मोदी सरकार द्वारा आरएसएस पर डाक टिकट
गांधी जयन्ती पर आर एस एस की भूमिका पर बिशेष ।
By – Anant Akash

यह तथ्य देश कै सामने है कि मोदी सरकार शुरू से ही अपनी संवैधानिक हैसियत का दुरूपयोग करती आई है ,उसने मर्यादाओं को ताक में रखकर ऐतिहासिक पुरूषों महात्मा गांधी जिनकी हत्या में गोडसे जो कि संघ से जुड़े हुऐ थे तथा सावरकर का भी हाथ रहा ,सरदार बल्लभाई पटेल जिन्होंने गांधीजी की हत्या कै बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया ,संघ ने गांधीजी व पटेल जी उनका भी अपनी राजनीति को आगे बढाने कै लिऐ खुलकर दुरूपयोग किया है ।सच तो यह है कि संघ परिवार अपने रणनीतिक लक्ष्य हासिल करने कै लिऐ किसी भी हद तक जा सकता है,फिर सवाल कुल मिलाकर वहीं अटक जाता है कि क्या मोदी सरकार भारतीय संवैधानिक परम्पराओं की हितैषी है? क्या उनके हिन्दुत्व कै एजेंण्डै सै हमारे विविधता से भरै देश का हित सुरक्षित है ? देश की साझी शहादत ,साक्षी विरासत की परम्परा रही हो ।
ठीक कल 1 अक्टूबर 025 को आरएसएस की स्थापना की 100वीं वर्षगांठ मनाने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा डाक टिकट और 100 रुपये का सिक्का जारी करना भारत के संविधान का घोर अपमान है, सही बात तो यह है कि संघ चाल चरण एवं पिछले सौ साल का अनुभव बताता है कि संघ ने ,न तो आजादी कै आन्दोलन में कोई भूमिका निभाई ,उल्टा अंग्रेजी साम्राज्यवादियों की सेवा का जब भी अवसर मिला ,उनकी सेवा के लिऐ अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ी , यह भी सत्य है कि शहीदै आजम भगतसिंह व क्रान्तिकारियों को फांसी की सजा दिलवाने वाले अधिवक्ता भी संघ से जुड़े रहे ,ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि देश कै पीएम रहे स्व बाजपेईजी ने भी अंग्रेजों कै लिऐ काम किया । महात्मा गांधी कै हत्यारे कौन थे ? यह जगजाहिर है ! संविधान को आरएसएस ने कभी स्वीकार नहीं किया, यह बेहद आपत्तिजनक है कि कल एक आधिकारिक सिक्के पर एक हिंदूदेवी की “भारत माता” की छवि अंकित हो, जिसे आरएसएस ने हिंदुत्व राष्ट्र की अपनी सांप्रदायिक अवधारणा के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया गया है। इस अवसर पर 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में वर्दीधारी आरएसएस स्वयंसेवकों को दर्शाने वाला डाक टिकट भी इतिहास को गलत साबित करता है। यह इस झूठ पर आधारित है कि नेहरू ने भारत-चीन युद्ध के दौरान आरएसएस को उसकी देशभक्ति की मान्यता के रूप में 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था, जबकि साक्ष्यों से यह साबित हो चुका है कि 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में मूलतः एक लाख से ज़्यादा नागरिकों का एक विशाल जमावड़ा था। अगर आरएसएस के वर्दीधारी स्वयंसेवकों की उपस्थिति थी भी, तो वह अघोषित और आकस्मिक थी।