Friday, March 6, 2026
Home lifestyle दुनिया के प्रसिद्ध चार लेखकों ने आम जन को ऐसे प्यार किया...

दुनिया के प्रसिद्ध चार लेखकों ने आम जन को ऐसे प्यार किया जैसे मां अपने बच्चे को करती है,

By – Dr. Arun kuksal

वर्तमान संदर्भों में प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन-
प्रसिद्ध लेखक हंसराज रहबर का यह कथन सच है कि ‘दुनिया के चार बड़े लेखक हैं- डिकेंस, गोर्की, लू शुन और प्रेमचन्द। इन चारों ने आम जन को ऐसे प्यार किया जैसे मां अपने बच्चे को करती है, जो उसका दोष नहीं देखती।’

आम आदमी के प्रति अथाह प्रेम ही इन साहित्यकारों को विशिष्ट बना देता हैै। इनके साहित्यिक पात्र अमानवीयता, निर्धनता, पतन की परिस्थितियोें में रहते जरूर हैं पर वे इन परिस्थितियों से टक्कर लेते हैं और अपने को बदलकर बेहतर इंसान बनना चाहते हैं।

समाज में बेहतर इंसान बनने की जरूरत और प्रक्रिया आज भी जारी है। इस कारण प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन की साहित्यिक उपस्थिति आज भी प्रासंगिक है।

बचपन, शिक्षा और लेखन-
प्रेमचन्द-
प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई, 1880 में बनारस के नजदीक लमही गांव में हुआ था। उनका घर का नाम नबाब राय और स्कूल का नाम धनपत राय था। नौजवानी तक पारिवारिक जीवन बेहद कष्टों में बीता। तब, ये दोनों नाम उन्हें अपने पर व्यंग्य लगते थे, इसलिए सन् 1910 में अपना नाम बदल कर ‘प्रेमचंद’ रख दिया।

प्रेमचंद की साहित्य लेखन की शुरुआत सन् 1901 से उर्दू भाषा से हुई थी। वे उर्दू समाचार पत्र ‘जमाना’ के लिए लेख और कहानियां लिखते। उनका उर्दू कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ सन् 1905 में प्रकाशित हुआ जो जल्दी ही ज़ब्त हो गया था।

ये भी दिलचस्प है कि वे सन् 1913 तक उर्दू में ही लिखते थे। सन् 1914-18 ‘सेवासदन’ उपन्यास लिखकर हिन्दी में लिखना शुरू किया। उन्होने सन् 1921 में महात्मा गांधी से प्रेरित होकर सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़ी। सन् 1930 से हिन्दी कथासाहित्य की प्रतिष्ठित ‘हंस’ पत्रिका का संपादन और प्रकाशन उन्होने आरम्भ किया।

प्रेमचन्द ने 300 से अधिक कहानियां और कुल 14 उपन्यास लिखे। ‘सेवासदन’ ‘प्रेमाश्रम’, ‘संग्राम’ ‘कर्बला’ ‘रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’, ‘मंगल-सूत्र’ प्रेमचन्द की अमर रचनायें हैं।

प्रेमचन्द ने 3 फिल्मों (मिल मजदूर, नवजीवन और रूठी रानी) के लिए भी कहानी लिखी थी। ‘मिल मजदूर’ फिल्म में मजदूरों के बीच भाषण देने का एक फिल्मी रोल भी उन्होने निभाया था। 8 अक्टूबर, 1936 को प्रेमचन्द का देहान्त हुआ।

ये माना जाता है कि, महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति में, गीजु भाई ‘बधेका’ ने भारतीय शिक्षा में और प्रेमचन्द ने भारतीय साहित्य में एक जैसे महत्व का काम किया है। प्रेमचन्द आज भी किन्हीं संदर्भ में, विश्व साहित्य में भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि मेरी पीढ़ी को हिन्दी साहित्य से परिचय कराने वाली शुरुआती कहानियांें में प्रेमचन्द की ‘ईदगाह’ और सुर्दशन की ‘हार की जीत’ थी। परन्तु इसमें भी ‘ईदगाह’ ने हमें ज्यादा प्रभावित किया। क्योंकि, वो बालमन के बहुत करीब थी। ‘हार की जीत’ कहानी के संदेश को हमने थोड़ा बाद में महसूस किया। पर ‘ईदगाह’ तो तुरंत मन-मस्तिष्क में रच-बस गई थी। जिसकी छाप आज भी तरोताजा है।

