Friday, March 6, 2026
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प्रेम, दिवानगी और समसामयिकी विषयों का संग्रह है ‘वो साल चौरासी’

प्रेम, दिवानगी और समसामयिकी विषयों का संग्रह है ‘वो साल चौरासी’

By – Prem Pancholi

दुनियांभर में ‘प्रेम’ पर आज तक जो भी लिखा गया है वह कम ही साबित हुआ है। प्रेम जिन्दा और संजिन्दा लोगों के लिए बहुसागर है जितना हम उसमें डूबेंगे उतनी ही गहराई मिलती रहेगी।
इसी तरह की एक पुस्तक ‘वो साल चौरासी’ वरिष्ठ पत्रकार, यायावर और संस्कृतिकर्मी मनोज इस्टवाल ने लिखी है। हालांकि वे अपनी इस पुस्तक को आत्म संस्मरण बताते है। मगर इस पुस्तक को जो भी पढेंगे वह समाज के हर पहलुओं को आसानी से समझ पायेंगे। समाज की संर्कीणाताऐं, पहचान, अमीर और गरीबी जैसी स्थितियांे पर यह पुस्तक बोलती है। पुस्तक की मूल आत्मा ‘प्रेम’ जरूर है, पर प्रेम के बहाने समाज संस्कृति की झलक पुस्तक के हर अध्याय में मौजूद है।

लेखक ने पुस्तक की भूमिका अर्थात ‘दो शब्द’ में स्पष्ट कर दिया है कि ‘प्रेम’ कोई काम वासना आदि आदि जैसे व्यवहार तक सीमित नहीं है, लिखते हैं कि प्रेम अनन्त है। इसलिए काम वासना ‘प्रेम’ को परिभाषित नहीं कर सकती। दरअसल यह पुस्तक उनके प्रेम से जुड़ी कहानी का हिस्सा जो है। इधर लेखक की प्रवृत्ति हमेशा सनातन धर्म के अनुयायी के रूप में दिखाई दी है। किन्तु जब उन्होने अपने ‘प्रेम’ को अहसास किया तो इसी पुस्तक के दो शब्द वाले कॉलम में ओशो का उदाहरण देते कोई गुरेज नहीं करते। ओशो को कोड करते हुए लिखते हैं कि प्रेम की असफलता जीवन को अर्थहीन बना देती है, लेकिन यह असफलता व्यक्ति को आत्मनिरिक्षण के लिए प्रेरित करती है। वे आगे लिखते हैं कि ‘अतृप्त प्रेम’ ही है जो दूसरे के प्रति संवेदनशील बनाता है। यही वजह है कि पुस्तक समग्रता से आगे बढ रही है।

‘वो साल चौरासी’ पुस्तक सच्ची घटना का एक पुष्पगुच्छ है, जिसमें पहाड़ो में खेले जाने वाला क्रिकेट, पास की खरगड नदी का आवेग, वन देवियों की कहानियां, लुप्त हो चुके गढवाली शब्दों को हिन्दी के साथ लिख देना और इतिहास संस्कृति से रू-ब-रू करवाना यह पुस्तक अपने आपको अन्य संस्मरणों, आत्मकथाओं से पृथक करती है। जब हम इस पुस्तक के पहले अध्याय को पढते हैं तो वह बाल्य अवस्था जो किशोर अवस्था की तरफ बढ रही होती है के दौरान की लेखक से जुड़ी कई कहानियां बताती है। यह वही दौर था जब लेखक की किसी सुन्दर युवती को देखकर आंखे चार हो गई। लेखक ने बस देखते ही कह दिया कि सच में यही कमलनयनी है। इसलिए लेखक ने अपने पहले ‘प्रेम’ को एक घटना बता दी। लिख दिया कि सन 1984 के दौरान दुनियां में क्या क्या घटना घटी है। जैसे इन्दिरा गांधी की हत्या, स्टीब जॉब्स ने संयुक्त राज्य अमेरिका में मैकिन्टोश पर्सनल कम्प्यूटर लॉन्च किया बगैरह बगैरह। इस तरह की ऐतिहासिक घटनाओ के साथ अपने कमलनयनी प्रेम की कहानी को जोड़ने में लेखक माहरथ हासिल कर गये। यही वजह रही कि सम्पूर्ण किशोर अवस्था में लेखक खरगड के सामने वाले गांव में जब भी क्रिकेट टूर्नामेंट हो तो कैसे छोड़ सकते है। क्योंकि वहां कमलनयनी का आना तो होता ही था। बस एक टक निहारने से लेखक तृप्त हो ही जाता था, भले बातचीत का कोई आधार ही नहीं था। प्रेम जाल में फंस चुके लेखक अपनी दिनचर्या व रहन सहन पर खुलकर लिखते है। शर्ट पर छाती के दो बटन हमेशा खुले रखना, सांवले बदन को बार बार सजाना और अपनी स्कूल में मोनेटर थे तो स्कूल में भी धमक बनाये रखना और क्रिकेट खेलते वक्त छक्का मारना लेखक की खूबी बन गई थी। ताकि यह सूचना कमलनयनी को आसानी से पंहुच सके। क्योंकि उन दिनों आज की जैसे कोई संचार व्यवस्था थी ही नहीं। इन गतिविधियों के मार्फत एक जगह से दूसरी जगह सूचना पंहुचाना जैसी कला हर किसी के पास नहीं थी। लेखक इस विद्या में पूर्व से ही माहीर थे। सूचना सही जगह पंहुचे इसके लिए लेखक ने अपने मामा के बेटे को खूब इस्तेमाल किया। अतः यह स्थिति बताती है कि आज के ‘प्रेम रोगियों’ के लिए कितनी सुविधा हो गई है।