मोदी सरकार की यह पूरी कवायद आरएसएस की शर्मनाक भूमिका को छिपाने के लिए है, जो न केवल स्वतंत्रता संग्राम से दूर रही, बल्कि वास्तव में फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश रणनीति को मज़बूत किया, ऐतिहासिक तथ्य हैं कि संघ परिवार ने भारत के लोगों की एकता को कमज़ोर करने की कोशिश की, क्योंकि संघ औपनिवेशिक शासन के साथ मजबूती से खडी़ थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास ने सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसा देखी है, जिनमें आरएसएस की भूमिका का विस्तृत विवरण आधिकारिक जाँच आयोगों की कई रिपोर्टों में पहले से मौजूद है। आज आरएसएस और उसका परिवार ही मनुवादी विचारधाराओं को बढ़ावा देकर अल्पसंख्यक समुदायों और समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों को निरन्तर निशाना बना रहा है। आरएसएस के इतिहास की यही सच्चाई है जिसे प्रधानमंत्री अपने पद का दुरुपयोग करके छुपाना चाहते हैं कि उन्होंने अपने संवैधानिक पद की गरिमा को भारी ठैस पहुंचाने का कार्य किया है ।
यह भी तथ्य सामने हैं कि मोदी सरकार द्वारा सावरकर को ,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ,शहीदे आजम भगत सिंह के समकक्ष दिखानै निरन्तर – प्रयास किये जा रहे हैं , सावरकर संघ परिवार के लिये आदर्श हो सकते हैं ,देश के लिये नहीं ! पिछले 2014 के बाद मोदी सरकार की कारपोरेटपरस्त ,साम्प्रदायिक नीतियों के परिणामस्वरूप एक सोची समझी समझ के तहत उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों को बदलने का क्रम जारी है ।स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मोदीजी द्वारा लालकिले से सावरकर एवं संघ की देश आजादी के आन्दोलन में योगदान की चर्चा तथा सरकारी विज्ञापनों सावरकर को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी तथा शहीदे आजम भगतसिंह के समानान्तर खड़ा करना मोदी सरकार के वास्तविक मंसूबे को बेनकाब करने के लिऐ काफी है वे देश को किस दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं ।
इससे पहले मोदी सरकार द्वारा निरन्तर पाठ्यक्रमों में बदलाव के साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से आमजन तक ऐसी सूचनाओं को परोसी, जिनका यथार्थ से कोई लेना देना नहीं रहा है ,यदि कोई प्रतिवाद करता है या फिर सही तथ्यों को पेश करता है तो उसके खिलाफ अभद्रतापूर्ण शब्दों का प्रयोगों की छूट आम बात है । “ऐतिहासिक सत्य यह भी है कि लाख लीपापोती के बावजूद भी आप हकीकत को आमजन तक आने से रोक नहीं सकते ” ऐसी सारी कोशिशें पहले भी की गयी हैं और कल गांधी जयंती से पहले दिन आर एस एस पर टिकट व सौ रूपये का चांदी का सिक्का जारी कर पीएम मोदी ने संवैधानिक परम्पराओं की धज्जियां उड़ाने के लिये चुना है । संघ परिवार के आदर्श सावरकरजी के बारे में बताना जरूरी हो गया है ।
बात बीर सावरकरजी की चल रही है ,यह सत्य है कि उनका प्रारम्भिक जीवन क्रान्तिकारिता से ओतप्रोत था ,यही कारण है कि उन्हें आजीवन सश्रम कारावास हुआ तथा उन्हें अण्डमान की सैलुलर जेल में भारी कष्टों का सामना करना पड़ा ।
अण्डमान के सैलुलर जेल में काले पानी की सजा काट रहे सावरकर, जिन्हें हिन्दुवादी संगठन अपना आदर्श मानते हैं , जेल में सजा काटने के कुछ सालों बाद ही उनकी भूमिका में बुनियादी बदलाव आया , उनके बदलाव पर जब भी चर्चा होती है तो उनके प्रति श्रृध्दा रखने वाले हकीकत स्वीकार नहीं कर पाते है,
सावरकर ने अंग्रेजों को लिखे माफीनामा में कहा था कि, “सरकार अगर कृपा और दया दिखाते हुए मुझे रिहा करती है तो मैं संवैधानिक प्रगति और अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादारी का कट्टर समर्थक रहूँगा ,जो उस प्रगति के लिए पहली शर्त है”.
