केरल की राजनीति पर थरूर का असर
By – Prabhat Dabral
शशि थरूर छात्र जीवन से ही घनघोर दक्षिणपंथी थे. ये बात सेंट स्टीफ़न्स कॉलेज में थरूर के मित्र, सहपाठी और बीजेपी सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने पिछले दिनों एक पाडकास्ट में कही.
छात्र जीवन में दासगुप्ता घनघोर वामपंथी थे. वो जमाना ही ऐसा था. अच्छे कालेजों के मेधावी छात्रों में वामपंथी होना एक फैशन था. ऐसे माहौल में दक्षिण पंथी होना बड़ी बात थी. थरूर दक्षिणपंथी थे इसलिए सेंट स्टीफेन्स में अलग दिखते थे.
जेएनयू जैसे वामपंथियों के गढ़ में जय शंकर भी ऐसे ही अलग दिखते थे- वो फ्री थिंकर नाम के संगठन से जुड़े थे. ये संगठन पूरी तरह से दक्षिणपंथी तो नहीं था लेकिन वामपंथ विरोधी था.
निर्मला सीतारमन भी जेएनयू में फ्री थिंकर ही थीं. लेकिन न तब उन्हें वहां कोई जानता था न आज जेएनयू वाले उन्हें अपना बताने में गर्व महसूस करते हैं.
बहरहाल आज बात शशि थरूर की हो रही है.
थरूर इस समय कांग्रेस में हैं. माडर्न क़िस्म के आदमी हैं. इस क़िस्म के दक्षिणपंथी कांग्रेस में खप जाते हैं. लेकिन बहुत ऊपर नहीं जा पाते. कांग्रेस का मूल चरित्र बाईं तरफ़ झुका हुआ मध्य मार्गी है. ये बात थरूर को खल रही है. इसलिए जब मौक़ा मिलता है वो बीजेपी की तरफ़ हाथ बढ़ा देते हैं.
सब जानते हैं कि जयशंकर और निर्मला सीतारमन जैसे फ़्री थिंकर थरूर के लिए बीजेपी में बैटिंग करते हैं. ये दूसरी बात है कि इस प्रकार के जेएनयू की छाप वाले पढे लिखे दक्षिणपंथियों की बीजेपी के संगठन में कुछ चलती वलती नहीं है.
लेकिन मानना होगा कि कांग्रेस में रहते हुए भी थरूर बीजेपी के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो रहे हैं- खासकर केरल में.
केरल में बहुत से लोग हैं जो कम्युनिस्टों और कांग्रेस, दोनों से नाराज हैं लेकिन बीजेपी की बात करते हुए घबराते हैं. केरल की राजनीति का तेवर ही कुछ ऐसा है कि बीजेपी का समर्थक होना समाज में अच्छी बात नहीं माना जाता.
इधर कुछ बदलाव आता दिख रहा है. कांग्रेस में रहते हुए भी मोदी सरकार की तारीफ़ करके थरूर ने केरल में बीजेपी की स्वीकार्यता कुछ बढ़ा दी है.
पिछले दिनों माकपा और कांग्रेस से निकाले गए कुछ नेता बीजेपी में शामिल हुए. इनमें माकपा के एक पूर्व विधायक भी हैं जिन्हें चार साल पहले पार्टी ने निकाल दिया था. अब जाकर बीजेपी में जाने की हिम्मत जुटा पाए.
मुझे लगता है ये सिलसिला आगे बढ़ने वाला है. खुद थरूर भी लाइन में लगे ही हैं.