 

‘वो साल चौरासी’ पुस्तक में कमलनयनी के बहाने लेखक समाज की अन्य घटनाओं का भी जिक्र करते हैं। उनके सहपाठी उन दिनों कैसे छुप छुपकर बीड़ी पीते थे। वे लिखते हैं कि 40 साल पहले लोगों के पास आर्थिक संसाधन नाम मात्र के ही होते थे। यदि उनके किशोर अवस्था वाले साथी बीड़ी पीना चाहते थे तो बीड़ी के शेष बचे ठुडे को ही ढूंढ ढूंढकर पीते थे। अर्थात पुस्तक को पढने से मालूम होता है कि पहले भी दूर दराज के गांव में जुआ खेलने वाले निठल्ले, शराबी जैसी बीमारी थी ही।

कमलनयदी और अपने मिलन के बहाने लेखक ने सामाज के उन विद्रुप चेहरों का जिक्र करना नही भुलाया, यहीं से पुस्तक की महत्ता और बढ जाती है। पुस्तक बता रही है कि भले आज के जैसे उस वक्त संचार के साधन बिल्कुल ही नहीं थे मगर तब भी ‘प्रेम’ को कोई भी समय नहीं रोक पाया। बीच में गहरी खाई, आमने सामने की पहाड़ी पर बसे गांव, एक गांव से दूसरे गांव सूचना देने की सबसे बड़ी ताकत उन दिनों आईना ही हाता था। जिसे दो प्रेमी ही सर्वाधा प्रयोग करते थे। कमलनयनी भी इसी तरह अपने गांव से सामने वाले गांव की ओर आईना चमकाती थी इस आईने के चमकने से सामने वाले गांव में इन्तजार कर रहे लेखक यानि मनोज इस्टवाल ऊर्फ धर्मा जोगी के मन मे तब मिलने की उथल पुथल मच जाती थी।

दिलचस्प कहानी तब बनती है जब लेखक और कमलनयनी आमने सामने मिलते थे, मुस्कराते थे पर बात नहीं हो पाती थी। एक बार खरगड नदी में लेखक के गिरने से अंगुली कट जाने पर कमलनयनी अपनी साड़ी का पल्लु फाड़कर घाव पर बांध देती है। अपने अपने गांव जाकर सुबह की पहली किरण आने के साथ सामने वाले गांव की तरफ आईना चमकाते भी थे, इतने करने के बावजूद भी मिलने पर बात नहीं कर पाये। दरसल यही निश्च्छल प्रेम की परिभाषा बता रही है कि यह दोनो जोड़े अटूट प्रेम भी करना चाहते हैं और संस्कारो में बंधे रहना चाहते है। बातचीत न होने के गम में कई बार लेखक पड़ोसी भाई किशन दयाल के बेडरूम पर कान लगाये रखता था कि कब उनका टेपरिकाडर बजे और कब वे दर्दभरे गीत सुनाये दे। किशन दयाल के टेपरिकाडर के मार्फत वे बताना चाह रहे हैं कि गांव में तब बैट्री सेल जल्दी से मिलते नहीं थे। डाउन हो चुके सेल के साथ टेपरिकाडर की आवाज ऐसी आती थी जैसे रो-रोकर जब इंसान थक जाता है, इसी तरह कुछ बजने वाले गीत भी लम्बी लम्बी सांसे भरते है। इसी धुन पर लेखक अपने प्रेम को पाने बावत स्वर मिलाता था।

