Sunday, June 28, 2026
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पौष की ठिठुरन के साथ शुरु हो जाती है,कुमाऊं की बैठ होली 

पौष की ठिठुरन के साथ शुरु हो जाती है,कुमाऊं की बैठ होली 

Holi kumauni
Holi kumauni

 @Chandrashekhar Tewari 

संगीत और गायन दृष्टि से उत्तराखण्ड के कुमाऊं अंचल की होली विशिष्ट  है। यहां होली गायन की दो विधाएं दिखायी देती हैं।  ‘खड़ी होली‘ है जो ग्रामीण परिवेश के अत्यन्त निकट है उसमें आम जन की भागीदारी प्रमुखता से रहती है। इसका गायन फाल्गुन एकादशी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा के अगले दिन ‘छलड़ी‘ तक चलता है। इस होली में ‘होल्यार‘ गोल घेरे में घूमते हुए ढोल-मजीरे की ताल पर घर-आँगन में होली गायन करते हैं।

 

कुमाऊं में होली गायन की दूसरी विधा ‘बैठ होली‘ के रुप में प्रचलित है। नगरीय परिवेश में इस होली का गायन सर्वाधिक दिखायी देता है जिस वजह से यह नागर होली के नाम से भी जानी जाती है। ‘बैठ होली‘ का गायन देवस्थान, सार्वजनिक भवन अथवा घर में बैठकर (जैसा कि इसके नाम से भी जाहिर है) किया जाता है जिसमें पांच-सात अथवा उससे अधिक लोग शामिल होते हैं। इसके गायन की शुरुआत पौष माह के पहले रविवार से हो जाती है। पौष से लेकर वसन्त पंचमी के पहले दिन तक आध्यात्मिक /निर्वाण होली गीतों का गायन होता है और इसके बाद षिवरात्रि तक रंगभरी तथा इसके बाद ‘छलड़ी‘ तक श्रंगारिक होली गीत गाये जाते हैं।

 

‘बैठ होली‘ गायन परम्परा का प्रार्दुभाव कुमाऊं में कब से हुआ, हांलाकि इसका लिखित प्रमाण तो नहीं मिलता, परन्तु प्रचलित लोकमान्यता के आधार पर इसका आरंभिक काल आज से ढाई सौ से तीन सौ साल पूर्व का माना जाता हैं। अल्मोड़ा के वरिष्ठ रंगकर्मी श्री शिवचरण पाण्डे मानते है कि यहां चंद राजाओं के शासन के दौरान ‘बैठ होली‘ गायन की परम्परा चलन में थी। गढ़वाल के तत्कालीन राजा प्रद्युम्नशाह (1786-1803) से सम्बन्धित एक पंक्ति इस तरह है-’तुम राजा महराज प्रद्युम्नशाह,मेरि करो प्रतिपाल,लाल होली खेल रहे हैं…’। तत्कालीन कुमाउनी कवि लोकरत्न पंत ’गुमानी’ (1790-1846) द्वारा रचित इस होली गीत के आधार पर भी माना जा सकता है कि कुमाऊं में बैठ होली का इतिहास कमसे कम ढाई सौ वर्ष पुराना अवश्य ही रहा है।

 

“मोहन मन लीनो, मुरली नागिन सौं

केहि विधि फाग रचायो

बृज बांवरो बांवरी कहत है अब हम जानी

बांवरो भयो नंदलाल केहि विधि फाग रचायो

कहत ’गुमानी’ अंत तेरो नहीं पायो

केहि विधि फाग रचायो..”