उस दौर में हमारे दादा-दादी, नाना-नानी या बुर्जुग जो भी कहानी सुनाते थे उसमें रहस्य, रोमांच, धर्म, हास्य और नैतिक शिक्षा तो खूब होती थी पर गरीबी से उपजी संवेदना का चित्रण नहीं के बराबर था।

इसलिए ‘ईदगाह’ मेरे मन-मस्तिष्क में इस मायने में पहली कहानी बनी।

वास्तव में, प्रेमचन्द ने रोमानी और तिलस्मी जासूसी वातावरण से उर्दू और हिन्दी साहित्य को वर्तमान समाज में व्याप्त सामाजिक सरोकारों के करीब लाने का शुरूआती महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रेमचंद ने उस साहित्य लेखन की पहल की जिसमें एक आम आदमी अपनी गुजर-बसर करके जीता और उसी में मरता है।

हम प्राचीन काल की बात करते हैं हम सब जानते हैं कि, वेद, उपनिषद, पुराण में धर्म और आध्यात्म की बातें हैं। भारत धन-धान्य से परिपूर्ण देश था। जीवकोपार्जन के लिए प्राकृतिक और मानवीय संसाधन सरलता से उपलब्ध थे। इसलिए, उनको और विकसित करने की तकनीकी से ज्यादा चिन्तन उनको नियंत्रण करने की ओर गया।

और, इसके लिए जन सामान्य के मन-मस्तिष्क में एक आलोकिक दुनिया बसाने के बारे सोचा और बोला जाने लगा। अपनी धरती से इतर नज़रें आकाश की ओर गई तो घर्म और आध्यात्म के चिन्तन का लबादा ओढ़े वापस आई।

दूसरी और, पश्चिम के देश प्राकृतिक संसाधनों में अभावग्रस्त रहे। इसलिए, वहां जीवकोपार्जन सरल नहीं था। अतः जीवकोपार्जन के लिए व्यापार और विज्ञान की ओर वे ज्यादा उन्मुख हुए।

सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, रहीम, जायसी सभी जीवन उच्च मूल्यों के पक्षधर रहे। इसमें कबीर ने जरूर सामाजिक विसंगतियों पर करारी चोट की पर वे भी धार्मिकता से ज्यादा प्रभावित थे। उसके बाद का साहित्य राजाओं के इर्द-गिर्द साहित्य उनके यशोगान से भरा है। ‘भारतेन्दु’ युग याने उन्नीसवीं शताब्दी का मध्यकाल जिसे हिन्दी साहित्य का प्रारम्भिक काल कहा जाता है में धर्म और देशप्रेम के सर्वोच्च मानक स्थापित करने की बात ही प्रमुखता से कही गई।

20वीं सदी के प्रारम्भिक काल में प्रेमचन्द ने भारतीय समाज में आर्दशवादी मान्यताओं की पुर्न स्थापना के लिए साहित्य में यर्थाथवाद को माध्यम बनाया। उन्होने वर्तमान सामाजिक संरचना के सम्पूर्ण बदलाव की बात कहना आरम्भ किया। इसके लिए, उन्होने किसान और मजदूर को अपने साहित्य का मुख्य पात्र बनाया। प्रेमचन्द उनकी आजीवन सशक्त आवाज बने।

प्रेमचन्द ने किसान और मजदूर के अन्तःमन और सामाजिक विषमताओं को उजागर करके हिन्दी साहित्य में गरीबी और जातिगत विभेद पर सीधी और करारी चोट की। जब वे हिन्दी साहित्य में ये अलख जगा रहे थे तब वे गरीबी और सामाजिक असमानता से खुद जूझ भी रहे थे। तभी तो, बेहद निराशाजनक माहौल मेें अपने अंदर हर समय उम्मीद का सूर्य जगाते रहने की जीवनीय जीवटता प्रेमचन्द को प्रेमचन्द बनाती है।