‘वो साल चौरासी’ के बहाने लेखक एक तरफ अपने ‘प्रेम’ को अक्षरशः बताने की कोशिश कर रहे है और दूसरी तरफ तत्काल की कठीन जिन्दगी को बताने में कोई गुरेज नहीं कर रहे है। गांव या अन्य जगहो पर लगने वाले मेले हो, कोई खेल आयोजन हो अथवा शादी विवाह हो, इन सभी के बहाने लेखक ने यथा स्थान पंहुचना ही था ताकि उसे कहीं कमलनयनी मिल जाये और उनकी बातचीत हो जाये। अधिकांश होता ऐसा ही था, पर इशारे, मुस्कराना, एक दूजे को एकटक देखना जैसे इनकी नियत ही बन गई थी। बता दें कि इस मिलने के अन्तराल में लेखक ने समाज को और अच्छी तरह से जिया है।

मेलो मे जाना हो या एक गांव से दूसरे गांव जाना हो, लगभग पैदल ही जाना होता था। अधिकांश जगह सड़के नहीं थी, जहां सडके थी भी तो यातायात की व्यवस्था थी ही नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनो का भी अभाव था। एक बस जो सुबह चलती थी उसमें बैठकर कहीं पंहुचा जा सकता था। दिनभर कोई यातायात के साधन नहीं थे। लेखक ने यह भी बताया कि तब गांव में पशुपालन अच्छा होता था। घी-दूध की गांव में कोई कमी नहीं थी। इसलिए अधिकांश युवा युवती छुट्टी के वक्त पशु चुंगाने जाते ही थे। बस यही इन ‘प्रेमियो’ के मिलने के अड्डे भी हुआ करते थे।

लेखक बता रहे हैं तत्काल युवा जोड़ो को मेलो में पंहुचना जरूरी था, जैसे वह खुद करते थे। मेले के एक प्रसंग को वे इस पुस्तक मे लिखना नहीं भूले। जब वे मेले से वापस आ रहे थे, उसके आगे आगे कमलनयनी अपनी सहेलियों के साथ चल रही थी। लेखक भी इन्ही के सहारे कन्धे पर एक बड़ा तरबूज लिए चल ही रहा था, इतने में पीछे से लेखक के किसी साथी ने कन्धे से तरबूज गिरा दिया, जो वहीं पर चकनाचूर हो गया। इस घटना से लेखक को बहुत शर्मिदगी महसूस हुई, क्योंकि कमलनयनी और उनकी सहेलियों ने जो देख लिया था। वे थोड़ा हंसी जरूर पर उनकी चिन्ता के भाव ने लेखक को सांत्वना दे डाली। यह प्रसंग बताता है कि 40 साल पहले सच में पहाड़ का जीवन कितना कठीन रहा होगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है।

अब तो गांव गांव पाइप लाइन आ गई है तब गांव का एक ही जल धारा होता था जिसे स्थानीय लोग पन्यारा कहते थे। यह भी मिलन और सूचनाओं के संचार का एक प्रमुख केन्द्र हुआ करता था। दूर से साड़ी का पल्लु हिलाना, शर्ट को लहराना प्रेमियों के संकेत स्तम्भ हुआ करते थे, जैसे कि लेखक ने साल 84 में स्वयं जीया है। जबकि लेखक ने यहां एक गूढ रहस्य का जिक्र अवश्य किया है। वे लिखते हैं कि उन दिनों किशोरियां – युवतियां एक विशेष भाषा का प्रयोग बहुतायात करती थी। यानि किसी भी शब्द के आगे ब जोड़ दो। जैसे ‘बेटा को वे बबेटा’ कहते थे, मनोज को बमनोज कहते थे आदि आदि। यह ऐसी भाषा थी जिसे अन्य कोई नहीं समझ सकता था। मगर लेखक को यह भी भाषा समझ आती थी। इसी भाषा में कमलनयनी और उनकी सहेलियां मनोज इस्टवाल के बारे मे कुछ बात कर रही होती थी तो वे समझ जाते थे। इसलिए उन्हे अकाट्य विश्वास था कि कमलनयनी लेखक से ही प्रेम करती है।

