Saturday, March 7, 2026
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24 बरस का राज्य : उत्तराखण्ड की महिलाएँ: संघर्ष से सफलता के सोपान तक।

उत्तराखण्ड की महिलाएँ: संघर्ष से सफलता के सोपान तक।

@Beena Benjwal

अपनी स्थापना के पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहे उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण में नारी शक्ति का अतुलनीय योगदान सर्वविदित है। इस हिमालयी राज्य की विकट भौगोलिक परिस्थितियों में अपनी उत्कट जिजीविषा एवं सांगठनिक क्षमता के बल पर यहाँ की वीरांगनाएँ सामाजिक आन्दोलनों से लेकर साहित्यिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में भी इतिहास रचती आई हैं। वीरबाला तीलू रौतेली हो या चिपको आन्दोलन की प्रणेता गौरा देवी, शराब विरोधी आन्दोलन की नेत्री टिंचरी माई हो या एवरेस्ट फतह करने वाली भारत की पहली महिला बछेन्द्री पाल, सबने असाधारण जीवटता एवं अदम्य साहस की मिसाल पेश कर इस पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड को विश्व फलक पर नई पहचान दी है।

जल, जंगल, जमीन पर आधारित पहाड़ के जनजीवन का प्रकृति से सदैव एक रागात्मक संबंध रहा है। इसका संरक्षण भी वह उसी सजग भाव से करता रहा है। यही कारण है कि जब भी, जहाँ भी प्रकृति के इन संसाधनों के दोहन की कुचेष्टा की गई, उत्तराखण्ड की नारी शक्ति ढाल बनकर खड़ी हो गई। पर्यावरणीय आन्दोलनों में उसने बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपनी शक्तिमत्ता का लोहा मनवाया। पहाड़ की महिला की इसी सामर्थ्य को वर्षों पहले गढ़वाली कविता के माध्यम से इस रूप में अभिव्यक्ति देने का मैंने प्रयास किया था -जिन्दगि/एक घट च/अर/जनानि/ये घट सणि/चलाण वाळि/पाणि कि कूल।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहाँ की महिलाएँ न केवल शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, फिल्म जगत व राजनीति के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं वरन उद्यमिता के क्षेत्र में भी पहाड़ी पिस्यूं लूण, ऐपण कला, लाटि कार्टून जैसे अभिनव प्रयोग करके अपनी विशिष्ट पहचान बना रही हैं। उच्च व्यावसायिक शिक्षा हासिल करने वाली हमारी बेटियां तो नवाचार करती हुई आत्मनिर्भर होकर दूसरों को भी रोजगार के साधन उपलब्ध करवा रही हैं। खेलकूद हो या सेना, हर क्षेत्र उनकी उपलब्धियों से गौरवान्वित हो रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में उत्तराखण्ड की संघर्षशील महिलाओं की सफलता की कहानी को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-

राजनीति के क्षेत्र में:

राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति उत्तराखण्ड में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा भले कम हो पर वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष जैसे पदों पर वे आसीन हैं। इस समय विधानसभा जिसकी अध्यक्ष ऋतु खण्डूड़ी हैं, में आठ महिला सदस्य हैं। रेखा आर्य कैबिनेट मंत्री हैं। इतिहास में देखें तो रानी कर्णावती से लेकर महारानी कमलेन्दुमती शाह, रेवती उनियाल, दर्शनी रावत, गीता गुलेरिया कुन्दन देई, इला पंत, मनोरमा डोबरियाल, डॉ॰ इन्दिरा हृदयेश, निरुपमा गौड, विजया बड़थ्वाल, रमा पंत, माला राज्यलक्ष्मी, कल्पना सैनी, शैलारानी रावत, आशा नौटियाल, रेखा आर्य, ऋतु खण्डूड़ी, सरिता आर्य, सविता कपूर, रेनु बिष्ट, अमृता रावत, रेणुका रावत, मीना गंगोला, अनुपमा रावत, मधु चौहान, नेहा जोशी, गरिमा दसौनी आदि के रूप में राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दिखता है। पंचायत स्तर पर अब महिलाओं का दबदबा बढ़ता जा रहा है

पर्यावरण के क्षेत्र में:

उत्तराखण्ड ने ‘चिपको आन्दोलन’ के माध्यम से विश्व को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। चमोली जिले के रैणी गांव की गौरा देवी इस आन्दोलन की सूत्रधार रहीं। पर्यावरण संरक्षण, पेड़ों व नदियों को बचाने हेतु समर्पित पिथौरागढ़ की बसंती देवी को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। बौणी देवी, कलावती देवी, बाली देवी, संग्रामी देवी राना आदि वे महिलाएं हैं जिन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए अनुकरणीय कार्य किया है।

