. युगांतक लखन राणा
फिरोज गांधी भारतीय राजनीति के इतिहास के वे ‘दामाद’ थे, जिन्होंने ससुराल में सोफ़े पर बैठकर चाय पीने के बजाय, ससुराल की ही ईंट से ईंट बजाना बेहतर समझा।
फिरोज गांधी का जीवन किसी बॉलीवुड स्क्रिप्ट से कम नहीं था। एक पारसी लड़का, एक कश्मीरी पंडित लड़की के प्यार में पड़ता है। पिता (नेहरू जी) को लगा कि लड़का थोड़ा ज्यादा ही ‘क्रांतिकारी’ है, लेकिन इंदिरा जी अड़ गईं। अब नेहरू जी ठहरे लोकतंत्र के पुजारी, तो बेटी की ‘तानाशाही’ के आगे झुकना पड़ा।
सबसे मजेदार बात तो ‘गांधी’ सरनेम की है। आज के व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाले भले ही कुछ भी कहें, लेकिन फिरोज जहांगीर ‘घांडी’ से ‘गांधी’ इसलिए बने क्योंकि उन्हें महात्मा गांधी के आदर्शों से प्यार था। हालांकि सच ये भी है कि प्रयागराज के एक मस्जिद में फिरोज गांधी का कब्र आज भी है !
उन्होंने नेहरू को ‘ससुर’ और गांधी को ‘नाम’ के रूप में चुना—एक ने उन्हें सत्ता के गलियारे दिए, दूसरे ने उन गलियारों में आग लगाने की हिम्मत!
कल्पना कीजिए, आज के दौर में कोई दामाद अपने ससुर की कंपनी के घोटालों की फाइलें लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दे? फिरोज गांधी ने 1957 में यही किया था। नेहरू जी तब देश के निर्विवाद नायक थे, लेकिन फिरोज ने संसद में खड़े होकर मुंद्रा कांड की ऐसी परतें खोलीं कि नेहरू जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे सदन के नेता के रूप में जवाब दें या ससुर के रूप में गुस्सा करें।
मुंद्रा कांड (1957): LIC का वो ‘पहला पाप’
यह कांड फिरोज गांधी की राजनीति का शिखर था। यह वह समय था जब नेहरू का नाम ही कानून था, लेकिन फिरोज ने दिखाया कि लोकतंत्र में ‘जनता का पैसा’ किसी भी रिश्ते से ऊपर है।
हरिदास मुंद्रा नाम के एक शातिर सट्टेबाज ने नेहरू सरकार के कुछ अधिकारियों और वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ मिलकर एक योजना बनाई। LIC (भारतीय जीवन बीमा निगम), जो उस समय जनता के भरोसे का प्रतीक था, उसे मजबूर किया गया कि वह मुंद्रा की छह डूबती हुई कंपनियों के रद्दी शेयर खरीदे।
16 दिसंबर 1957 को संसद में फिरोज गांधी ने जब फाइलें खोलीं, तो सन्नाटा पसर गया। उन्होंने तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा— “क्या यह सरकार का काम है कि वह सट्टेबाजों के कचरे को जनता की गाढ़ी कमाई से साफ करे?”
यह शायद इतिहास का पहला उदाहरण था जहाँ डाइनिंग टेबल पर बैठा व्यक्ति (दामाद) सुबह संसद में जाकर अपने ही मेजबान (ससुर) की सरकार का ‘कबाड़ा’ कर रहा था। मुंद्रा कांड ने नेहरू को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें अपने सबसे प्रिय वित्त मंत्री की बलि देनी पड़ी और सट्टेबाज मुद्रा को जेल भेजना पड़ा
उन्होंने LIC के पैसे के दुरुपयोग को ऐसे पकड़ा जैसे कोई अनुभवी जासूस। नतीजा? वित्त मंत्री का इस्तीफा हो गया और ससुर-दामाद के बीच डिनर टेबल पर सन्नाटा छा गया। फिरोज गांधी ने साबित किया कि “ससुराल गेंदा फूल” हो सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार “कांटों की सेज” ही होगा।
टेल्को (TELCO) विवाद: पूंजीवाद पर प्रहार
फिरोज गांधी केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि ‘कॉर्पोरेट लूट’ के भी सख्त खिलाफ थे। 1950 के दशक में टाटा की कंपनी TELCO (अब टाटा मोटर्स) रेलवे के लिए स्टीम इंजन बनाती थी।
* विवाद की जड़: फिरोज गांधी ने संसद में डेटा के साथ साबित किया कि TELCO जो इंजन बना रही है, उसकी लागत बहुत कम है, लेकिन वह सरकार से इसकी वसूली ‘सुनार की दुकान’ वाले भाव में कर रही है।
* गंभीर विश्लेषण: उन्होंने तर्क दिया कि जब देश गरीबी से लड़ रहा है, तब एक निजी कंपनी को ‘पब्लिक एक्सचेकर’ (सरकारी खजाने) से इतना मोटा मुनाफा क्यों दिया जा रहा है?
