@Shoorveer Singh Rawat
अस्सी के दशक में प्रेम त्रिकोण पर आधारित कहानी वाली अनेक हिंदी फिल्में देखने को मिली। अक्सर प्रेम का आदर्श रूप दिखाई देता था इन फिल्मों में। प्रेम, समर्पण परन्तु इस बात से अनजान कि सामने वाले की चाहत क्या है।

साहित्य मित्र शशिभूषण बडोनी जी से अनिता सभरवाल का उपन्यास ‘लोहित’ मिला (लोहित- ब्रह्मपुत्र का पौराणिक नाम)। इससे पूर्व अनिता जी के ‘यात्रा शेष’ और ‘तिरिया जात न जाने कोई’ दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘पहाड़नामा’ भी चर्चा में है।
असम पर केन्द्रित इस उपन्यास का कालखंड सर्वाधिक उथल-पुथल वाला अस्सी का दशक है। (संयोग से अस्सी के दशक में लगभग नौ साल असम से सटे पड़ोसी राज्य में मैं भी रहा। असम का सामाजिक ताना-बाना, व्यवहारगत सरलता एवं निश्छलता, सांस्कृतिक समर्पण और भाषाई स्तर पर अपनापन काफी करीब से देखा है।)
हितेन राजखोवा का राजकुमारी जोयमती सिंघा के प्रति समर्पण व साइलेंट प्रेम लेकिन जोयमती का इन भावनाओं से अनभिज्ञ रह जाना कहानी की धारा बदल देती है। ‘मोहसिन नकवी’ का एक शेर याद आता है;
‘‘उसने दूर रहने का मशवरा लिखा है
साथ ही मुहब्बत का वास्ता भी लिखा है’’
‘लोहित’ और ‘अहोम’ ही नहीं अस्सी के दशक में असम की राजनीतिक हलचल, असन्तोष, अधिकारों के लिए जन भागीदारी और छात्र राजनीति के बारे में भी विस्तार से लिखा गया है। आंदोलन कुचलने के लिए राजनीतिक कुचक्र और सरकारी तंत्र की बर्बरता उपन्यास में वर्णित है। विदेशियों, विशेषकर बंग्लादेशियों, की घुसपैठ से असम की डेमोग्राफी ही नहीं बदली अपितु असम के मूल निवासी हाशिए पर चले गए हैं, उनके रोजगार छिन गए हैं, सांस्कृतिक संकट उत्पन्न हो गया। असम की धरती पर सैकड़ों चाय बागान, बड़े-बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान, फैक्टरियां, रिफाइनरी आदि में मूल असमियों की भागीदारी बहुत कम हैं। जिसकी परिणति है घोर असन्तोष और अंत में उल्फा जैसे आतंकवादी संगठन का जन्म। उपन्यास में इन सभी पहलुओं को विस्तार मिला है।
कामाख्या में पूजा विधि विधान, तांत्रिक विद्या जानने की जिज्ञासा में नायिका का घाट पर जाना, तदोपरान्त हितेन और सागरिका के प्रति उपजा सन्देह, नानी का अपनी परम्पराओं और स्टेटस को लेकर बार-बार परिवारजनों से रूठना, गैर असमी कुंवर साहब बृजेंद्रपाल सिंह से नायिका जोयमती की शादी फिर उसके प्रति समाज व आमजन की प्रतिक्रिया को भी उपन्यास में रेखाकिंत किया गया है।
उपन्यास में एक पात्र है लोहित नदी। जोयमती का लोहित से संवाद दिल को छू जाता है। जब-जब वह दुविधा में होती है और उसके प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते वह लोहित के पास चली जाती है। वह अपनी कथा-व्यथा लोहित को सुनाती है और किनारों को भिगोती लोहित से या उसकी चंचल लहरों से उसे जवाब मिल जाता है। लोहित उसकी माँ है, संगी सहेली है और लोहित के बगैर कभी रहना होगा, कल्पना मात्र से ही वह दुखी हो जाती है।
समाज में हो रही हर छोटी-बड़ी घटनाओं को सूक्ष्मता से देखना और सामाजिक विसंगतियों से चिन्तित होकर उस पर कलम चलाना रचनाकार का धर्म होता है। उपन्यास में असम की सामाजिक विद्रूपताओं और राजनीतिक दलों द्वारा छात्रों को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना बखूबी दिखाया गया है। परन्तु एक शहरी अभिजात्य परिवार के आचार-व्यवहार का प्रदर्शन व महिमामण्डन से इतर असम के सुदूर क्षेत्रों, ग्रामीण परिवेश, आम ग्रामीण की समस्याओं व पीड़ा की अभिव्यक्ति भी आवश्यक थी।
तथापि कह सकते हैं कि गैर असमी (जैसा कि नाम से प्रतीत होता है) होने के बावजूद उपन्यासकार द्वारा बारीक जानकारियां उपन्यास में पिरोई गई है जो कि श्रम, साक्षात्कार और गहन शोध से ही संभव है। उपन्यास की भाषा सुगढ और शैली बहुत रोचक है। पढ़ते हुए यह भ्रम भी होता है कि कहीं नायिका जोयमती सिंघा ने तो उपन्यासकार अनिता नाम से यह न लिखा हो। एक सफल लेखक की यह खूबी ही पुस्तक को लोकप्रिय बनाती है। (अज्ञेय की ‘शेखर एक जीवनी’ पढ़ते हुए मुझे ही नहीं, अधिकांश पाठकों को लगा था कि यह उपन्यास अज्ञेय की आत्मकथा है। फिर उन्हें उपन्यास के अगले संस्करण में सफाई देनी पड़ी कि इसे मेरी जीवनी न समझें)
उपन्यास – लोहित
उपन्यासकार – अनिता सभरवाल
प्रकाशक – परमेश्वरी प्रकाशन, प्रीत विहार, दिल्ली।
पृष्ठ – 232
मूल्य – 400/ (हार्ड बाउण्ड)
समीक्षक- शूरवीर रावत