“मैं सरकार की किसी भी हैसियत से सेवा करने के लिए तैयार हूँ, जैसा मेरा रूपांतरण ईमानदार है, मुझे आशा है कि मेरा भविष्य का आचरण भी वैसा ही होगा.”उन्होंने आगे लिखा ,”मुझे जेल में रखकर कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि रिहा करने पर उससे कहीं ज़्यादा हासिल होगा , वे अंग्रेजी हुकूमत के गुणगान करते हुए लिखते हैं कि केवल पराक्रमी ही दयालु हो सकता है , और इसलिए विलक्षण पुत्र माता-पिता के दरवाजे के अलावा और कहाँ लौट सकता है? सावरकर अपने क्रान्तिकारी” जीवन के प्रति पछतावा करते हुऐ लिखते हैं कि,मेरे प्रारंभिक जीवन की शानदार संभावनाऐं बहुत जल्द ही धूमिल हो गईं. यह मेरे लिए खेद का इतना दर्दनाक स्रोत बन गई हैं कि रिहाई एक नया जन्म होगा. आपकी ये दयालुता मेरे संवेदनशील और विनम्र दिल को इतनी गहराई से छू जाएगी कि मुझे भविष्य में राजनीतिक रूप से उपयोगी बना देगी ।अपने माफीनामा में तमाम सीमाओं को पार करते हुए सावरकर कहते हैं कि अक्सर जहां ताकत नाकाम रहती है, उदारता कामयाब हो जाती है.”माफीनामा में उन्होंने लिखा ,”मैं और मेरा भाई निश्चित और उचित अवधि के लिए राजनीति में भाग नहीं लेने की शपथ लेने के लिए पूरी तरह तैयार हैं । इस तरह की प्रतिज्ञा के बिना भी खराब स्वास्थ्य की वजह से मैं आने वाले वर्षों में शांत और सेवानिवृत्त जीवन जीने का इच्छुक हूँ ,कुछ भी मुझे अब सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने के लिए प्रेरित नहीं करेगा.”
ये सभी बातें विनायक दामोदर सावरकर ने अंडमान की सेल्यूलर जेल में सज़ा काटते हुए 1913 और 1920 के बीच दायर की गई दया याचिकाओं में अंग्रेजी हुकमरानोंं को लिखी थी ,यही कारण है कि सावरकर ने जेल से छूटने के आजीवन अंग्रेजों की न केवल सेवा की अपितु देश में हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत कर जो अन्ततः अंग्रेजी हुकमरानोंं को ही मदद कर गई तथा जिससे देश की साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा , जिसकी भरपाई शायद ही हो सके , सावरकर द्वारा रोपा गया पौधा आज विशाल वृक्ष हो गया जो.हमारे देश में साम्प्रदायिक राजनीति को केन्द्र में ले आयी है परिणामस्वरूप आज देश की स्थिति ठीक नहीं है ,इसलिए जितना जल्दी हो सके इससे मुक्ति पाकर आपसी सदभाव का माहौल बनाया जाना चाहिए ,इसी में सभी का हित है ।
,यह भी सत्य है कि संघ की इग्लैंड महारानी विक्टोरिया के भारत आगमन पर उनका स्वागत एवं गुणगान करते हुऐ नहीं थक रहे थे । आज सावरकर के प्रशंसकों का यह कहना है कि “सावरकर ने जेल में मरने की जगह राष्ट्रसेवा करने का रास्ता चुना इसीलिए माफ़ीनामे की चाल चली”.किन्तु “सावरकर ने अपनी रिहाई के बाद का सारा समय महात्मा गाँधी के खिलाफ माहौल बनाने में बिताया. 1937 में पूरी तरह रिहा होने से लेकर 1966 में अपनी मृत्यु तक सावरकर ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे सेवा कहा जा सके” । सावरकर ने “दया याचिकाएं नहीं बल्कि आत्म-समर्पण की याचिकाएऐं दायर की थीं ,जो उन दया याचिकाओं से बहुत अलग थीं , जो कुछ और कैदियों ने दायर कीं थी , जिनमें उन्होंने कैदियों के ऊपर हो रहे ज़ुल्म के बारे में लिखा था । इतिहास गवाह है कि जेल में सावरकर किसी भूख हड़ताल में शामिल नहीं हुऐ, क्योंकि ऐसा करने पर सज़ा के तौर पर उनको मिलने वाली चिट्ठियाँ बंद हो जाती ” जबकि “सावरकर ने अपनी याचिकाओं में लिखा कि मैंने अतीत में बहुत गलती की है ,और मैंने अपने शानदार भविष्य को तबाह कर दिया ,वे ये भी लिखते हैं कि ब्रितानी सरकार अच्छा काम कर रही और मैं उसके साथ खड़ा हूँ. साथ ही, वो यह भी लिखते हैं कि अगर आप मुझे माफ़ कर देंगे तो जो क्रान्तिकारी मुझे आदर्श बनाकर लड़ाई लड़ रहे हैं वो सब हथियार डाल देंगे.”