आज भी, समाज की स्थिति और मिजाज में गरीबी, सामाजिक असमानता और जातिगत विभेद का वर्चस्व है। हम बड़े सामाजिक समानता की बात करते हैं पर हमें जब व्यक्तिगत और पारिवारिक निर्णय लेने होते हैं तो जातीय भावना तुरंत जागृत हो जाती है। हम उसे नजरअंदाज कर कोई पारिवारिक निर्णय नहीं ले पाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि ‘जाति है कि जाती नहीं’। आज भी, गांव में किसान और शहर में मजदूर इसके सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। इसीलिए, प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं।

मैक्सिम गोर्की
मैक्सिम गोर्की का जन्म 28 मार्च, 1868 को रूस के नोवगोरोद शहर में एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनका असली नाम अलेक्सेई मक्सीमोविच पेशकोव था। अपनी पहली कहानी ‘मकरचुद्रा’ में सम्पादक ने उनका नाम मैक्सिम गोर्की लिख दिया था (‘गोर्की’ का रूसी अर्थ जीवट व्यक्ति होता है)। फिर तो, उसी नाम को उन्होने अपना लिया था।

गोर्की के सृजित साहित्य में ‘मां, ‘मेरा बचपन’, ‘जीवन की राहों पर’ और ‘मेरे विश्वविद्यालय’ को विश्व की श्रेष्ठ कृत्तियों में शामिल किया जाता है।

गोर्की की विश्वविख्यात लेखक होने की लोकप्रियता के बारे में सामान्यतया कहा जाता है कि विश्व के महानतम तीन लेखकों में से दो नाम और क्रम कोई भी हो पर एक नाम उसमें मैक्सिम गोर्की का होना स्वाभाविक है। 18 जून, 1936 को मैक्सिम गोर्की का देहान्त हुआ था।

गोर्की का बचपन और किशोरावस्था परिवार के सदस्यों के आपसी वैमनस्य, क्रूरता और बेहद अभावों में बीता। उन्होने अपने ही घर पर घरेलू नौकर, दुकानों की नौकरी, कबाड और चिड़िया बेचने से लेकर छोटी-मोटी चोरियां तक की थी।

स्कूल में साथी बच्चों के द्वारा उन्हें हर समय कबाडी और चोर कहने के कारण उन्होने स्कूली पढ़ाई से हमेशा के लिए नाता तोड़ दिया। और, जीवन की असल शिक्षा हासिल करने के लिए आवारगी की हद तक यायावरी को अपना लिया। उनको केवल अपनी नानी का प्यार और सहारा मिला, जिसके बदौलत उन्होने जीवन के हर क्षेत्र में सफलतायें हासिल की।

वे पढ़ने में प्रतिभावान थे, परन्तु जीवन की विकट परिस्थितियां उन्हें अघ्ययन से रोकती थी। पानी के जहाज में काम करते हुए बावर्ची स्मूरी ने उनके पढ़ने का शौक को पुर्नः जागृत किया।

उस्ताद स्मूरी की यह शिक्षा कि ‘आदमी की दयनीय स्थिति का सबसे बड़ा कारण उसकी अशिक्षा है। बुरे लोग इसी का फायदा लेकर उसका शोषण करते हैं। इसलिए, आंखे खोल कर पढ़ाई जारी रखो और जीवन का सामना डटकर करो।’

इस प्रेरणा ने उनके दुःखों और घावों पर मरहम लगाया। अब वे पढ़ना चाहते थे। और, पढ़ने के लिए पैसे चाहिए थे। पढ़ने की इसी अदम्य इच्छाशक्ति ने उन्हे कजान शहर में विश्वविद्यालय की चौकट तक पहुंचा ही दिया।

वे विश्वविद्यालय के नियमित छात्र तो नहीं बन पाये परन्तु विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के साथ वे रहने लगे। दिनभर मजदूरी और रात को वह विश्वविद्यालय में अध्ययनरत साथियों की किताबें पढ़ते थे। वो विद्यार्थी भी उनकी प्रतिभा और लगन के कायल थे। पर करें क्या? वो भी गरीब परिवारों से थे। इसलिए, गोर्की की पूरी मदद नहीं कर पाते थे।