इसके अलावा लेखक यह जोर देकर लिखते हैं कि तत्काल रिश्ते बहुत मजबूत हुआ करते थे। वे खुद का उदाहरण देकर आगे लिखते हैं कि चाचा, ताऊ, पुफु, मामा के बच्चे आपस में इस तरह से रहते थे कि मानो सभी एक ही घर की पैदाईश हो। लेखक स्पष्ट करते हैं कि 40 बाद यानि मौजूदा समय में रिश्ते और संस्कार बहुत कमजोर हो गये है जिसे वे भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं मानते हैं।

पढाई लिखाई में अब्बल, स्कूल में मानेटर, खेल आदि में अब्बल तो निश्चत ही है कि लेखक उस क्षेत्र में चर्चाओ में रहे होंगे। मगर लेखक का ‘प्रेम’ तो सामने वाले गांव में पनप रहा था। जबकि स्कूल में भी उनके कोई कम चर्चे नहीं थे। यह मालूम उन्हे तब हुआ जब उनकी स्कूल में विदाई पार्टी हुई। विदाई के बाद उनकी सहपाठी मृगनयनी ने उन्हे 160 पृष्ट की एक कॉपी भेंट की। बाद में जिसे पढकर वे हैरान रह गये। मन ही मन खुद को कचौटता रहा कि काश पहले ऐसा मालूम होता तो वे खरगड नदी को क्यों पार करते। खैर उनका तो अनन्त प्रेम था जो बार बार उन्हे खरगढ नदी को पार करवाता था।

इण्टरमीडिएट की परिक्षा पास करने के पश्चात लेखक ने ठान ली कि वह अब दिल्ली जायेगा जहां वह पढाई के साथ साथ कुछ रोजगार कमायेगा। यदि अच्छी खासी नौकरी मिल गई तो खरगड नदी को रात में नही बल्कि दिन में पार करके अपने मां बाप के मार्फत यह सूचना पहुंचा देगा कि अब कमलनयनी उनकी ही रहेगी। वे सात जन्मो के बन्धन में बंधने जा रहे है। इस तरह के सपने के साथ लेखक अब दिल्ली रवाना हो गये, साथ में ले गये कमलनयनी और अपनी सहपाठी मृगनयनी के सपने।

लेखक की यह आत्मकथा 40 साल पहले और आज के परिवर्तन पर एक विशेष प्रकार की पुस्तक है। विकास से लेकर, रिश्ते-संबधो पर यह एक जरूरी पुस्तक कहलायेगी। पहली बार जब लेखक कोटद्वार से रेल पर सवार हुए तो तब उन्होने कुल्हड़ में भी पहली बार चाय पी है। जबकि अब सारे जहां में प्लास्टिक ही प्लास्टिक। उन दिनों प्लास्टिक कहीं दिखता तक नहीं था।

इस तरह यह पुस्तक प्रेम के साथ साथ हमें इंगित कर रही है कि आज 40 साल बाद हम कहां है। कुल्हड़ की चाय, रेल का सफर, तांगे में बैठना फव्वारे में नहाना, किसी शुभ अवसर पर हिजड़ों के समूह को देखना जैसे अनुभव लेखक के सामने एकदम नये थे। पर इन सबके बीच लेखक को कमलनयनी का ही चित्र दिखाई देता था। दिल्ली में वह अपने चचेरे भाई के घर पंहुचा। कुछ समय बाद लेखक को अच्छी खासी नौकरी भी मिल गई। मुर्गी खाने से लेकर मल्टीनेशनल कम्पनी तक लेखक ने चार साल तक नौकरी की है। कुछ समय तक बेरोजगार भी हुआ तो इस समय लेखक ने दिल्ली को अहसास किया। तब दिल्ली में बातचीत के अधिकांश शब्द रूखे और गाली गलौच टाइप के हुआ करते थे। इधर इस अन्तराल में दिल्ली में उनकी एक मंदाकीनी नाम की बाला से आंखे चार हो गई थी। पर लेखक के आंखो में सिर्फ कमलनयनी की ही सूरत छप चुकी थी।