सावरकर की दया याचिकाओं को पढ़कर ये साफ़ हो जाता है कि “उन्होंने अंग्रेज़ों से कहा कि आप जिस तरह से चाहें मेरा इस्तेमाल करें”., सावरकर ने “1923 में ‘भारत हिन्दू राष्ट्र है’ लिखकर सीधे तौर पर अंग्रेज़ों की मदद करना तय किया था । सावरकर को 50 साल काला पानी की सजा हुई लेकिन वो 10 साल में ही टूट गये ,जबकि उसी जेल में बन्द क्रान्तिकारियों ने झुकना मंजूर नहीं किया वे फांसी के फन्दे पर झूल गये ।जिस जेल से सावरकर माफीनामा देकर छूटे उसी जेल में अनेक कम्युनिस्ट नेता बन्द थे ,जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोहा ले रहे थे । अंग्रेजों ने सावरकर को हिन्दू महासभा को संगठित करने का अधिकार दिया और उनकी पेंशन तय करने में भी माफीनामा की प्रमुख भूमिका थी ,सावरकर ने इंग्लैंड की रानी को लिखा था कि आप हिंदुस्तान को नेपाल के राजा को दे दें क्योंकि नेपाल का राजा सारी दुनिया के हिन्दुओं का राजा हैं , यह पता चला है कि हिन्दू महासभा का सेशन नेपाल के राजा को सलामी देकर शुरू होता था और उनकी लम्बी आयु की कामना पर ख़त्म होता था.(आज नेपाल ने हिन्दू राष्ट्र का दर्जा त्याग कर जनतंत्र का रास्ता अपनाया है ,जो अपने में एक उदाहरण है )
यह भी इतिहास में दर्ज है 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छह दिन बाद विनायक दामोदर सावरकर को हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के शक़ में मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया गया था. हालांकि उन्हें फ़रवरी 1949 में बरी कर दिया गया था लेकिन कपूर कमीशन की रिपोर्ट में उन्हें पूरी तरह से दोषमुक्त नहीं माना गया है । सरदार पटेल ने महात्मा गाँधी की हत्या के बाद 27 फरवरी 1948 को पंडित नेहरू को एक ख़त लिखकर कहा था कि “यह सीधे सावरकर के अधीन हिंदू महासभा की एक कट्टर शाखा थी ,जिसने महात्मा गांधी जी की हत्या की साजिश रची और उसे अंजाम दिया इसी प्रकार 18 जुलाई 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक ख़त में गाँधी की हत्या के बारे में सरदार पटेल ने कहा था कि उन्हें मिली जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा की गतिविधियो के परिणामस्वरूप देश में एक ऐसा माहौल बना था जिसमें ये भयानक त्रासदी संभव हो गई.”।जहाँ मुस्लिम लीग ने 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए अलग देश की बात पहली बार कही थी, सावरकर ऐसा पहले से कहते आ रहे थे. उन्होंने इससे तीन साल पहले 1937 में अहमदाबाद में साफ़ शब्दों में कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं ,और दोनों का हक़ इस भूमि पर बराबर नहीं है ।
सावरकर में दो सावरकर नज़र आते हैं. “पहले सावरकर हिंदुस्तान में बड़े होते हैं, उन्हें छात्रवृत्ति मिलती है , वो राष्ट्रवादी गुटों में शामिल होते हैं, विलायत जाते हैं, लंदन में इंडिया हाउस में रहते हैं, वहां भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों में शामिल होते हैं, 1857 की क्रांति पर एक अच्छी किताब लिखते हैं, जिसमें वो कहते हैं कि 1857 की क्रांति ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इतना बड़ा ख़तरा इसलिए बन गई थी क्योंकि हिंदू-मुसलमान इकट्ठे होकर लड़े थे. यानि एक तरह से वह हिंदू-मुस्लिम एकता का समर्थन कर रहे थे और इसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकाबला करने के तरीके के तौर पर देख रहे थे.”
