Saturday, September 12, 2026
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पर्यटन के साथ कचरा निष्पादन भी हो। हिमालय में शीतकालीन पर्यटन के प्रभाव।

– पर्यटन के साथ कचरा निष्पादन भी हो।

– हिमालय में शीतकालीन पर्यटन के प्रभाव
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By – Suresh bhai

सन् 2000 में जब उत्तराखंड राज्य बना तो उस समय गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ एस पी सिंह जलवायु परिवर्तन के अनुसार शीतकालीन पर्यटन पर सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहे थे।तब तक हिमालय की चोटियों में बर्फ भी खूब दिखाई देती थी। अब तेजी से जलवायु बदल रही है। अप्रैल से ही भारी बारिश की शुरुआत हो रही है जो अक्टूबर तक भीषण तबाही की स्थिति पैदा कर रही है। ऐसी स्थिति में पर्यटन व्यवसाय पर खतरा बढ़ जाता है। जिसके लिए शीतकालीन पर्यटन पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने गत वर्ष 6 मार्च 2025 को हर्षिल में एक ट्रैक और बाइक रैली को हरी झंडी देते हुए शीतकालीन पर्यटन के लिए “घाम तापो”( धूप सेको) पर्यटन का आवाह्न किया है। 2025 के अंत तक का आंकड़ा है कि उत्तराखंड में 6 करोड़ 3 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे है जिसमें 1.92 लाख विदेशी सैलानी भी आये। टिहरी झील को देखने वालों की संख्या भी 5 लाख तक बढ़ गयी है। यही आकर्षण जम्मू कश्मीर और हिमाचल की खूबसूरत वादियों में पहले से मौजूद हैं।
घाम तापो पर्यटन के संदेश का महत्व इसलिए भी है कि ऊंचाई के क्षेत्रों में बर्फ लगभग कम हो रही है।शीतकाल की कंप कंपाती ठंड के दौरान जिन पहाड़ों पर बर्फ चमकती थी वे अब धूप में काले दिखाई दे रहे हैं और पर्यटकों को निश्चित ही घाम सेकने का मौका मिल ही गया है।
जलवायु संकट में यह सबसे चिंताजनक स्थिति है कि मैदानी क्षेत्रों के लोग ठंडी हवा, शुद्ध पर्यावरण की आश में हिमालय की ओर रुख कर रहे हैं। यह देखते हुए उत्तराखंड में 5700 -7756 मीटर तक की ऊंची से ऊंची विश्व प्रसिद्ध 83 अन्य चोटियों तक भी पर्यटकों को पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। इसमें मुख्य रूप से कामेट, नंदा देवी ईस्ट, चौखंबा समूह, त्रिशूल समूह, शिवलिंग, सतोपंथ, नीलकंठ, पंचाचूली जैसे ऊंचे पर्वत शामिल है। अकेले उत्तराखंड को लगभग 24 हजार करोड़ तक का राजस्व मिल रहा है जिसका यहां की जीडीपी में 23 प्रतिशत योगदान है।भारतीय पर्वतारोहियों के लिए शुल्क लगभग खत्म कर दिया गया है। विदेशी पर्यटकों को भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन के द्वारा निर्धारित शुल्क देना पड़ता है। राज्य में लगभग 5 हजार होमस्टे जिसके लिए 20 लाख तक का मुद्रा लोन भी दिया जाता है।और हर रोज नए-नए होमस्टे बन रहे है।
देश को भी पर्यटन व्यवसाय से 15.73 लाख करोड़ रुपये की आय हो रही है जो जीडीपी का 5.22 प्रतिशत है जिसे 2030 तक 7 प्रतिशत तक पहुंचाने का प्रयास है।
केंद्र सरकार ने 2026-27 के बजट में उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू कश्मीर में “पर्यावरण अनुकूल माउंटेन ट्रेल्स” विकसित करने की घोषणा की है। जिसका सही रोड मैप तो भविष्य में ही सामने आयेगा।
लेकिन पर्यटन व्यवसाय में सुधार करने की बहुत आवश्यकता है जिसमें आंकड़े बताते हैं कि हिमालय के 11 राज्यों के शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 6346 मीट्रिक टन ठोस कचरा जमा हो रहा है। जिससे गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां प्रदूषित हो रही है जिसके कारण 1.9 अरब लोगों के पीने के पानी पर संकट खड़ा हो गया है। जम्मू कश्मीर में सर्वाधिक 1992 मीट्रिक टन और उत्तराखंड में 1528 मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है जिसकी बड़ी वजह पर्यटन है। बताया जा रहा है कि 30 हजार से अधिक वन प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। हिमालय क्षेत्र में जमा हो रहे कुल कचरे में से 75 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा है जिसमें से 85 प्रतिशत कचरा इकट्ठा ही नहीं हो पाता है।
हिमालय क्षेत्र में पर्यटकों द्वारा फैलाया जा रहे प्लास्टिक कचरे को हटाने की कोई व्यवस्था नहीं है जिससे जीवन दायिनी नदियों और ग्लेशियरों के आसपास प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। विंटर गेम्स के लिए विश्वविख्यात औली में बर्फ बहुत तेजी से पिघल रही है। इसका मुख्य कारण यह भी है कि चिन्हित किये गये पर्यटन एवं तीर्थ स्थलों पर मौजूदा समय में जितनी कैरिंग क्षमता है उससे कई हजार गुना लोग वहां पहुंच जाते हैं। इच्छित स्थान का दर्शन करने आ रहे लोग लंबी-लंबी कतारों में खड़े रहते हैं। उस दौरान सबसे अधिक कचरा विसर्जित होता है।और यदि कहीं पर कचरे के ऊंचे ढेर बन गये तो उसे थोड़ा आगे कहीं नदियों के किनारे पर ही जहां लोगों की नजर नहीं पहुंचती उडेल दिया जाता है। ऐसे उदाहरण मीडिया प्रसारित भी करता है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में बर्फ को देखने आये पर्यटकों ने हर्षिल में अंधाधुंध प्लास्टिक कचरा बिखेरा दिया था जिसे स्थानीय मवेशियां चरती नज़र आयी है। इस तरह बिखेरे जा रहे प्लास्टिक कचरे से हिमालय की सेहत बिगड़ रही है। राज्य और केंद्र सरकार पर्यटन के विकास के लिए जितना कुछ सोच रही है जिससे लगभग 8 करोड लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिलता है। लेकिन उस हिसाब से पर्यटन एवं तीर्थ स्थलों तक पहुंचने वाले सैलानियों, और तीर्थ यात्रियों के द्वारा पहुंच रही प्लास्टिक के नियंत्रण पर कोई ठोस नीति नहीं है। अच्छा तो यह होता है कि प्रत्येक द्वारा विसर्जित किये जाने वाले प्लास्टिक कचरे को वे अपने साथ वापस ले जाते। दूसरा यह है कि जहां-जहां पर सुरक्षा के लिए पुलिस तैनाती की गई है वहां शराब और अन्य मादक पदार्थों को नियंत्रित करने के जो प्रयास किए हैं उसके अनुसार साथ में ले जाने वाले प्लास्टिक कचरे का भी निरीक्षण हो सकता है ताकि वापस लौटते समय उसकी जांच की जा सके और उचित स्थान पर कचरे का प्रबंधन हो।

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