विश्वविद्यालयी साथियों के साथ रहते हुए गोर्की की गुप्त राजनैतिक गतिविधियों में भी दिलचस्पी बढ़ने लगी। मार्क्सवाद से अलग नरोदवादी विचारधारा के लोगों के संपर्क में वे रहे। इस दौरान कजान शहर में बेकरी की दुकान में काम करते हुए उन्हें प्रेमरोग लगा और असफल होने पर आत्महत्या करने का प्रयास भी किया। उसके बाद, एक क्रान्तिकारी मित्र ने उन्हें लेखन के लिए प्रेरित किया।

उनकी पहली कहानी मैक्सिम गोर्की के नाम से ‘मकरचुद्रा’ छपने के बाद वह समारस्काया प्रकाशन में काम करने लगे। सन् 1900 के करीब लेलिन के ईस्का अखबार से वे जुडे़। रूस की साहित्य अकादमी ने उन्हे अपना सदस्य बनाया। परन्तु जार ने उसे निरस्त कर दिया। विरोध में प्रसिद्ध साहित्यकार चेखेव ने भी अकादमी से इस्तीफा दे दिया।

सन् 1905 में जार शासन के विरोध में पर्चा लिखने के कारण गोर्की को जेल में डाल दिया गया। परन्तु, विश्व दबाव से उन्हे छोड दिया गया। तत्पश्चात, उन्होने वोल्शेविक पार्टी की सदस्यता ली। वह उसके प्रकाशन में योगदान देते साथ ही जनचेतना के लिए नाटकों को लिखते और मंचन भी करते। सन् 1906 में जार के विरुद्ध असफल विद्रोह के बाद जेल से बचने के लिए वे स्वेडेन, डेनमार्क, जर्मनी, स्वीजरलैंड, अमेरिका, इंग्लैंड और इटली गए।

इस 7 साल के प्रवास के दौरान जार के विरुद्ध विश्व जनमत को तैयार करने का कार्य उन्होने किया। सन् 1910 में इटली के काप्री शहर में विश्व प्रसिद्ध रचना ‘मां’ उपन्यास को उन्होने लिखा। इसी दौर में, उनका लेनिन से संपर्क हुआ जो दोस्ती में तब्दील हो गई। और, वे साथ रहने लगे।

गोर्की ने अपने जीवन की घटनाओं को लेनिन को सुनाया तो लेलिन ने इन अनुभवों को लिखने का उनसे आग्रह किया। इसी का नतीजा ‘मेरा बचपन’ ‘जीवन की राहों पर’ और ‘मेरे विश्वविद्यालय’ जैसे कालजयी रचनायें सामने आयीं।

सन् 1913 में वे वापस रूस आये और वोल्शेविक पार्टी के माध्यम से जार के विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय हो गये। आखिर में, अक्टूबर, 1917 को वोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में रूस में जारशाही का अंत हुआ।

सन् 1920 में उन्होने विश्व – साहित्यमाला प्रकाशन का आरम्भ किया। महत्वपूर्ण यह है कि, इसमें रामायण, महाभारत और पंचतत्र को भी शामिल किया। तपेदिक की बीमारी उन्हे बचपन से ही थी जिससे वे जीवन भर जूझते रहे। वे लम्बा जीना चाहते थे, लेकिन मृत्यु ने उन्हें 1 जून, 1936 को आ दबोचा।

लू शुन
लू शुन का जन्म 25 सितम्बर, 1881 चीन के चेक्वांग प्रांत के शाओशिंग गांव में हुआ था। उनका असली नाम चाऊ-सू-रन था। वे बचपन से ही पढ़ाकू और मेघावी थे। परन्तु, उनकी पारिवारिक परवरिश कमजोर आर्थिक हालातों में हुई। जिस कारण, उनकी मां ने उनको अपने गहने और घरेलू सामान बेच कर पढ़ाया।

प्रतिभावान लू शुन सरकारी छात्रवृत्ति पर सन् 1902 में जापान में मेडिकल की पढ़ाई करने गए। एक वृत्त चित्र में चीनी लोगों की लाचार स्थिति को देखकर वे जापान से डाक्टरी की पढ़ाई बीच में छोड़कर साहित्य लेखन के लिए वापस चीन आ गए थे।

उस समय की तात्कालिक परिस्थितियों में उनका विचार था कि चीनी लोगों को शारीरिक से ज्यादा मानसिक इलाज की जरूरत है। जो कि क्रान्तिकारी साहित्य रचकर उसके प्रचार-प्रसार से ही संभव है।

