक प्रो. डीडी पंत की पुण्यतिथि (11 जून, पर विशेष)
हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत।
By Charu Tewari

मैं तब बहुत छोटा था। नौंवी कक्षा में पढ़ता था। यह 1979-80 की बात है। बाबू (पिताजी) ने बताया कि दुनिया के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक आज बग्वालीपोखर में आ रहे हैं। बग्वालीपोखर में उन दिनों सड़क तो नहीं आर्इ थी। हां, बिजली के पोल गढ़ गये थे, या कहीं बिजली आ भी गर्इ थी। हमारे लिये वैसे भी अपने क्षेत्र के बाहर के आदमी को देखना ही कौतुहलपूर्ण था। वैज्ञानिकों और उनकी खोजों के बारे में किताबों में ही पढ़ते थे। हमें लगता था कि वैज्ञानिक आम आदमी से कुछ अलग होते होंगे। प्रतिभा और विद्वता में तो होते ही हैं, लेकिन हमें लगता था कि देखने में भी अलग होते होंगे।
प्रो. डीडी पंत जी को पहली बार दूर से देखने का सुख मात्र एक वैज्ञानिक को देखने की बालसुलभ जिज्ञासा थी। उस समय पृथक उत्तराखंड राज्य के लिये उन्होंने एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल ‘उत्तराखंड क्रान्ति दल’ का गठन किया था। उसी सिलसिले में जनजागरण में निकले थे। उनके साथ प्रखर समाजवादी नेता जसवंत सिंह बिष्ट और विपिन त्रिपाठी थे। इन लोगों ने जो बोला वह तो उस उम्र में ज्यादा समझ में नहीं आने वाला हुआ। इतना जरूर समझ में आ रहा था कि वे जो कह रहे हैं वह सही बातें है। हमारा भविष्य को बनाने वाली।
हां, बाबू ने उनके बारे में कुछ जानकारियां दी थी जो मुझे आज भी याद हैं। एक तो यह बताया था कि जब बाबू 1958 में डीएसबी काॅलेज नैनीताल में पढ़ने गये तो उस समय प्रो. डीडी पंत यहां भौतिक विज्ञान के प्रमुख थे। दूसरा उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के कबाड़ को इकट्ठा कर डीएसबी परिसर में एक संपन्न भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला (फोटो फिजिक्स लैब) बनार्इ जो एशिया की सबसे अच्छी प्रयोगशाला मानी जाती थी। तीसरा उन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रो. सीवी रमन के साथ शोध किया। एक और जानकारी वे देते थे कि उन्होंने भौतिक विज्ञान में एक महत्वपूर्ण खोज की जिसे ‘पंत रे’ (अब पता चला कि यह मान्यता यूरेनियम लवणों पर उनके शोध का एक लोकप्रिय तर्जुमा कहना ही ठीक होगा।) के नाम से जाना जाता है।
ये सारी जानकारियां उस समय तो बहुत स्पष्ट नहीं थी, लेकिन बाद में प्रो. डीडी पंत को जानने-समझने के साथ इन जानकारियों का मतलब समझ में आया। हालांकि विज्ञान मेरा विषय नहीं है, लेकिन प्रो. डीडी पंत को हम एक वैज्ञानिक के आलोक में एक प्रतिबद्ध शिक्षक, कुशल प्रशासक, विद्वान शिक्षाविद, सामाजिक चिंतक, गहन अध्येता, हिमालय की संवेदनाओं से भरे बेहतर समाज का सपना देखने वाले मनीषी के रूप में जानते हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि वे हमारी दो-तीन पीढि़यों के प्रेरणा पुरुष रहे। हमारे चेतनापुंज रहे। आज उनकी पुण्यतिथि है। उन्हें शत-शत नमन।
