“देहरादून के जौनसार के ठाणा गाँव की महिलाओं ने पारंपरिक पहाड़ी नमक को बनाया स्वरोजगार का मॉडल”।
By – Bharat chauhan
पहाड़ की मिट्टी, मेहनत और आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल पेश करते हुए चकराता क्षेत्र के ठाणा गाँव की 15 महिलाओं ने पारंपरिक नमक बनाने की जौनसारी कला को आधुनिक बाजार से जोड़कर नया रोजगार मॉडल खड़ा किया है। इन महिलाओं ने न केवल आजीविका के नए अवसर उत्पन्न किए हैं, बल्कि जौनसार-बावर की संस्कृति और स्वाद को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में उल्लेखनीय कदम उठाया है।
यह पहल उस समय शुरू हुई जब उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (UCOST) देहरादून द्वारा माख्टी पोखरी (चकराता) में जौनसारी जनजातीय महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई थी। इस कार्यशाला में महिलाओं ने कृषि वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, विपणन विशेषज्ञों और होटल व्यवसायियों के साथ संवाद किया, जिससे उनमें उद्यमशीलता और नवाचार की भावना जागृत हुई।
कार्यशाला के बाद ठाणा गाँव की महिलाओं ने अपने पारंपरिक कौशल को व्यवसायिक रूप देने का निर्णय लिया और ‘जौनसारी जनजातीय उद्यमी महिला स्वायत्त सहकारिता लिमिटेड’ की स्थापना की। यह सहकारिता बिना किसी रासायनिक पदार्थ के, पारंपरिक ओखली और सिलबट्टे की मदद से नमक तैयार करती है। इनके उत्पादों में तीन प्रमुख वैरायटी शामिल हैं – पहाड़ी हरा नमक, पहाड़ी लाल नमक और पहाड़ी अलसी नमक।
इन उत्पादों को महिलाओं ने ‘ट्राइबल क्वींस’ ब्रांड के तहत बाजार में उतारा है, जो अपने विशिष्ट स्वाद, सुगंध और पौष्टिकता के कारण उपभोक्ताओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। वर्तमान में यह महिला सहकारिता विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ मिलकर कार्य कर रही है और भविष्य में अन्य स्वदेशी जौनसारी खाद्य उत्पादों के विकास की दिशा में भी अग्रसर है। ठाणा गाँव की इन महिलाओं ने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस हिम्मत, नवाचार और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है, वह पूरे उत्तराखंड की महिला शक्ति के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी है।
इस समूह में विशेष भूमिका सुशीला, बिमला, प्रभा, प्रीतमा, शशी, मीना, लता, ममता, प्यारो, झूलो, सरोज, सावित्र, सरिता, रेखा,सुश्री वंदना आदि महिलाएं की मुख्य भूमिका है।
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