Tuesday, June 9, 2026
Home lifestyle जल विद्युत परियोजना : देर आए, दुरस्त आए।

जल विद्युत परियोजना : देर आए, दुरस्त आए।

गंगा की अविरल जलधारा पर लगी सरकारी मुहर ।
——————————

By – Suresh bhai

सन् 2004 से भागीरथी के उद्गम में लोहारीनाग-पाला परियोजना (600 मेवा) पर एनटीपीसी के द्वारा निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया था। इसकी श्रृंखला में पाला- मनेरी (408 मेवा) और भैरों घाटी परियोजनाओं पर भी स्वीकृति मिलने वाली थी। जिसका उद्घाटन जून 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी जी और इनसे पूर्व मुख्यमंत्री स्व० नारायण दत्त तिवारी जी ने भी किया था। लेकिन सुरंग आधारित परियोजना निर्माण के चलते गंगा की अविरलता को बचाने के लिए रक्षासूत्र आंदोलन और उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान की टीम बहुत सक्रिय थी।

इस परियोजना का स्थानीय लोगों ने भारी विरोध किया। विरोध करने वाले नौजवानों को एनटीपीसी ने रोजगार देकर शांत करने का प्रयास भी किया। इसके बावजूद भी यहां परियोजना प्रभावित पाला, कुंजन, तिहार, सैंज आदि गांव की महिलाओं ने निर्माणाधीन बांध से पैदा हुई विनाशकारी गतिविधियों को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया। इसी सिलसिले में जल कवि डॉ० अतुल शर्मा जी द्वारा रचित “क्या नदी बिकी” नुक्कड़ नाटक, “अब नदियों पर संकट है”,” नदी तू बहती रहना” जैसे जलगीत जल संस्कृति मंच के माध्यम से उत्तराखंड में प्रस्तावित 558 जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ जल यात्राएं की गई। जिसके बाद देशभर के सामाजिक कार्यकर्ता, संत- महात्मा, गंगा प्रेमियों की चिंता थी कि भागीरथी को लगभग 60 किमी श्रृंखलाबद्ध लंबी सुरंग में डालने से यहां हिमालय की कमजोर भूसंरचना वाले क्षेत्र में भागीरथी का प्राकृतिक अविरल प्रवाह बाधित होगा। निचले क्षेत्र में भी परिस्थितिकीय नुकसान होगा। बरसात में गंगोत्री जाने वाले लोगों की असुरक्षा बढ़ेगी। सुरंग में डाइवर्ट करने से श्रद्धालुओं को गंगा के दर्शन उद्गम में ही नहीं हो पायेंगे। जिससे लाखों लोगों की आस्था पर बड़ी चोट मानी जा रही थी।

गंगा के अविरल प्रवाह के कारण उसमें पलने वाले जीव- जंतु, जैव विविधता और चारों ओर आकर्षित करने वाली सुंदर प्राकृतिक छटा और देवभूमि का जीवंत एहसास कराने वाली मां गंगा के साथ यह एक अन्याय के रूप में देखा जा रहा था।
काबिले गौर है कि 15 -16 जनवरी 2008 को रामनगर में नदी बचाओ अभियान की पदयात्राओं के समापन के समय प्रो० जीडी अग्रवाल जी और जल पुरुष राजेंद्र सिंह जी ने भाग लिया। वहां पर एक रणनीतिक फैसला हुआ कि भागीरथी की अविरलता को बचाने के लिए उत्तरकाशी की टीम के साथ मिलकर जीडी अग्रवाल जी ने उपवास करने का निर्णय लिया। भागीरथी के तट पर निवास करने वाले साधु- संत भी खुलकर बांधों के विरोध में सामने आये।

परिणाम स्वरूप 13 जून 2008 को जीडी अग्रवाल जी उत्तरकाशी में उपवास पर बैठे। उनके साथ प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, विमला बहुगुणा, समाजसेविका का राधा बहन, जल पुरुष राजेंद्र सिंह, स्वयं लेखक, डॉ रवि चोपड़ा, मातृ सदन के स्वामी शिवानंद, गोविंदाचार्य जी, स्थानीय महिलाएं आदि लोग मनकर्णिका घाट पर बैठ गये थे।उत्तराखंड की भाजपा सरकार भी उपवास के समर्थन में आगे आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक जी ने केंद्र की कांग्रेस सरकार को परियोजना निरस्त करने के संबंध में पत्र लिखा। पर्यावरणविदों के दबाव में केंद्र सरकार ने मंत्रियों का एक समूह भी बनाया था और तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जय राम रमेश जी ने परियोजना में अनेकों पर्यावरणीय शर्तों की अनदेखी के कारण बंद करने की सिफारिश की थी। जिसके बाद 23 अगस्त 2010 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी की सरकार में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने एक पत्र भेजकर लोहारीनाग- पाला, पाला मनेरी, और भैरों घाटी जल विद्युत परियोजनाओं को निरस्त कर दिया था। तब तक इस पर 60 प्रतिशत काम भी हो गया था और लगभग 650 करोड रुपये खर्च भी हो चुके थे।