सावरकर 1910 में नासिक के कलेक्टर की हत्या में शामिल होने के आरोप में लंदन में गिरफ़्तार करने के बाद काला पानी भेज दिया गया था ।जहाँ आरएसएस के लोग सावरकर का गुणगान करते नहीं थकते, वहीं सावरकर का आरएसएस के प्रति रवैया अपने आप में बहुत दिलचस्प था ।एक संगठन के तौर पर सावरकर आरएसएस को बहुत महत्व नहीं देते थे, 1937 में सावरकर ने कहा था कि आरएसएस के स्वयंसेवक का स्मृति-लेख कुछ ऐसा होगा, “वह पैदा हुआ था, वह आरएसएस में शामिल हो गया और बिना कुछ हासिल किऐ मर गया.”।
‘यह विडंबना है कि आरएसएस की स्थापना सावरकर के लेखन से प्रेरित होकर की गई थी, लेकिन वह कभी भी आरएसएस में शामिल नहीं हुए और आरएसएस के बारे में ऐसी तीखी टिप्पणी की.”जानकारों के मुताबिक सावरकर जहाँ एक तरफ बार-बार औपनिवेशिक शासन के सामने याचना करते दिखे, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने महात्मा गांधी और उनके तरीकों की खुलकर आलोचना की ।सावरकर ने एक बार महात्मा गाँधी के असहयोग और खिलाफ़त आंदोलनों की निंदा करते हुए उनकी ‘अहिंसा और सत्य की विचित्र परिभाषाओं’ के बारे में टिप्पणी की थी और कहा था कि ख़िलाफत आंदोलन एक ‘आफत’ साबित होगा. अंग्रेज़ों के लिए सावरकर को रिहा करते वक़्त निर्णायक बात ये थी कि उन्होंने पांच साल की अवधि के लिए सरकार की सहमति के बिना सार्वजनिक या निजी तौर पर किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होने का वादा किया था ।
सावरकर का शुरुआती जीवन का एक पक्ष था ,किन्तु अडमान की जेल में वे 10 साल भी सह नहीं पाये ,जहाँ क्रान्तिकारी कैद में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ जमकर लड़ रहे थे ,असहनीय यातनाओं के सामने झुकने के लिए तैयार नहीं थे , वहीं सावरकर एक के बाद माफीनामा देकर अपनी कमजोरी प्रदर्शित कर रहे थे ।इसी प्रकार सावरकर के उसके वैचारिक साथियों ने आजादी के आन्दोलन से अब तक नुकसान के अलावा कुछ नहीं किया ।*
अन्त में यह कहना शहीदे आजम भगतसिंह ,सावरकर को आदर्श मानते हैं अनुचित होगा ,राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का देश कै लिऐ कुर्बानी तथा भगतसिंह ,राजगुरु ,सुखदेव आदि अनेक क्रान्तिकारियों ने फांसी पर चढ़ना मंजूर किया ,किन्तु अंग्रेजी हुकमरानोंं के सामने झुकना मंजूर नहीं किया ,जबकि सावरकर ऐसा नहीं कर पाये ।
@लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







