मेवालाल की अभी-अभी घर वापसी हुई है। घर बौड़ने का कबळाट तो मेवालाल के पेट में भौत दिनों से हो रहा था लेकिन जिस तरह तुनक कर मेवालाल ने पर के साल घर छोड़ा था उसे याद करते हुए जिकुड़ी में धुकधुकी भी थी कि फूलमालाओं के बजाय जांठी-सोटी से स्वागत न हो। इसलिए उसने धीरज रखना ठीक समझा।
शोले फिलम के गाने ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं’ से प्रेरणा लेकर मेवालाल ने घर वापसी के लिए होली का समय चुना। रौळ-धौळ में धक्के-मुक्के लगेंगे भी तो किसी को पता नहीं चलेगा। प्रचार भी हो जाएगा कि मेवालाल की घर वापसी पर घरवालों, भाई-बंधु, इष्ट-मित्रों ने ढोल-नगाड़ों के साथ किया भव्य स्वागत।
मेवालाल छुटपन से ही घर का लाडला रहा। माँ-बाप, काका-बडा सबने मिलकर मेवालाल की पढ़ाई-लिखाई पर जोर लगाया। बहुत औसत छात्र होने के बावजूद सबकी ठेलम-ठेल से मेवालाल पुलिस में सिपाही बन गया।
चाहते तो सब यह थे कि मेवालाल आगे पढ़ किसी अच्छे पद पर नियुक्त होता, लेकिन मेवालाल की मेधा को देखते सिपाही में ही संतुष्ट व प्रसन्न हो गए।

वर्दी पहन जब मेवालाल घर से निकलता तो पूरे परिवार की छाती फूल जाती।
धीरे-धीरे मेवालाल को लगने लगा कि परिवार के साथ रहने से उसे घाटा हो रहा है। कुछ दारू-मुर्गा के शौकीन चंट दोस्त मेवालाल को घर से अलग रहने को हुरसाते।
स्वेण भी चुंडा मारती रहती: “यहाँ कुटमदारी के घपरोळ में तुम्हारा इस्टेंडर डौन हो रहा है। न कोई तुम्हारी इज्जत करता। वो जो तुमने दिल्ली घूमने को ट्रेन का टिगट खरीदा था उसपे भी तुम्हारे बाबाजी ने पड़ोस वाले प्रेमसिंह को बिठा दिया। तुम यहीं लेफ्ट-रैट करते रहो।”
टिगट वाली बात मेवालाल के सरीर में कण्डाली की सबड़ताळ की तरह लगी। वह अपमान और क्रोध की अग्नि में तड़पने लगा।

रुष्ट मेवालाल ने विद्रोह कर दिया और दल, सॉरी, घर छोड़कर अलग रहने लगा।
कुछ दिन चकड़ेत दगड्यों ने मेवालाल के साथ खूब दावत उड़ाई। लेकिन आखिर एक नए-नए सिपाही की तनख़्वाह से कितने दिन बोतलें खुलतीं। पहले तो कुटमदारी के साथ रहते मेवालाल को घरखर्च के लिए तनख़्वाह छेड़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। बाबा-काका सब भंडार भर देते थे। अब लूण-तेल के साथ ही स्वेण के सेम्पू-किरीम के डब्बे भी पूरने पड़ते।
छोकरों ने जल्द ही पलटी मारी और मेवालाल के ममेरे भाई, जो सबिंस्पेक्टर था, से दोस्ती जोड़ ली।
दिन भर चौराहे पर गाड़ियों को रोकने-दौड़ाने के बाद शाम को मेवालाल घर पहुंचता तो थक के चूर हो जाता। स्वेण के कुकड़ाट अलग: घुमाने नहीं ले जाता, पिक्चर नहीं दिखाता…।
नाते-रिश्तेदारों ने पहले ही मुँह मोड़ लिया था।
अंत में मेवालाल ने एक बड़ा फैसला लिया: घर वापसी का।
कल होली मिलन कार्यक्रम में मेवालाल एक कोने में कुरसी पर बैठा देखा गया। मेवालाल के चकड़ेत दोस्त सबिंस्पेक्टर की दारू पीकर टुन्न थे। गालों पर गुलाल लगा होने के बावजूद मेवालाल के मुँह पर जैसे नील फिरा हुआ था।
उधर डीजे वाले बाबू गाना बजा रहे थे-
यही तेरी मरज़ी है तो
अच्छा चल तू ख़ुश हो ले
पास आ के छूना ना मुझे
चाहे मुझे दूर से भिगो ले…