प्रो. डीडी पंत जी को बचपन से जानने-समझने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह बाद में उनका सान्निध्य मिलने की सुखद अनुभूति के साथ एक युग के साथ जीने जैसा था। हमें उनसे शिक्षा प्राप्त करने या उस तरह से किसी अकादमिक मंच पर जाने का सौभाग्य तो नहीं मिला, लेकिन उनके विराट व्यक्तित्व के वट वृक्ष की छांव के नीचे हमने लगभग डेढ दशक तक सामाजिक सरोकारों की यात्रा का रास्ता बड़ी सजगता के साथ बनाया। सच के साथ खड़ा होना सीखा। स्वाभिमान के साथ लड़ना सीखा। संवेदनाओं से चीजों को जानना आया। वे जब ‘उत्तराखंड क्रान्ति दल’ के संरक्षक थे तो 1988 में उनसे पहली बार आमने-सामने द्वाराहाट में मुलाकात हुर्इ। उन दिनों ‘उत्तराखंड क्रान्ति दल’ अपने पूरे उभार पर था। तमाम युवा और छात्र इससे जुड़ रहे थे। 30 अगस्त, 1988 को गढ़वाल विश्वविद्यालय परिसर, श्रीनगर में ‘उत्तराखंड स्टूडेंट फेडरेशन’ का सम्मेलन हुआ । डाॅ. नारायण सिंह जंतवाल संयोजक चुने गये।
इस आयोजन का उद्घाटन प्रो. डीडी पंत जी को ही करना था। वे नैनीताल से द्वाराहाट आये। बिपिन दा (बिपिन त्रिपाठी) ने हमसे कहा था कि हम द्वाराहाट में सबको इकट्ठा करें। गाडि़यों में बैठायें। हम दो बसों में श्रीनगर जा रहे थे। सारे लड़के रमेश दा की दुकान पर इकट्ठा थे। वहीं बाहर लगी बैंच पर एक व्यक्ति बैठे थे। हम सब लड़के श्रीनगर जाने की उत्साह में थे। हमें पता ही नहीं था कि बैंच पर कौन बैठे हैं। हम लोग अपनी तरह से हंसी-ठिठौली कर रहे थे। हास-परिहास में बिपिन दा के आने के बाद होने वाले ‘हमले’ की नकल भी कर रहे थे। उन दिनों फोन तो थे नहीं। विपिन दा को भी अपने गांव से द्वाराहाट तक दो किलोमीटर पैदल आना होता था। कंधे में झोला लटकाये बिपिन दा जब दुकान में आये तो उन्होंने बताया कि आप प्रो. डीडी पंत जी हैं। हम सब लोग खिसिया गये। लेकिन पंतजी ने जिस सहजता से हम सबको स्नेह दिया हमें लगा ही नहीं कि उनसे पहली बार मिल रहे हैं। यह भी आभास नहीं हुआ कि हम कितने विशाल व्यक्तित्व से मिल रहे हैं। हम उनके साथ श्रीनगर गये। शायद वे एक सफेद एम्बेसेडर कार में आये थे। उसके बाद लंबे समय तक किसी न किसी रूप में उनसे मुलाकात होती रही। 11 जून, 2008 में उनका निधन हुआ। हमने ‘क्रियेटिव उत्तराखंड-म्यर पहाड़’ की ओर से 2009 में उनका पोस्टर प्रकाशित किया। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष पर 2019 में हमने चौखुटिया, द्वाराहाट और बग्वालीपोखर के स्कूलों में लगभग 2500 छात्रों के साथ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत की।
प्रो. डीडी पंत उन तमाम लोगों के लिये भी प्रेरणा स्त्रोत हैं जो विषम परिस्थितियों में भी अपने लिये रास्ता निकाल लेते हैं। एक सूक्ति है- ‘नहरें बनाने वाले यह भूल जाते हैं कि नदियां अपना रास्ता खुद तलाश कर लेती हैं।’ प्रो. डीडी पंत का जन्म सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ के गंणार्इ गंगोली-बनकोट मार्ग के पास द्योराड़ी पंत गांव में 14 अगस्त, 1919 में हुआ था। उनके पिता का नाम अंबादत्त था। वे वैद्यकी का काम करते थे। घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी। किसी तरह व्यवस्था कर उन्होंने पंतजी को पढ़ार्इ के लिये कांडा भेज दिया। अल्मोड़ा से 1936 में हार्इस्कूल और 1938 में इंटरमीडिएट किया। आगे की शिक्षा का संकट था। उसी समय नेपाल के बैतड़ी जिले (नेपाल) के संपन्न परिवार की लड़की से उनकी शादी की बात चली। आगे पढ़ार्इ की आस में वे इंटरमीडिएट का परीक्षाफल आने से पहले दाम्पत्य जीवन में बंध गये।










