Sunday, September 13, 2026
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अंकिता हत्याकांड : जांच और सरकार के रुख पर ढाई साल बाद भी संदेह क्यों? पढ़े वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेखर का यह आलेख।

By – Arvind shekhar

अंकिता भंडारी हत्याकांड में आखिर नाइंसाफी का शक क्यों बना हुआ है? नीचे कुछ सवाल हैं, जिनका जब तक उत्तर नहीं मिलता, जनता न्याय की मांग करती रहेगी।

1-सरकार और भाजपा का किसी वीआईपी के होने से इनकार। बजाय अंकिता भंडारी की सीबीआई जांच व न्याय की मांग करने वाले विपक्ष के पुतले फूंकना। विधानसभा में यहां तक दावा करना कि वीआईपी रिजॉर्ट के एक कमरे का नाम था। जबकि कोटद्वार की जिला अदालत के फैसले में साफ कहा गया है कि अंकिता पर वीआईपी को स्पेशल सर्विस (यौन सेवाएं) देने का दबाव बनाया गया

2-उर्मिला सनावर और सुरेश राठौर की बातचीत में जिन वीआईपी के नामों का खुलासा हुआ उनके अंकिता हत्याकांड के दिन की मोबाइल लोकेशन व कॉल रिकार्ड की जांच की बजाय, पहले उर्मिला राठौर के चरित्र पर ही उंगली उठाना। इसे राजनीतिक साजिश बताना। फिर रिकॉर्डिंग को ही संदिग्ध बताना

3-उर्मिला को सुरक्षा देने की बजाय उस पर उत्तराखंड पुलिस का दो नई एफआईआर दर्ज करना। भाजपा का इस खुलासे को “झूठा” बताकर मानहानि का नोटिस भेजना। उर्मिला के विरुद्ध गैर जमानती वारंट जारी कर जगह जगह पुलिस दबिश। यह व्हिसलब्लोअर को निशाना बनाने जैसा है।

4- सोशल मीडिया पर उर्मिला सनावर और सुरेश राठौर की बातचीत से कई खुलासे होने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी सीबीआई जांच की दबाव बढ़ने पर भी उससे इनकार करना और बजाय ऑडियो सबूतों की जांच करने की बजाय जनता से सबूत मांगना और कहना कि वह पुख्ता सबूत दे।

5-सत्ता पक्ष द्वारा सीबीआई जांच न कराने के लिए एक दलील दी जा रही है कि हाईकोर्ट व सुप्रीमकोर्ट ने एसआईटी जांच की दिशा ठीक बताते हुए इसकी जरूरत नहीं बताई थी लेकिन हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने यह बात तब कही थी जब जांच जारी थी और जिला अदालत ने फैसला नहीं दिया था।
कोटद्वार जिला अदालत (अपर जिला एवं सत्र न्यायालय) में सुनवाई 2023 से मई 2025 में पूरी हुई। फैसला 30 मई 2025 को आया। जबकि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने दिसंबर 2022 में सीबीआई जांच की याचिका खारिज करते हुए एसआईटी की जांच पर भरोसा जताया था। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई जांच की मांग खारिज कर दी थी। लेकिन उर्मिला और सुरेश राठौर की बातचीत के जो ऑडियो रिकार्ड अब सामने आए हैं वे वीआईपी एंगल को मजबूती देते हैं और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच को भी क्योंकि सीबीआई पर भी भरोसा कम होता रहा है।

6- घटना के बाद वनंतरा रिजॉर्ट के उस कमरे को बुलडोजर से तुड़वा देना जहां उसके अहम सबूत हो सकते थे। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुरुआत में इसे “बुलडोजर न्याय” बताते हुए ट्वीट किया था, लेकिन बाद में उन्होंने और जिलाधिकारी ने इनकार किया कि कोई ऐसा आदेश दिया गया था। यह विरोधाभास लोगों में शक पैदा करता है कि क्या यह सबूत मिटाने की साजिश थी।

7- अंकिता के कमरे के बिस्तर को जला देना और उन्हें स्वीमिंग पूल में डाल देना। क्या यह सबूत मिटाने का सबूत नहीं

8- बुलडोजर चलाने का सबसे पहले श्रेय लेने वाले लोगों से सबूत नष्ट करने को लेकर पूछताछ न होना मामला न दर्ज करना। वीआईपी एंगल पर कुछ खास जांच ही न होना।