चीन आकर वे अध्यापन और साहित्यिक पत्रिका के प्रकाशन और जनक्रांत्ति के कार्यों में जुट गए। सन् 1918 में ‘एक पागल आदमी की डायरी’ कहानी प्रकाशित हुई। सन् 1923 में ‘कॉल टू आर्म्स’ कहानी संग्रह के जरिए चीनी साहित्य में एक कमजोर नायकों के स्थान पर जुझारू नायकों का पदार्पण हुआ।

सन् 1931 जापान ने चीन पर कब्जा करना शुरू किया। लू शुन ने चीन की मुक्ति संघर्ष के मुख्य सांस्कृतिक नायक के रूप में इसका सशक्त विरोध किया। लू शुन क्रान्तिकारी व्यक्तित्व माओत्से-तुंग के सबसे करीबी और विश्वासपात्र थे। यद्यपि, वे कम्यूनिष्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे। परन्तु, उसके दस्तावेजों को तैयार करने में मूल विचारकों में वे प्रमुख रूप में शामिल रहते थे।

चीनी क्रांति में बंदूक और कलम का बहुत योगदान है। लू शुन ने कलम के द्वारा इसमें अपनी भूमिका को मृत्यु तक जीवंत रखा।

क्रान्तिकारी साहित्य का सजृन कर वे चीन की क्रान्ति के अग्रणी बने। ‘एक पागल आदमी की डायरी’, ‘हथियार उठाओ’ (ना-हान), ‘आने वाला कल’, ‘चाय की प्याली में तूफान’, ‘मेरा पुराना घर’, ‘जंगली घास’, आह क्यू की सच्ची कहानी’, ‘नये साल की बलि’ उनकी प्रसिद्ध रचनायें हैं।

कठिन संघर्ष और लगातार काम के वजह से लू शुन का स्वास्थ्य खराब हो चला। लेकिन, वे जन साहित्य के सृजन में मृत्यु तक डटे रहे। 19 अक्टूबर, 1936 को लू शुन का देहान्त हो गया था।

वर्तमान संदर्भों में प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन-

प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन के साहित्यिक पात्र तत्कालिक समय और परिस्थितियों से प्रभावित होकर आम आदमी के उन संघर्षों के प्रतीक बने जो आज भी जरूरी हैं। क्योंकि, मानवीय संघर्ष और सामाजिक विसंगतियां आज भी उसी रूप में जीवंत हैं। वे विकट परिस्थितियों से टक्कर लेते हुए बेहतर कल केे लिए और स्वयं एक बेहतर इंसान बनने का प्रयास भी करते थे।

प्रेमचन्द और गोर्की ने उपन्यास को सामाजिक विसंगतियों और बदलाव का औजार बनाया। लू शुन ने उपन्यास नहीं लिखा। प्रेमचंद उर्दू उपन्यासकार के रूप में ‘आवाजे खल्क’ अखबार में सन् 1903-05 तक प्रकाशित ‘पुजारी’ उपन्यास से सामने आये। यह उपन्यास धर्म के ठेकेदारों पर सीधे चोट है।

हिन्दी में उनका उपन्यास ‘सेवासदन’ सन् 1918 में प्रकाशित हुआ, जो नारी वर्ग की लाचारी को सामने लाया। ‘पुजारी’ और ‘सेवासदन’ ने धर्म और सामन्ती व्यवस्था पर सीधे चोट की जो इससे पहले इतनी जोरदार तरीके से हिन्दी साहित्य में नहीं आयी थी।

गांधीजी प्रेरित होकर उन्होने 1921 में नौकरी छोड़ी और देश की तीन-चौथाई आबादी किसानों को केन्द्र में रखते हुए ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास लिखा। सन् 1918 में ‘सेवासदन’ से उन्हें लोकप्रिय पहचान मिली तो सन् 1922 में ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास से प्रसिद्धि मिली।

‘प्रेमाश्रम’ में रूसी क्रांति के बाद किसानों की बेहतर दशा से प्रेरित था। प्रेमचन्द ने दीनहीन समझे जाने वाले किसानों के आत्मबल को इस उपन्यास से जागृत करने का काम किया। यह पहला उपन्यास है जिसने हिन्दी साहित्य में इतने साहस से किसानों को नायक बनाया।

