Friday, September 11, 2026
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पूर्व पर्वतीय विकासमंत्री बर्फिया लाल जुवांठा के साथ के संस्मरण को बता रहे है प्रसिद्ध विचारक, लेखक गोविंद प्रसाद बहुगुणा।

Jewel of Mountains of Snow “बर्फिया लाल” एक संस्मरण- गोविंद प्रसाद बहुगुणा ।

यह टाइटल जब मैने उन्हें दिया था तब अपने मित्र स्व० बर्फिया लाल जुआंठा जी बोले थे यार! सचमुच ऐसा ही हुआ था कि जिस दिन मैं पैदा हुआ था जिस दिन हमारा कुमोला गाऊँ का घर पूरा बर्फ से ढक गया था तो मेरे माँ – बाप ने मेरा नाम “बर्फिया” रख दिया।फिर मैने पूछा कि “जुआंठा” नाम क्यों पड़ा, तब कहने लगे कि अरे भाई! गरीबी इतनी थी कि एक ही वस्त्र पहिनते- पहिनते उसमें जूँए पड़ जाते थे इसलिए “जुआंठा” बन गए I

एक बार सहपाठियों के सुझाव पर उन्होंने अपना नाम बदलने की घोषणा अखबार में भी कर दी थी और अपना नाम अरविन्द मोहन रख दिया था ,लेकिन बाद में फिर अपने पुराने नाम पर आ गये थे।

वे दोस्तों के दोस्त मस्त- मौल्ला तबियत के इन्सान थे, उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भूगोल विषय में एम०ए० पास किया था I उन्ही दिनों एक बार जव यूनिवर्सिटी में किसी बात को लेकर छात्रों ने हड़ताल कर दी थी तो उसी दौरान पुलिस हॉस्टल में घुस गई थी। बर्फिया लाल जी कच्छा बनियान पहने हॉस्टल के लॉन पर किताब पढ़ने में मशगूल थे I पुलिस ने उन पर लाठी तानी तो बेचारे किताब छोड़कर उसी पोशाक में डायमंड जुबली हॉस्टल की तरफ भागे लेकिन वहाँ भी पुलिस देखी तो पास में बुढ़िया की चाय की दूकान में शरण ली इस दुकान में हम सुबह- शाम चाय पीने‌जाते थे।शायद इसी घटना ने ही उनको राजनीति में प्रवेश करने की प्रेरणा दी होगी।

आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में वह भारी बहुमत से विधायक चुने गए थे और पहली बार की विधायिकी में ही उत्तरप्रदेश सरकार में पर्वतीय विकास मंत्री बने। उनका जनता से सीधा संपर्क रहताथा, उनमें ज़रा भी अहंकार नहीं आया, वे दो बार कैबिनेट स्तर के मंत्री रहे I

जब वे विधायक बने थे तब मैं अपने विभागीय कार्य से कानपुर से लौटते समय लखनऊ में विधायक निवास दारूल सफा में उनसे मिलने गया था तो बहुत खुश हुए थे ,बोले मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताओ, कैसे आना हुआ ? मैने कहा मैं कोई फरियाद लेकर नहीं आया था बस आपसे मिलने की इच्छा थी, तो चले आया ,क्या दोस्तों से मिलने के लिए कोई बहाना ढूंढना पड़ता है?

तब तो और भी खुश हुए और शाम को लखनऊ चारबाग रेलवे स्टेशन तक मुझे छोड़ने आए थे …
उनके बचपन के और जवानी के दिनों के कई मज़ेदार संस्मरण मेरे पास हैं ,लेकिन उनके बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे I पुरोला बाजार में जब उनके स्मारक पर उनकी मूर्ति देखी तो उनकी यादें और भी भावुक कर गई।

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