 

उस दौर में राजदरबार की बैठकों में अन्य जगहों से कई पेशेवर गायक आते थे। इन गायकों की संगति में रहकर कुमाऊं के स्थानीय लोग भी गायन विधा में पारंगत होने लगे। इस तरह बाद में बैठ होली की परम्परा ने राज दरबार से निकलकर आम लोगों के बीच में अपना स्थान बना लिया। होली के जानकार व्यक्ति बताते हैं कि राजदरबार से ’बैठी होली’ समाज के संभ्रान्त और आम जनों के बीच उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में पहंुची। अल्मोड़ा में मल्ली बाजार के हनुमान मंदिर से इसकी शुरुआत मानी जाती है। उस समय होली के रसिक स्व. गांगी लाल वर्मा के आवास में भी होली की बैठकें होती थीं, जहां स्थानीय लोगों को विख्यात गायिका रामप्यारी को भी सुनने का अवसर भी मिलता था। अल्मोड़ा की परम्परागत बैठी होली को संवारने में कई मुस्लिम गायकों का भी योगदान रहा है जिसमें उस्ताद अमानत हुसैन का नाम आज भी आदर से लिया जाता है। वर्तमान में ’बैठ होली‘ की इस समृद्ध विरासत को शहर की प्रसिद्ध सांस्कृतिक संस्था ’हुक्का क्लब’ आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है। यहां पौष के पहले इतवार से होने वालीे बैठकों में रसिक जन होली गायन का आनन्द उठाते हैं। नैनीताल में शारदा संघ व नैनीताल समाचार,व युगमंच, हल्द्वानी में हिमालय संगीत शोध समिति, भी हर साल बैठ होली का आयोजन कर रही हैं।

 

कुमाउनी ’बैठ होली‘ में प्रेम, वियोग व श्रृंगारिक गीतों की प्रधानता तो रहती ही है परन्तु इनमें जनमानस को भक्ति, धर्म, दर्शन व वैराग्य का संदेश देने वाली होलियां भी शामिल रहती हैं। कुमाउनी ’बैठ होली‘ के गीतों में ब्रज व अवध इलाके की छाप है परन्तु इनमें पहाड़ की महक साफ तरह से महसूस की जा सकती है।

 

बैठ होलियां शास्त्रीय बन्धनों से युक्त होने के बाद भी यहां के समाज ने होली गायकों को गायन में शिथिलता दी हैै। रागों से अनजान गायक भी मुख्य गायक के स्वर में अपना सुर आसानी से मिला लेते हैंं।कुमाउनी बैठी़ होली लम्बे समय तक गाये जाने के वजह से भी खास मानी जाती है क्योंकि इनके गायन का क्रम पूष के प्रथम रविवार से आरम्भ होकर फाल्गुन की मुख्य होली तक चलता है।

’बैठी होली’ में समय, दिन और पर्व विशेष का विशेष ध्यान रखा जाता है और इसी आधार पर निर्वाण, भक्ति तथा श्रृंगार-वियोग प्रधान होलियों को अलग-अलग राग और रूपों में गाने की परम्परा है।वरिष्ठ रंगकर्मी श्री शिवचरण पाण्डे के अनुसार ’बैठी होली’ की शुरुआत राग श्याम कल्याण या काफी से की जाती है और फिर सिलसिलेवार राग जंगला-काफी, खमाज्ज, सहाना, झिझोटी, विहाग, देश, जैजैवन्ती, परज तथा भैरव में गायन किया जाता है। दिन में होने वाली बैठकों में राग पीलू, सारंग, भीमपलासी, मारवा, मुल्तानी व भूपाली आदि रागों पर आधारित होलियां गायी जाती हैं।

 

” गुय्यां होरी मैं खेलूंगी उन ही के संग

जाके घुंघराले बाल, और सांवला सा रंग…

लगन बिन को जागे सारि रात

कै जागे जोगी, कै जागे भोगी,

कै जागे ललना की मात…

लगन बिन…”

 

दरअसल ’बैठ होली’ की गायन शैली श्रुत परम्परा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती आयी है और इसी तरह से इन गीतों में सुर देते हुए एक सामान्य जन भी गायक बन जाता है। इसलिए ही यहां की बैठी होली को समाज ने विशुद्ध शास्त्रीय गायन में कुछ शिथिलता दी हुई है। बैठ होली की बैठकों में गुड़ की डली, पान, सुपारी, लौंग, इलायची के साथ ही पहा़डी़ व्यंजनों में शुमार चटपटे ’आलू के गुटकों’ व सूजी से बने स्वादिष्ट ’सिंगलों’ को भी परोसने का रिवाज है।

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