किसानों की हालातों पर सन् 1909 में छपा ‘संग्राम’ नाटक का विस्तृत रूप ‘प्रेमाश्रम’ 1922 में आया। और, उसका परिष्कृत रूप ‘गोदान’ सन् 1936 को छपा। गौर से देखें, तो संग्राम, सेवासदन और गोदान के संवाद लगभग एक जैसे ही हैं।

प्रेमचन्द का ये किसानों की बातों को और बेहतर और दमदार तरीके से उजागर करने का प्रयास था। इन तीनों रचनाओं में किसानों के कर्ज लेने और देने का जो हिसाब-किताब और लिखाई-पढ़ाई की बारीक जानकारियां हैं, कहा जाता है कि इसे वजह से पाठकों और आलोचकों ने उन्हें ‘मुंशी’ नाम दिया।

मैक्सिम गोर्की का विश्व साहित्य में सन् 1910 में लिखा ‘मां उपन्यास की ख्याति उसकी क्रांति के आवाह्न के लिए हुई। उपन्यास के मुख्य पात्र निलोवना और पावेल आगे के समाज संरचना की रूपरेखा बनाते हैं। वहीं ‘मेरा बचपन’, ‘जीवन की राहों पर’ और ‘मेरे विश्वविद्यालय’ अतीत के अनुभवों को भविष्य के परिष्कृत करते हैं।

कहते हैं कि ‘सौ भाषण और सौ लेखों के जरिये जो काम नहीं होता वह एक नाटक कर दिखाता है’। प्रेमचन्द का फिल्म दुनिया में जाना, लू शुन का वृत चित्र देखकर डाक्टर से लेखक बन जाना इसके उदाहरण हैं।

प्रेमचन्द के नाटक संग्राम, कर्बला, प्रेम की वेदी और लू शुन के नाटक राहगीर और पुनर्जीवन तथा गोर्की के नाटक टक्कर, तलछट, नीचा नगर, सूर्यपुत्र, दुश्मन ने उस समय के सामाजिक और राजनैतिक आन्दोलनों को सक्रिय दिशा दी थी।

प्रेमचंद, गोर्की और लू शुन तीन महान साहित्यकार, कलाकार और चिंतक थे। जीवनभर अभावों में रहते हुए अध्ययन, मनन, चिन्तन और लेखन के जरिए बीसवीं सदी के विश्व-साहित्य के युगनायक बने।

गोर्की प्रेमचन्द से 12 साल और लू शुन से 13 साल बड़े थे। परन्तु, यह भी बिडम्बना है कि तीनों की मृत्यु एक वर्ष- 1936 में हुई। यह भी संयोग है कि इन तीनों के मूल नाम कुछ और ही था। अपने जीवन की दिशा को तय करते हुए उन्होने उसी अनुरूप अपने नये नामों को ईजाद किया।

एक जैसे जीवन संघर्षों के कारण तीनों वैचारिक साम्यता, स्वभाव और व्यवहार के भी करीब थे। पढ़ने –
लिखने का चस्का तीनों पर बचपन से था। प्रेमचन्द के पहले अध्यापक एक मौलवी थे जो उन्हें उर्दू-फारसी सिखाते थे। गोर्की ने अपनी नानी से सुनी कहानियों की हकीकत जानने की जिज्ञासा से पढ़ना शुरू किया। लू शुन मेघावी छा़त्र थे। इस कारण पढ़ने का जनून उनमें बचपन से ही था। तीनों के पिता का निधन बचपन में ही हो गया था।

निर्धनता के कारण पढ़ने के लिए तीनों को कई कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा था। पर अपनी स्वाध्याय के प्रति जबरदस्त जिद्द के कारण उन्होनें हर मुसीबत का डटकर मुकाबला किया था। इन्होने साबित किया कि लगन और परिश्रम से उच्च कोटि की प्रतिभा को हासिल किया जा सकता है।