* परिणाम: उनके इस तेवर ने सरकार को मजबूर किया कि वह रेलवे इंजनों की कीमतों की समीक्षा करे। यह फिरोज गांधी ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति को सिखाया कि “देशभक्ति का मतलब सरकार की जी-हुजूरी करना नहीं, बल्कि जनता के पैसे की चौकीदारी करना है।”
3. फिरोज गांधी एक्ट: पत्रकारों का ‘अभय दान’
अगर आज भारत के पत्रकार संसद की कार्यवाही को खुलकर लिख पाते हैं, तो इसका श्रेय फिरोज गांधी को जाता है।
* व्यंग्यपूर्ण विडंबना: फिरोज खुद एक पत्रकार थे और वे जानते थे कि सच लिखना कितना ‘महंगा’ पड़ता है। 1956 में उन्होंने एक कानून पास करवाया जिसने प्रेस को सुरक्षा दी।
फिरोज गांधी एक्ट (1956) उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उससे पहले अखबार वाले डरते थे कि कहीं संसद की बात छापने पर जेल न हो जाए। फिरोज ने कहा—”जनता ने हमें भेजा है, तो जनता को पता होना चाहिए कि हम वहां मूंगफली छील रहे हैं या काम कर रहे हैं।” विडंबना देखिए, जिस आज़ादी के लिए पति ने लड़ाई लड़ी, उसी को पत्नी (इंदिरा जी) ने 1975 में ‘इमरजेंसी’ के संदूक में बंद कर दिया। फिरोज गांधी अगर उस समय होते, तो शायद अपनी ही पत्नी की सरकार के बाहर ‘धरने’ पर बैठने वाले पहले व्यक्ति होते।
हँसी-मजाक से इतर, फिरोज गांधी का व्यक्तित्व बहुत गहरा और गंभीर था। वे केवल एक ‘विद्रोही’ नहीं थे, वे एक बेहद पढ़ा-लिखा और मेहनती सांसद थे। वे आंकड़ों के जादूगर थे।
उन्होंने सत्ता के सबसे करीब रहकर भी सत्ता की चापलूसी नहीं की।
फिरोज और इंदिरा का रिश्ता किसी ग्रीक ट्रेजेडी (Greek Tragedy) जैसा था। वे एक-दूसरे से प्यार तो करते थे, लेकिन फिरोज की ‘आजाद खयाली’ और इंदिरा की ‘सत्ता की मजबूरी’ के बीच एक गहरी खाई थी।
आज के दौर में जहाँ लोग ‘टिकट’ के लिए अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, फिरोज गांधी ने अपनी विचारधारा के लिए अपना ‘घर’ (तीन मूर्ति भवन) तक छोड़ दिया और एक छोटे से सरकारी बंगले में रहने चले गए।
फिरोज गांधी को इतिहास ने थोड़ा भुला दिया। शायद इसलिए क्योंकि वे “फिट” नहीं बैठते थे। न वे पूरी तरह कांग्रेस के ‘दरबारी’ बन पाए, और न ही विपक्ष के ‘मोहरे’। वे बस एक ‘गांधी’ थे, जो अपनी पत्नी के सरनेम में तो अमर रहे, लेकिन अपनी आवाज़ में थोड़े अनसुने रह गए। फिरोज गांधी शायद दुनिया के इकलौते ऐसे दामाद थे जिन्हें “प्रधानमंत्री आवास” (तीन मूर्ति भवन) में रहना रास नहीं आया। वे उस सोने के पिंजरे को छोड़कर अपने छोटे से सरकारी बंगले में चले गए, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री का ‘दामाद’ कहलाने से ज्यादा गर्व ‘रायबरेली का सांसद’ कहलाने में था।
इतिहास का सबसे क्रूर मजाक यह है कि उनकी मृत्यु के बाद, उनकी अपनी पत्नी इंदिरा गांधी ने 1975 में इसी कानून का गला घोंट दिया। फिरोज ने जिस ‘कलम’ को आज़ाद किया था, उनकी अर्धांगिनी ने उसी कलम की स्याही सुखा दी।
उनकी मौत 48 साल की उम्र में हुई। शायद उनका दिल इतना बड़ा था कि उसमें नेहरू की नाराजगी, इंदिरा का प्रेम और देश के घोटालों का बोझ—तीनों एक साथ नहीं समा सके।
फिरोज गांधी वह ‘टॉर्च’ थे जिसने अंधेरे में उजाला तो किया, लेकिन उस उजाले में सबसे पहले टॉर्च पकड़ने वाले का ही हाथ जला। वे भारतीय राजनीति के वह ‘आज़ाद पंछी’ थे जिसने पिंजरे (सत्ता) के अंदर रहकर भी अपनी चोंच मारना नहीं छोड़ा।







