संगोष्ठी :बाल साहित्य और बच्चे।
मुख्य संयोजक: उदय किरोला, संपादक बाल प्रहरी
By – Dinesh Pant
तमाम तरह के दबाव बच्चों का जीवन बदल रहे हैं. उनकी रुचियां बदल रही हैं. उनका स्वभाव बदल रहा है. उनका व्यवहार बदल रहा है. उनकी सोच बदल रही है. उनकी मानसिकता बदल रही है.
यह दबाव है शैक्षिक उत्कृष्टता का,अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं का. बेहतर करने का. तकनीकी में आगे निकलने का. इन सब बातों ने उनकी मूल सोच में बदलाव किया है. लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव उनके व्यक्तित्व निर्माण में बाधा डाल है. उन्हें रचनात्मकता से दूर ले जा रहा है. कमतर प्रदर्शन उन्हें अवसाद की तरफ धकेल रहा है. इससे उन्हें यह एहसास होता है कि उनका कोई मूल्य नहीं है.
एक बात यह है कि बच्चे अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं तो उनके अनुभव भी भिन्न होते हैं. उनकी समस्या अलग होती हैं. उनका नजरिया भी अलग होता है. तो ऐसे बच्चों का साहित्य से जुडना जरूरी है ताकि वह अपने को अभिव्यक्त कर सकें. छोटे बच्चों से लेकर किशोर -किशोरियों तक की अपनी समस्याएं हैं. अपनी सोच है.अपना नजरिया है. अब सवाल यह है कि जो बदलाव हो रहा है या जिस तरह के दबाव का सामना वो कर रहे हैं, उनके बीच वह कैसा महसूस करते हैं. अपने आसपास की दुनिया को किस नजरिये से समझ रहे हैं. इसे उनके लेखन के माध्यम से बाहर आना चाहिए.बच्चों के लिए लिखना व बच्चों के द्वारा लिखा जाना दोनों अलग-अलग बातें हैं. ऐसे में बाल साहित्य का नजरिया बदलना होगा. बच्चों के मानसिक स्तर,उनकी रुचियां, उनकी कल्पनाओं के लिए साहित्य में जगह होनी चाहिए.
यहां यह समझना जरूरी है कि लिखना और लोगों तक पहुंचना दो अलग बातें हैं. बड़ा साहित्यकार बनाम छोटा साहित्यकार, व्यस्क साहित्य बनाम बाल साहित्य के नजरिए को भी बदलने की जरूरत है. बच्चों से अधिक लेखन कराए जाने की जरूरत है. उनकी सहभागिता अधिकतम सुनिश्चित करनी होगी. बच्चे हमारा लिखा ही पढें, यह जरूरी नहीं है. बच्चों का लिखा हमें पढ़ना चाहिए. हमें समझना चाहिए कि बच्चे आज के दौर को कैसे देख रहे हैं. वह क्या कहना चाह रहे हैं. यह हमें समझने की जरूरत है. आज बच्चों को साहित्य से जोड़ना विकल्प नहीं एक अनिवार्य आवश्यकता है. यह इसलिए जरूरी है ताकि बच्चे जीवन को समझने, विचार करने, सवाल करने योग्य हो सकें. बच्चों को क्या सोचना चाहिए, विषय क्या होना चाहिए यह उन्हें खुद तय करने दे. सिर्फ उसे कैसे लिखा जाए, इसके लिए कौन से माध्यम, तकनीक अधिक उपयोगी हो सकती है.यह बताए जाने की जरूरत है. बच्चों को बाल साहित्य सिर्फ पढाना नहीं है बल्कि उनका लिखा भी पढ़े जाने की जरूरत है. उस पर चर्चा जरूरी है. उसकी समीक्षा जरूरी है.
यह बात समझने योग्य है कि बच्चे उपदेश से नहीं उदाहरण से सीखते हैं. अगर घर में साहित्य उपलब्ध है,पढ़ा जा रहा है तो स्वाभाविक तौर पर बच्चे उसकी तरफ आकर्षित होंगे.अगर घर में स्क्रीन हावी है,परिवार के सभी सदस्य डिजिटल लत के शिकार हैं तो वहां कोई उदाहरण नहीं बन सकता. हम बच्चों से कहते हैं पढ़ो,खुद नहीं पढ़ते. बाल साहित्य को स्कूली पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाए जाने की जरूरत है. विशेषकर प्राइमरी स्तर पर. स्कूलों में किसी किताब पर चर्चा हो सकती है. किसी कहानी का वाचन हो सकता है. किसी पात्र, विषय पर चर्चा हो सकती.है बच्चों से कविता, कहानी, निबंध लिखाए जा सकते हैं. उन्हें पुरस्कृत किया जा सकता है.
हालांकि मानस एकेडमी पिथौरागढ़ सहित कई स्कूलों में इस तरफ अच्छा काम हो रहा है. इसके अलावा व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर दीवार पत्रिका तैयार की जा रही हैं. श्री उदय किरोला इसकी एक जीती जागती मिसाल हैं. वह पिछले कई दशकों से निरंतर बच्चों के बीच काम कर रहे हैं.
‘बाल प्रहरी’ जैसी लोकप्रिय पत्रिका का संपादन व प्रकाशन कर रहे हैं. देश भर में बच्चों के लिए लेखन कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं. लेकिन इन्हें विस्तार देने की जरूरत है. हमें बच्चों पर भरोसा रखना होगा अगर वह अच्छे अंक ला सकते है तो बेहतर साहित्य भी सृजित कर सकते हैं.







