उमेश डोभाल के 33वे स्मृति समारोह में अल्मोड़ा पहुंचे देशभर के जानेमाने पत्रकार।
By – Prem Pancholi
प्रेस क्लब अल्मोड़ा द्वारा आयोजित इस समारोह को वरिष्ठ पत्रकार और उमेश डोभाल न्यास के अध्यक्ष गोविंद पंत राजू संबोधित कर रहे थे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि तत्काल उमेश डोभाल की शहादत शराब के विरोध में हुई थी, यानी तब का आंदोलन शराब माफिया के खिलाफ था। कहा कि आज भी यही दौर फिर से आ गया है।उन्होंने चिंता व्यक्त की है कि वर्तमान में हमारा लोकतंत्र कमजोर हो गया है जो शराब के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। यही वजह है कि पत्रकारों पर प्रतिदिन उत्पीड़न के मामले सामने आ रहे है। उदाहरण दिया कि कोई जनप्रतिनिधि अधिकारी का सर फोड देता है, कोई अधिकारी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि क्या यह राज्य इसीलिए बनाया गया? वे बहुत दुखी मन से पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे कि राज्य में हमारे सामने बहुत चुनौतियां है। मगर सभी जनपक्षधारिता के पत्रकारो को लोकतंत्र के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करना होगा। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की है कि नए परिसीमन से उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से विधानसभा की सीटें घटाई जाने का संकट दिखाई दे रहा है, इस दिशा में भी कार्य करना होगा। कहा कि उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं है बल्कि एक विचार है।
वरिष्ठ पत्रकार पीसी तिवारी ने अल्मोड़ा पहुंचे पत्रकारों का स्वागत करते हुए कहा कि उत्तराखंड राज्य को 25 सालों में क्या मिला? कहा हम यानी हम सभी पत्रकार इस राज्य को विकास की पटरी पर नहीं ला पाए है। उन्होंने कहा कि इन 25 सालों में जिस तरह से विकास भटक गया है उसी तरह से पत्रकारिता भी भटक गई है। एक तरफ राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य का बुरा हाल है ही पर दूसरी तरफ गुंडागर्दी इस राज्य में तेजी से पनप रही है। जन आवाज कुंद हो गई है। भविष्य में यह खतरा बढ़ता ही जा रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि सवाल उठ नहीं रहे बजाय सवालों को दबाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उमेश डोभाल एक लंबी परंपरा के पत्रकार थे। वे जनपक्षीय पत्रकार थे और वे कभी समझौता नहीं करते थे। न कभी वे सत्ता के सामने झुके, यही पत्रकारिता है। दुख इस बात का है कि जिस तरह से मीडिया का विकास हुआ उस तरह से आवाज उठ नहीं रही है। कहा कि आज भी हम सभी को फिर से जागना होगा।
अल्मोड़ा के वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश पंत ने अपना उदाहरण देकर कहा कि जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए उन्हें कई मुकदमे झेलने पड़े है। यह भी कहा कि अल्मोड़ा में कई अन्य मूर्धन्य पत्रकार भी पैदा हुए जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर एक खास पहचान बनाई है। अल्मोड़ा शक्ति का इतिहास बताते हुए उन्होंने कहा कि यह अखबार लगातार जनहित के मुद्दे उठाता रहा। इस अखबार ने तत्काल के गोरे लोगों की चूल्हे हिलाकर रख दी थी। यह अखबार लगातार अंग्रेजों के कारनामो को उजागर करता रहा। खेद इस बात का है कि समाज एकजुट नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि समाज को एकजुट रहना बहुत जरूरी है। उन्होंने अल्मोड़ा से छपने वाले तत्काल के अखबारों के इतिहास पर विचार व्यक्त किए और बताया कि शक्ति से लेकर समता अखबार तक अल्मोड़ा के कई उदाहरण हम सभी के सामने है। ये वे अखबर रहें है जिन्होंने जन सरोकार को लगातार उठाया। स्वाधीनता के बाद भी ऐसे कई अखबार अल्मोड़ा से छपते रहे है। आज उन्हें दुख इस बात का है कि मीडिया के विभिन्न माध्यम सरकार के सामने क्यों घुटने टेक रहे है? यह बड़ा सवाल है।
मजदूरों के लिए लगातार लिखते रहे पत्रकार मुकुल ने कहा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बाद से अब तक मजदूरों की एक जैसी ही स्थितियां बनी है।
उत्तराखंड में लगे अधिक कारखाने राज्य बनने तक बंद हो गए। राज्य बनने के बाद यहां सिडकुल बना। सिडकुल में जो मजदूर कार्य कर रहे है उनकी स्थिति बद से बदस्तूर है। सर्वाधिक लोग यहां दैनिक मजदूर भी नहीं बल्कि ठेकेदारों के मार्फत कार्य कर रहे है अर्थात स्थाई कार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार ने “पेड बोर्ड” तक नहीं बना पाया। जबकि भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार मजदूरों को मिनिमम पेड 30 हजार रूपये प्रति माह मिलना चाहिए है, पर उत्तराखंड में ऐसे मजदूरों को 10 से 12 हजार रूपये मासिक मजदूरी मिल पा रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार ईश्वर जोशी ने कहा कि उत्तराखंड में वन पंचायतों में हुए संशोधन राज्य के हित में बिल्कुल नहीं है। जंगलों में आग की घटनाएं बहुत अधिक बढ़ रही है। यहां तक कि वन विभाग के पास आग बुझाने के लिए आवश्यक सामग्री तक नहीं मिलती। इसी तरह जंगली जानवरों का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। श्री जोशी ने कहा कि किसान सम्मान निधि पात्र व्यक्ति को नहीं मिल रही है।
समारोह में पहुंचे पत्रकार विमल भारती ने कहा कि उत्तराखंड में लगातार पत्रकारों पर हमला हो रहा है। उन्होंने अपनी आप बीती सुनाई की जन सरोकारो की खबर उठाने का उन्हें यह सिला मिला कि पुलिस ने उन्हें बहुत प्रताड़ित किया है। उनके घर पर बुलडोजर चलाया गया। जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके ले गई तो उन्होंने पुलिस से पानी मांगा था। पर पुलिस ने पानी के बदले उन्हें चमड़े के जूते में पानी डालकर पिलाया है। उन्होंने अपनी आप बीती सुनाते हुए आगे बताया कि पुलिस ने उन्हें शौचलय में ले जाकर बहुत बुरी तरह से पीटा है। यही नहीं शौचालय मे लिटाकर उनके टांगों पर चढ़े और बुरी तरह पीटकर जख्मी कर दिया। कहा कि पुलिस ने उन पर झूठा मुकदमा किया है। मगर न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी कोई गलती नहीं थी, वे तो विकास के कार्यों में हो रही गड़मड़ी पर रिपोर्ट कर रहे थे। बस यही उनके लिए खतरा बनकर आया है।
इतिहासकार निर्मल जोशी ने अल्मोड़ा की पत्रकारिता के इतिहास पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अल्मोड़ा सांस्कृतिक शहर का इतिहास 6000 साल पुराना है। क्योंकि “सवाधान क्रिया” के यहां अवशेष मिलते है। अग्रेजों ने अल्मोड़ा को पूर्वी दिशा की तरफ बसाया है। जबकि कत्यूरो और चंदों ने भी अल्मोड़ा की समृद्धि बनाने में योगदान दिया।कहा कि 1815 में अग्रेजों का अल्मोड़ा में आगमन हुआ। एडम्स गर्ल्स कॉलेज, रैमजे कॉलेज आदि आदि यहां के विकास की कहानी बताते हैं। कहा कि कालांतर में अल्मोड़ा को अलकापुरी भी कहते थे। उन्होंने कहा कि देश दुनिया के नामी लोगों और राष्ट्रीय आदोलनों का यह शहर रहा है।