दिल्ली में जम चुके अब के लेखक और तब के युवा मनोज इस्टवाल ऊर्फ धर्मा जोगी अब घर आकर कमलनयनी के पास शादी का प्रस्ताव रखना चाहते है। दिल्ली से घर आते वक्त भी लेखक समसामयिकी विषयों से दूर नहीं हो पाये। कोटद्वार में बस अड्डे या रेलवे स्टेशन पर स्थित अधिकांश मिठाई के दुकानदार बासी और पुरानी हो चुकी मिठाई को पहाड़ीयों को बेचते थे। इस मिठाई को तत्काल या तो लेखक जैसे युवा या छुट्टी लेकर घर पंहुचने वाला फौजी ही खरीदते थे।

लेखक ने अपने आत्म संसमरण ‘वो साल चौरासी’ को लेकर कई अनसुलझे सवालो पर कलम चलाई है। अपने निश्च्छल प्रेम ‘कमलनयनी’ के अलावा लेखक चाहे मृगनयनी, मंदाकिनी से अवश्य मिले होंगे पर वह कमलनयनी को ही पाना चाहते थे। इसी लिहाज से वह दो साल बाद जब घर पंहुचे तो सबसे पहले लेखक ने घर पर कमलनयनी से शादी करने का प्रस्ताव रखा ही था कि उधर से लेखक के पीता ने लेखक के हाथ में एक निमन्त्रण थमा दिया और कहा कि खरगड पार करते हुए फलां की बेटी की शादी है वहां जाना होगा न्यूता देने अर्थात शादी में सम्मिलित होने। दरअसल यह शादी कमलनयनी की ही थी। लेखक पर क्या क्या बिती होगी यह आपको पुस्तक पढने से मालूम हो जायेगा। इधर कमलनयनी को समझने के लिए इतना ही काफी है कि दो साल तक लेखक के इन्तजार में रही कमलनयनी रोज खरगड नदी में उसी गेठी के पेड़ के पास जाती थी जहां वे मिलते थे। गम के आंसुओं के साथ गेठी के पेड़ पर अपनी दरांती से घाव कर देती थी। दो साल के इस इन्तजार में कमलनयनी ने उस गेठी के पेड़ पर 730 घाव किये थे।

कुलमिलाकर लेखक ने अपने ‘प्रेम’ के बहाने आज के तार तार होते रिश्ते, 40 साल पूर्व की परस्परता, तब की रिश्तो की मजबूती और संस्कार सहित तीज त्यौहार के अलावा पहाड़ी जन जीवन को बहुत करीने से शब्दापित किया है। जबकि इस पुस्तक में गढवाली शब्दो का अच्छा खासा संग्रह पढने को मिलता है। कुछ ऐसे शब्द भी हैं जो अब प्रचलन में नहीं है। पहाड़ी संस्कृति की इस पुस्तक मे स्पष्ट झलक है। कई ऐसे उत्पादो, बर्तनो, संसाधनो का जिक्र है जिसे लेखक ने खुद भोगा है। परन्तु आज वे सभी इतिहास बनकर रह गये है। यह अवश्य है कि लेखक ने जिस तरह से कमलनयनी को समय दिया उस तरह से पुस्तक के संपादन में कतई भी समय नहीं दिया है। कह सकते हैं कि कमलनयनी और धर्मा जोगी के निश्च्छल प्रेम के बहाने 16 अध्याय और 108 पृष्टो वाली यह संस्मरणात्मक पुस्तक पहाड़ को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

समीक्षक – प्रेम पंचोली
लेखक – वरिष्ठ पत्रकार मनोज इस्टवाल
पुस्तक – वो साल चौरासी (आत्म संस्मरण)
प्रकाशक – हिमालयन डिस्कवर फाउण्डेशन, पो॰ धारकोट, जिला पौड़ी गढवाल
मूल्य – 299 रू॰

 

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