शिक्षा के क्षेत्र में :

उत्तराखण्ड में शिक्षा जगत में महिलाओं की उपलब्धियों की बात करें तो महादेवी भटनागर का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा मिलता है जिन्होंने 15 सितंबर, 1902 में महादेवी कन्या पाठशाला की स्थापना की थी। मंगला देवी उपाध्याय, शकुंतला देवी, महन्त नारायण गिरि माई, तारा प्रकाश, सरला बेन, मंगला देवी जुयाल, गंगोत्री गर्ब्याल, बसन्त कुमारी घिल्डियाल, प्रो० गिरिजा सकलानी का योगदान शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय है। सत्तर के दशक में डॉ० सुशीला डोभाल गढ़वाल विश्वविद्यालय की कुलपति रहीं। डॉ० सुधारानी पाण्डे उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय की प्रथम महिला कुलपति रहीं। डॉ० अन्नपूर्णा नौटियाल वर्तमान में हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति हैं। प्रो० सुरेखा डंगवाल दून विश्वविद्यालय के कुलपति के पद को सुशोभित कर रही हैं। इसी क्रम में डॉ० उमा मैठाणी, डॉ० सविता मोहन, डॉ० प्रतिभा नैथानी, शशि चौधरी, सीमा जौनसारी, वीना डंगवाल, डॉ० उमा भट्ट, डॉ० मृदुला जुगरान, डॉ० किरण त्रिपाठी, डॉ० अल्का गोयल, डॉ० अंजना जोशी, प्रो० वीना शाह, प्रो० चन्द्रकला रावत, डॉ० मंजुला राणा, डॉ० दिवा भट्ट, डॉ० कमला पंत के नाम प्रमुख हैं।

आन्दोलनों में:

राष्ट्रीय आंदोलन में उत्तराखण्ड की महिलाओं ने अपने अद्भुत शौर्य एवं साहस का परिचय दिया। 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देहरादून में शर्मदा त्यागी, श्यामा देवी, रामदुलारी देवी, विष्णु देवी, सरस्वती देवी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन में गिरफ्तारियां दी थीं। बागेश्वर की बिश्नी देवी साह के अद्भुत शौर्य का इतिहास साक्षी है। कुंती देवी वर्मा, दुर्गा देवी पंत, तुलसी देवी रावत, भक्ति देवी त्रिवेदी, भागीरथी देवी वर्मा, भागुली देवी आदि का नाम भी इस आन्दोलन में प्रमुखता से लिया जाता है।
सामाजिक आंदोलन में टिंचरी माई बनाम इच्छागिरी माई, प्रतिभा मिश्र, तारा मिश्र, राधा बहन, जीवन्ती देवी, हेमलता बहन, सविता नगरकोटी नामों की एक लंबी शृंखला है।

1990 के दशक से शुरू हुए उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आन्दोलन में नारी शक्ति की अग्रणी भूमिका रही। गांवों से लेकर कस्बों, नगरों में आयोजित होने वाली रैलियों में महिलाओं की भागीदारी ने इस आन्दोलन को धार दी। डॉ० अर्चना डिमरी अपने शोधग्रंथ ‘उत्तराखण्ड आन्दोलनः अहिंसात्मक जनान्दोलन’ में लिखती हैं, ‘‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में सबसे ज्यादा सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका महिलाओं की रही है। उत्तराखण्ड आन्दोलन अगर सफल रहा तो इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण इसमें महिलाओं की भागीदारी का होना था।’’ सुशीला बलूनी वह पहली महिला थीं जो राज्य की मांग को लेकर सबसे पहले अनशन पर बैठीं। सुशीला बलूनी के साथ कौशल्या डबराल, कमला पंत, सुलोचना भट्ट, निर्मला बिष्ट, विजयलक्ष्मी गुसाईं, उषा भट्ट, आशा बहुगुणा, उषा नेगी आदि महिलाओं की नेतृत्व क्षमता और दृढ़ता ने उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आन्दोलन को सफलता के मुकाम तक पहुंचाया।

समाज सेवा के क्षेत्र में:

मंगला माता के नाम से प्रसिद्ध मंगला रावत मानवता की सेवा हेतु समर्पित एक ऐसा नाम हैं, हंस फाउंडेशन जिनके मार्गदर्शन में देश के 28 राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पेयजल, स्वच्छता व रोजगार के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा है। श्वेता रावत जो मंगला माता और भोले महाराज जी की पुत्री हैं, भी सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

साहित्य के क्षेत्र में:

