उतराखण्ड परिवहन निगम का हाल बडा ही हास्यस्पद और चौंकाने वाला है। हर विभाग के भ्रष्टाचार के मामले सामने आते है। इस विभाग के मामले एकदम सभी के सामने रोज आते है। मगर क्या मजाल कोई बोलकर दिखायें।
हम यहां आज देहरादून से कुमाऊ क्षेत्र में जाने वाली परिवहन निगम की बसों की बात कर रहे है। प्रतिदिन-रात को देहरादून से उत्तराखण्ड परिवहन निगम की बसे कुमाऊ क्षेत्र में आना जाना करती है जो सभी को मालूम भी है। इन बसों के चालक परिचालको को शख्त आदेश है कि अनुबंधित ढाबो पर ही यात्रियों को भोजन, जलपान करवाने के लिए बस रोकी जाये। यदि किसी कारणवस या समय के अभाव में बस के चालक परिचालक ने इन ढाबो पर बस नही रोकी तो प्रति राउण्ड के हिसाब से परिचालक से रू॰ दो हजार का जुर्माना वसूला जायेगा। अब मालूम कैसे होगा कि चालक ने अनुबंधित ढाबे पर बस नहीं रोकी, इसके लिए भी विभाग के अधिकारियों ने बाकायदा मैकनिज्म बना रखा है कि जब ढाबे पर बस रूकेगी तो ढाबा मालिक 150 रू॰ की पर्ची काटेगा और इस धनराशी को परिचालक परिवहन विभाग के खाते में जमा करना होगा। यदि इस धनराशी को जमा नहीं करेगा तो अमुक परिचालक की तनख्वा से रू॰ दो हजार जुर्माने के तौर पर काट दिये जायेगे। इससे मालूम होता है कि बस अनुबंधित ढाबे पर रूकी या नहीं। अर्थात इस पर्ची के मार्फत ही आागे की सभी हदे पार होती है। यहां समझना है कि ढाबे वालों के तार सीधे परिवहन विभाग के उच्च अधिकारियों से जुड़े है।
ज्ञात हो कि हजारों यात्रियों का देहरादून – कुमाऊ क्षेत्र में रात दिन आना जाना होता है। ये हजारों यात्री हमेशा इन ढाबों में गंदे और मंहगे भोजन के शिकार होते है। यदि किसी यात्री ये कह दिया कि इतना मंहगा क्यों है या गंदगी है तो ढाबे वाले लट्ठी डंडा लेकर आते है और यात्रियों को अपनी जान बचानी मुश्किल हो जाती है। अब मजबूरन सरकार की इस परिवहन व्यवस्था को यात्री चुपचाप सहन कर लेते है। इसलिए कि कई बार इन ढाबों की शिकायत हुई है। मगर ढाबे वालों के कान तक जूं नहीं रेंगी। यही नहीं पानी की बोतल 30 रू॰, चाय 40 रू॰, शौच के 20 रू॰। इसके अलावा भोजन कर दिया तो ढाबे वाले के हिसाब से अमुक ग्राहक यानि यात्री को मुंह मांगा भुगतान करना पड़ता है। यानि जब आप ढाबे में प्रवेश करेंगे तो रेट लिस्ट देखकर लगेगा कि चलो खाना खा सकते है। जब तक आप भोजन करके काउण्टर की तरफ भुगतान करने जायेंगे तब तक पहले वाली रेट लिस्ट गायब हो जाती है और बहुत मंहगी वाली सामने होती है। इस तरह लोगों को मुगालते मे रखकर मुंह मांगा पैसा इन ढाबो में वसूला जाता है। यही नहीं इन ढाबो पर हाईजनिक का कोई मतलब नहीं है। न कोई यहां खाद्य सामग्री को जांच करने सक्षम अधिकारी, कर्मचारी पंहुचता है।
हमने उत्तराखण्ड परिवहन निगम के कुछ सेवानिवृत कर्मचारियों यथा चाालक परिचालकों से बात की है। उन्होंने बताया कि इन ढाबों पर बस रोकनी अनिवार्य है अन्यथा जुर्माना का शिकार होना पड़ता है। एक सेवानिवृत चालक ने कहा कि मंडावली ढाबे पर हुई तोड़ फोड़ के मामले की खबर आपने सुनी होगी। यदि सुनी तो क्यों हुआ ऐसा? मैने कहा मुझे अधिक मालूम नहीं। उन्होने कहा कि उक्त ढाबे वाले ने यात्रियों के साथ बदसलूकी की है जो वे करते आये है और आज भी हो रही है। इससे क्षुब्ध होकर चालक ने यात्रियों का पक्ष लिया। इस कारण घटना ने आकार ले लिया है।
जब मैं इनसे बात कर ही रहा था तो बस में हमारे बगल में बैठे हुए एक यात्री ने कहा कि ये ढाबे वाले बड़े बदतमीज है। उनके ढाबे में भोजन आदि के लिए खर्च भी किया फिर भी ढाबे वाले ने उनसे शौच के पैसे ऐठ लिए। ऐसे दर्जनो शिकायतें देहरादून से हल्द्वानी और कुमाऊ क्षेत्र में उत्तराखण्ड परिवहन निगम की बसों में सफर करने वाले यात्रियों की है जिसकी सुनवाई कहीं नहीं हो रही है। उत्तराखण्उ समता अभियान से जुड़े लोगों ने कहा कि यदि सरकार इस अनुबन्ध को वापस नहीं लेती तो वे न्यायालय में मानवाधिकरो के हनन को लेकर रिट दायर करेंगे।
अभियान से जुड़े लोंगों ने कहा कि अच्छा तो यही होता कि जहां बस रूके वहां यत्रियों को पब्लिक सुविधायें निशुल्क दी जाये। मगर ऐसा हो नहीं रहा, उल्टे यात्रियों के मानवाधिकारो का हनन रोज किया जा रहा है। जो अब न्यायालय का मामला बनता जा रहा है।