इसके बाद 2012 में गंगोत्री से उत्तरकाशी तक लगभग 120 किमी में भागीरथी इको सेंसेटिव जोन भी घोषित किया गया। जिसके द्वारा परियोजना निर्माण से हुई पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए कार्य योजना बनाई जानी थी। जिसे लागू करने पर बहुत टालमटोल की गई। जिन राजनीतिक दलों की सरकारों ने परियोजना को निरस्त किया था उन्हीं के नेता बाद में परियोजनाओं के निर्माण की मांग भी करते रहे। जिससे लगता था कि परियोजना पर फिर से निर्माण हो सकता है। लेकिन जब पिछले 17 वर्षों में भागीरथी घाटी में लगातार बाढ़, भूस्खलन से अपार जनधन की हानि हुई, जिसके चलते सुरंग आधारित परियोजनाओं के निर्माण पर सरकार बैकफुट पर आई है। परिणामस्वरूप मार्च 2026 से लोहारीनाग-पाला परियोजना के अधूरे निर्माण से बनी 14 किमी लंबी 6 सुरंगों को स्थाई रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया है।

परियोजना की सुरंगों के दोनों तरफ भूस्खलन की समस्या बढ रही थी। जिस पर भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण और वन विभाग की देखरेख में पांच-पांच मीटर तक प्लग करके बंद करने से पहले उसके अंदर जमा पानी और मलवा हटाने का काम किया जा रहा है। जिस पर लगभग 30 करोड रुपये खर्च होने का अनुमान है। लोहारी नाग में जहां भागीरथी को सुरंग में डालने के लिए झील बनाई गई थी वहां से मुक्त करके भागीरथी अपने वास्तविक स्थान की तरफ बहने लगी है। जिससे गंगोत्री हाईवे का खतरा भी टला है। इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल कभी भी भागीरथी के बहाव को बाधित करने के लिए नहीं किया जाएगा। उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य लगातार भागीरथी इको सेंसेटिव जोन की शर्तों को लागू करने के लिए प्रयत्नशील है।

केंद्र सरकार का यह निर्णय भले ही देर सवेर ही सही गंगा की अविरलता पर अपनी मुहर लगा रही है। ऐसे उदाहरण जब प्रस्तुत किये जाएंगे तो राज और समाज की कोशिशें नदियों को बचा पायेगी।

RELATED ARTICLES

आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए सरकारी वर्जिश

वैज्ञानिक योजना, कुशल प्रशासन और समयबद्ध निर्णय प्रक्रिया के जरिए आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने का प्रयास किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि...

पर्यावरण दिवस : पद्मश्री प्रेमचंद शर्मा ने किया कृषि अनुसंधान संस्थान में वृक्षारोपण

विश्व पर्यावरण दिवस पर IATR देहरादून में पौधारोपण एवं गोष्ठी का आयोजन। पद्मश्री प्रेम चंद शर्मा ने छात्रों को मोरिंगा और पंच पल्लव के...

एक्शनएड की पहल : जलवायु परिवर्तन के खतरे और समाधान पर चिंतन

By - Prem Pancholi   सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था एक्शनएड एवं दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में "हिमालयी भविष्य की...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए सरकारी वर्जिश

वैज्ञानिक योजना, कुशल प्रशासन और समयबद्ध निर्णय प्रक्रिया के जरिए आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने का प्रयास किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि...

पर्यावरण दिवस : पद्मश्री प्रेमचंद शर्मा ने किया कृषि अनुसंधान संस्थान में वृक्षारोपण

विश्व पर्यावरण दिवस पर IATR देहरादून में पौधारोपण एवं गोष्ठी का आयोजन। पद्मश्री प्रेम चंद शर्मा ने छात्रों को मोरिंगा और पंच पल्लव के...

एक्शनएड की पहल : जलवायु परिवर्तन के खतरे और समाधान पर चिंतन

By - Prem Pancholi   सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था एक्शनएड एवं दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में "हिमालयी भविष्य की...

जलवायु परिवर्तन चर्चा : प्राकृतिक संसाधनों पर परंपरागत अधिकारों पर सरकारी कब्जा।

By - Prem Pancholi   दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित "हिमालयी एक्शन स्कूल" कार्यक्रम के दूसरे दिन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सुशासन, रोजगार, पलायन और...

स्थानीय समुदाय के बिना आपदा राहत कार्य अधूरा।

By - Prem Pancholi ................................... दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित "हिमालयी एक्शन स्कूल" कार्यक्रम के तीसरे दिन सामाजिक संस्था एक्शनएड और दून विश्वविद्यालय के संयुक्त...

सतत विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु एक साथ आएंगे हिमालयीवासी

By - Prem Pancholi   सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था एक्शनएड एवं दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में "हिमालयी भविष्य की...

कहानी : दादी की चिट्ठी

आजकल छुट्टियों में गाँव जा रहे हो? मेरी इस कहानी को पढ़कर जाना - डॉ० ममता कुंवर By - Dr. Mamata Kunwar आज दादी सुबह से...

विश्लेषण : आखिर ज़ेन-जी (Gen-Z) पैसा क्यों नहीं बचा रही?

फाइनेंशियल निहिलिज्म (Financial Nihilism): आखिर ज़ेन-जी (Gen-Z) पैसा क्यों नहीं बचा रही? Dr. Nitin Upadhyay ।। आजकल अक्सर सुनने को मिलता है—"आजकल के बच्चे सेविंग्स नहीं...

यात्रा संस्मरण : जब एक 20 वर्षीय युवती सेल्फ स्टीक से अनजान थी, इस सवाल ने नए भारत के लिए नया सवाल खड़ा कर...

By - Prem Pancholi यह यात्रा मेरी अन्य यात्राओं से भिन्न हो सकती है। क्योंकि यह यात्रा पैदल, बस और रेल के माध्यम से संपन्न...

कहानी : बधाई हो, जज हुआ है, एक नर्स का यह कहना?

By - Deepa Shah  कुछ साल पहले का वो कार्टून आज भी याद आता है। नर्स ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकलती है, चेहरे पर थकान...