आंदोलनकारी आनंद सिंह राणा ने कहा कि वर्तमान का दौर बड़ा ही खतरनाक चल रहा है। आज आवाज दबाई जा रही है। कलम खरीदी जा रही है, या कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। श्री राणा ने कहा कि यह इस दौर का सबसे स्याह चेहरा सामने आ रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र का लगातार ह्रास हो रहा है। उत्तराखंड राज्य में भी यही हाल है। क्षेत्रीय ताकतों को खत्म करने का एक राजनीतिक षडयंत्र चलाया जा रहा है। आज के लोकतंत्र में “राइट टू रिकॉल” का कोई सिस्टम ही नहीं बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी होना चाहिए कि यानी मतदान के बाद आनुपातिक रूप से भी जनप्रतिनिधियों का चयन होना चाहिए, जो नहीं हो पा रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी ने अपने संबोधन में जनसरोकार के लिए प्रतिबद्ध उमेश डोभाल को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि अल्मोड़ा प्रेस क्लब का वे आभार करते हैं कि आज ऐसा समय है जो पत्रकारों के खिलाफ है। ऐसे वक्त इस तरह के आयोजन करना बड़ी बात है। कहा कि उमेश डोभाल के नाम पर हर साल एकत्र होने का यह भी संदेश है कि प्रतिशोध की धारा अभी समाप्त नहीं हुई है। यानी अपनी सही दिशा में जा रही है। वे इस बात से खफा हुए कि काशीपुर के विमल भारती को जो प्रशासन ने प्रताड़ना दी है वह किसी भी सूरत में मानवीयता नहीं थी। इस घटना को सुनने के बाद ऐसा लगता है कि पत्रकार विमल भारती के मामले में सत्ता जितनी नीचे गिर सकती थी उतनी गिरी।
उन्होंने कहा कि अब तो उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री भी बहुत निराशाजनक बाते करते है। उन्होंने उदाहरण दिया कि उत्तराखंड में 13 ऐसी घटना हुई जो किसी “ऐप्सटिन फाइल” से कम नहीं है। इसके अलावा उत्तराखंड में मानव वन्य जीव संघर्ष बढ़ रहा है। यह भी दुखद है।
वरिष्ठ पत्रकार और नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन शाह ने कहा कि अल्मोड़ा एक ऐसी जगह है जहां विचारों की विविधता है। उन्होंने कहा कि उमेश डोभाल की जो चेतना थी वह शायद अब कभी हो पाए। पर यह दुर्लभ मौका है कि भविष्य में हम सभी अल्मोड़ा में ऐसा ही लगातार बैठे। चाहे औपचारिकता के रूप में क्यों न बैठे। दरअसल अल्मोड़ा में मुद्दों के साथ बैठने का एक मतलब होता है।
जनकवि बल्ली सिंह चीमा ने अपनी कविता के मार्फत कहा की – “कभी सुख, कभी शैलाब, आहट मार डालेगी…..। उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रीय किसान मोर्चा से जुड़े है। कहा कि 26 नवंबर 2021 को जो किसान आंदोलन हुआ था वह देशभर के किसानों के जमीन के हक की लड़ाई थी। श्री चीमा ने कहा कि भारत का किसान कर्जे में डूबा है। आज किसानों को MSP चाहिए। मगर ऐसी व्यवस्था बनाए कौन? क्योंकि सरकार आज उद्योगपतियों की जो बन बैठी है। इसका किसान संगठन विरोध कर रहे है। उन्होंने समाजवादी लोहिया की बात को संबद्ध करते हुए कहा कि जब सड़के खाली हो तो संसद आवारा हो जाती है। कहना नहीं चाहिए हमारी संसद आवारा नहीं लंपट जो बनती जा रही है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार रमेश जोशी और विभु ने संयुक्त रूप से किया है।