9-रिसॉर्ट वह जगह थी जहां अंकिता पर दबाव डाला गया था और संभवतः हत्या हुई थी। फोरेंसिक जांच के लिए यह जगह महत्वपूर्ण थी, लेकिन इसे नष्ट करने से डीएनए, सीसीटीवी फुटेज या अन्य सबूत हमेशा के लिए गायब हो गए।

10-हत्या की बात सामने आने के बाद तीन दिन तक मामले की एफआईआर न लिखना। थाना क्षेत्र के नाम पर अंकिता के परिजनों को इधर-उधर भटकाना

11- बुलडोजर से सबूत नष्ट होने की बात सामने आने पर पुलिस कार्मिक का वह वीडियो बयान जो कहता है कि बुलडोजर चलने से पहले फोरेंसिक जांच के लिए सबूत इकट्ठे कर लिए गए थे

12- लेकिन बाद में यह तथ्य सामने आना कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में पुलकित आर्य और अंकिता का फोन नहर से बरामद तो हुआ था, लेकिन कई रिपोर्ट्स के अनुसार अंकिता का फोन पूरी तरह रिकवर नहीं हो पाया या उससे सभी डेटा नहीं मिला। पुलकित आर्य का फोन भी जांच में पूरी तरह उपलब्ध नहीं था, और कुछ सबूत (जैसे रिजॉर्ट की सीसीटीवी और बेडशीट) नष्ट हो गए थे।

13-मामले की शुरुआत से ही आरोप है कि अंकिता को एक “वीआईपी” अतिथि को “एक्स्ट्रा सर्विस” देने के लिए मजबूर किया गया था। पुलकित आर्य और उसके साथियों ने कथित तौर पर उसे 10,000 रुपये का लालच दिया, लेकिन उसने इनकार कर दिया। यह “वीआईपी” कौन था? यह नाम आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ, जिससे शक है कि कोई बड़ा राजनीतिक व्यक्ति इसमें शामिल है।

14-लोग पूछते हैं कि अगर आरोप गलत हैं, तो स्वतंत्र जांच क्यों नहीं? कई सोशल मीडिया यूजर्स और विपक्षी नेता मानते हैं कि यह एक बड़े सेक्स रैकेट का हिस्सा था, जहां गरीब लड़कियों को निशाना बनाया जाता था। सजा सिर्फ तीन आरोपियों को मिली, लेकिन रैकेट का पूरा नेटवर्क उजागर नहीं हुआ, जिससे न्याय आंशिक लगता है।

15- मामले की जांच स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) को सौंपी गई, लेकिन परिवार, विपक्ष और यहां तक कि भाजपा के कुछ नेताओं ने सीबीआई जांच की मांग की लेकिन सरकार इससे बच रही है यह राजनीतिक संरक्षण का संकेत देता है।

16-अंकिता के परिवार ने बार-बार कहा कि न्याय नहीं मिला। मां ने तो एक वीआईपी का नाम तक लिया लेकिन इस पर सरकार और जांच टीम चुप रही और इस कोण पर विचार ही नहीं किया गया।

17- अंकिता ने अपने दोस्त पुष्पदीप (जम्मू में रहने वाले) से व्हाट्सएप चैट में बताया था कि:रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और मैनेजरों (अंकित गुप्ता, सौरभ भास्कर) उसे वीआईपी गेस्ट को “स्पेशल सर्विस” या “एक्स्ट्रा सर्विस” (यौन संबंध) देने के लिए दबाव डाल रहे थे। हाल में एसआईटी में शामिल रहे हरिद्वार के एसपी देहात शेखर सुयाल ने प्रेस कांफ्रेस कर वनंतरा आए एक केंद्रीय मंत्री से मिलते जुलते नाम का नाम लिया हालांकि उन्हें क्लीन चिट भी दी लेकिन यह नहीं बताया कि उस व्यक्ति के कॉल रिकॉर्ड आदि की जांच की गई या नहीं।

18- उर्मिला सनावर और सुरेश राठौर की अब एक नई ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया में है जिसमें अंकिता कांड में शामिल एक वीआईपी के भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी को महिलाएं उपलब्ध कराने का जिक्र है। यह संकेत करता है कि अंकिता मामले की निष्पक्ष व ठोस जांच हुई तो राष्ट्रीय स्तर तक के किस तरह के राजनीतिक सेक्स रैकेट का खुलासा हो सकता है। इसकी सियासी आंच से कौन-कौन झुलसेंगे कहा नहीं जा सकता।

इस तरह देखें तो अंकिता हत्याकांड अनैतिक सत्ता संस्कृति, उसके काम करने के आपराधिक तौर तरीकों की एक भयावह मिसाल है।

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