अपने समय के राजनैतिक विचारकों से प्रभावित गोर्की पर लेलिन का, प्रेमचन्द पर महात्मा गांधी का और लु शुन पर माओत्से-तुंग का प्रभाव दिखाई देता है। एक ही समय अन्तराल में गोर्की ने रूसी क्रात्रिं, प्रेमचन्द ने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन और लू शुन ने चीन की क्रान्त्रि को साहित्यिक योगदान देकर निर्णायक बिन्दु तक पहुंचाने में कारगर भूमिका निभाई थी।

प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन का कहना था कि साहित्य को सामाजिक विसंगतियों की पत्तियों को तोडने का नहीं उनकी जड़ों पर प्रहार करना चाहिए। मतलब, आवश्यकता पूरे समाज की मानसिकता बदलने की है। इसलिए, साहित्यकारों को सामाजिक जीवन की वास्तविक समस्याओं से सीधे उलझना चाहिए।

अक्सर, साहित्यकार समाज में हो रही घटनाओं से अनजान होने का ढोंग करते हैं। और, बहुत देर बाद अपने नफे-नुकसान को आंकते हुए बहुत ही सधी और संतुलित प्रतिक्रिया देते हैं। इन तीनों का कहना था कि वे तटस्थता का ढोंग न करे, क्योंकि हर तरह का साहित्य किसी न किसी विचार का पक्ष-पोषण और दूसरे विचार का खंडन करता है। अतः उसे उनका पक्ष लेना चाहिए, जिन्हें समाज के हित अधिकतम आवश्यकता है।

ये तीनों साहित्यकार उस समय की सामाजिक हलचलों पर लिखते थे परन्तु, उसके केन्द्र में राजनीति ही थी। क्योंकि, वे मानते थे कि अतंत सारी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का निदान राजनीति के बैनर में ही होता है। सत्ता ही निर्णायक होती है। अतः उससे साहित्यकारों को परहेज नहीं करना चाहिए। तभी तो उस दौर के राजनैतिक आन्दोलनों को इन तीनों ने साहित्यिक ताकत दी थी।

तीनों ने ‘कला कला के लिए’ के विचार को अस्वीकार करते हुए उसे साहित्य को समाज के प्रति उत्तरदायी माना था। गोर्की और प्रेमचन्द ने सामाजिक चेतना के लिए उपन्यास को एक कारगर हथियार बनाया। लू शुन ने मार्च, 1918 में चीनी साहित्य में आम आदमी की भाषा में ‘एक पागल आदमी की डायरी’ कहानी लिखकर तत्कालीन चीन के मांचू साम्राज्य को अकेले ही चुनौती दे दी थी।

गोर्की साहित्य में रोमांटिक और बेपरवाह, प्रेमचन्द थोड़ा आर्दशवादी तो लू शुंग तीखे तर्कों के साथ तल्खी लिए हुए थे। परन्तु, तीनों का मानना था कि देश-काल और परस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन मनुष्य की मूलभूत समस्याएं, दुःख-सुख, शोषण-उत्पीड़न, समता और स्वाधीनता का उनका सपना एक जैसा है।

इन तीनों का मत था कि साहित्य का उदे्श्य है, खुद अपने को जानने में मानव की मदद करना है। इसलिए, अगर उदेश्य तीनों का एक है तो उनके कला और साहित्य में समानता तो दिखेगी ही।

प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन ने एक ही समय अन्तराल पर अपने-अपने देशों में आम आदमी की आवाज को अपने साहित्य में बुलंद किया था। इन तीनों ने न केवल अपने-अपने देशों में वरन एक दूसरे देश की साहित्यिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक वैचारिक जड़ता को तोड़ने महत्वपूर्ण कार्य किया।

इन तीनों की साहित्यिक मैत्री ने तीनों देशों की साझी विरासत को नया आयाम भी प्रदान किया था। गोर्की ने माना कि ‘मानव जाति के इतिहास का उल्लेख यूनान और रोम से नहीं वरन भारत और चीन से आरम्भ किया जाना चाहिए। गोर्की और लू शुन ‘रामायण’, ‘महाभारत’ और ‘पंचतंत्र’ को विश्व-साहित्य में भारत का अमूल्य योगदान मानते थे।

गोर्की और लू शुन की दोस्ती का ही परिणाम था कि गोर्की ने लू शुन के बीमार होने पर रूस में आकर इलाज करने का अनुरोध किया था। लेकिन लू शुन ने इस आधार पर इस अनुरोध को नहीं माना कि ‘जब दूसरे लड़ रहे हैं, प्राणों की आहुति दे रहे हैं, मैं चारपाई में पड़कर आराम नहीं कर सकता। काम करते हुए कुछ बरस जीना, बिना काम करते हुए अधिक जीने से बेहतर है।’

बार-बार यह विचार मन-मस्तिष्क में आ रहा कि प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन की साहित्यिक साम्यता और दोस्ती की तरह आज के वैश्विक राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक धरातल पर रूस, भारत और चीन यदि एकजुट हो जायं तो दुनिया के चेहरे की रंगत ही बदल जायेगी।

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, ब्लाक- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

RELATED ARTICLES

धराली आपदा : वैज्ञानिकों ने किया खुलासा, एक बड़े ग्लेशियर के टुकड़े के टूटने से हुई तबाही।

न बादल फटा, न ग्लेशियल झील… वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा: श्रीकांता ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा गिरने से हुआ था धराली हादसा। ....................... 5 अगस्त...

2017 तक स्टार्टअप की संख्या थी शून्य। वर्ष 2025 में बढ़कर हुई 1750

- 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ₹ 3,81,889 करोड़ का रहा - 2021-22 के मुकाबले जीएसडीपी में आया डेढ़ गुना से ज्यादा...

एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व की जीवन्त जीवन जीने की शब्द-यात्रा है – BARLOWGANJ AND BEYOND

- साधारण व्यक्ति का असाधारण व्यक्तित्व : प्रो. बी. के. जोशी। - प्रो. बी. के. जोशी जी के जीवनीय आत्म-संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'BARLOWGANJ...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

धराली आपदा : वैज्ञानिकों ने किया खुलासा, एक बड़े ग्लेशियर के टुकड़े के टूटने से हुई तबाही।

न बादल फटा, न ग्लेशियल झील… वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा: श्रीकांता ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा गिरने से हुआ था धराली हादसा। ....................... 5 अगस्त...

2017 तक स्टार्टअप की संख्या थी शून्य। वर्ष 2025 में बढ़कर हुई 1750

- 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ₹ 3,81,889 करोड़ का रहा - 2021-22 के मुकाबले जीएसडीपी में आया डेढ़ गुना से ज्यादा...

एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व की जीवन्त जीवन जीने की शब्द-यात्रा है – BARLOWGANJ AND BEYOND

- साधारण व्यक्ति का असाधारण व्यक्तित्व : प्रो. बी. के. जोशी। - प्रो. बी. के. जोशी जी के जीवनीय आत्म-संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'BARLOWGANJ...

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान   By - Harishankar saini   कभी गड्ढों, कीचड़ और टूटे किनारों से जूझती सलान गाँव...

होली विशेषांक : खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर।

- खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर। - दून पुस्तकालय में संगीताजंलि की शानदार होली प्रस्तुति दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के एम्फीथियेटर में आज संगीतांजली शास्त्रीय...

बर्लोगंज एंड बियोंड पुस्तक का लोकार्पण

पुस्तक : बर्लोगंज एंड बियोंड   By - Dr. Yogesh dhasmana   देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो बी के जोशी के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक बर्लोगंज एंड बियोंड...

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में।

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में। By - Neeraj Uttarakhandi पुरोला विकासखंड के अंतर्गत राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में राष्ट्रीय...

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी।

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी। .......... दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘स्पेक्स’ संस्था के सहयोग...

जनगणना की पूरी तैयारी, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी जनगणना

जनगणना-2027 की डिजिटल तैयारियां शुरू, देहरादून में 25-27 फरवरी तक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू चार्ज अधिकारियों से लेकर सेन्सस क्लर्क तक, सभी ले रहे डिजिटल...

एक स्वस्थ परंपरा है स्कूल ऑफ थॉट्स – प्रो० पंवार

स्कूल ऑफ थॉट्स, श्रीनगर (गढ़वाल), भारतीय-हिमालयी ज्ञान परंपरा,  मुख्य वक्ता- प्रो. मोहन पंवार। भारतीय : हिमालय ज्ञान परंपरा पर अपनी बात शुरू करते हुए मुख्य...