उत्तराखण्ड में साहित्य की गौरवशाली परंपरा रही है। महिला लेखन ने इस परंपरा को और समृद्ध किया है। इस क्षेत्र में गौरा पंत शिवानी, तारा पाण्डे, देवकी मेहरा, कांति त्रिपाठी, मृणाल पाण्डे, डाॅ० जयवन्ती डिमरी, रश्मि रावत, डॉ० दिवा भट्ट, कुसुम भट्ट, डॉ० विद्या सिंह, डॉ० प्रभा पंत, सावित्री काला, कृष्णा खुराना, रेखा चमोली, रुचि बहुगुणा उनियाल, सपना भट्ट, प्रतिभा कटियार, हिमानी जोशी, स्वाति मेलकानी, डॉली डबराल, रश्मि बड़थ्वाल, माया गोला, कान्ता घिल्डियाल, नूतन डिमरी गैरोला, शशि देवली, कमलेश्वरी मिश्रा, डॉ० कविता भट्ट, प्रेमलता सजवाण, डॉ० आशा रावत, डॉ० कुसुम नौटियाल, कुसुम ध्यानी, अमिता प्रकाश, पुष्पा उपाध्याय, गीता गैरोला, सुनीता चौहान, सुधा जुगरान, पुष्पलता भट्ट, पार्वती उप्रेती, डॉ० दीपा काण्डपाल, हेमा उनियाल, दीक्षा बिष्ट, राधा मैंदोली, अनीता सोनी आदि ने विविध विधाओं पर अपने लेखन से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।

आंचलिक साहित्य की बात करें तो गढ़वाली भाषा में साहित्यिक कविता के रूप में यह लेखन 1930 में कागज पर दिखता है। लेकिन लोकगीतों के रूप में महिलाएँ अपने भावों को न जाने कब से अभिव्यक्ति देती आ रही थीं। ‘समाज पीड़िता’ के नाम से लिखने वाली विद्यावती डोभाल के बाद उनकी पुत्री वसुंधरा डोभाल, वीणापाणी जोशी, नीता कुकरेती, बीना बेंजवाल, बीना कण्डारी, डाॅ० आशा रावत, डाॅ० उमा भट्ट, सुमित्रा जुगलान, गीता नौटियाल, मधुर वादिनी तिवारी, अंजना कण्डवाल, रक्षा बौड़ाई, शान्ति बिंजोला, रिद्धि भट्ट, अर्चना गौड़, उपासना सेमवाल, कविता मैठाणी भट्ट, अनीता काला, विनीता मैठाणी, आरती पुण्डीर के साथ इस यात्रा में अब सौ से भी अधिक महिलाएँ शामिल हो गई हैं जो कविता के साथ-साथ कहानी, नाटक, संस्मरण, समीक्षा आदि अन्य विधाओं में भी लेखन कार्य कर रही हैं।

कुमाउनी भाषा की कवयित्रियों में देवकी मेहरा, डाॅ० दिवा भट्ट, डाॅ० प्रभा पंत, डाॅ० आनन्दी जोशी, भारती पाण्डे, रेनु रावत, डाॅ० प्रीति आर्य, संपादक ‘अदलि कुसलि’ डाॅ० सरस्वती कोहली, मुन्नी पाण्डे , दीपा गोबाड़ी, दीपा काण्डपाल, तारा पाठक आदि तथा जौनसारी में सुनीता चौहान और रवांल्टी में भारती अनंता भी साहित्य सृजन कर रही हैं।

उद्यमिता के क्षेत्र में:

उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में जहां आर्थिकी का प्रमुख आधार खेती और पशुपालन था और महिलाओं की उसमें बड़ी भागीदारी रहती थी। शिक्षा के प्रसार के साथ जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी महिलाएं अपना कौशल दिखा रही हैं। पिसा नमक, बुखणे, अरसे, रोटने बनाने ओर इनके लिए बाजार उपलब्ध करवाने में उनका योगदान कस्बों, नगरों में लगने वाले मेलों में भी देखा जा सकता है। व्यक्तिगत स्तर पर और संस्थाओं से जुड़कर वे उद्यमिता के लिए नए क्षितिज खोल रही हैं। डिजिटल मार्केटिंग, फैशन डिजायनिंग, ड्राइंग और पेंटिंग, फाइन आर्ट्स जैसे विषयों में उच्च शिक्षा हासिल करने वाली ये बेटियां समाज के सामने अनूठा उदाहरण पेश कर रही हैं। शिल्पा बहुगुणा भट्ट, कृति रावत, मंजू शाह, कंचन जदली, श्रुति सराफ, परिधि भण्डारी ऐसे ही नाम हैं जो रेस्टोरेंट, पिरुल क्राफ्ट, कार्टून निर्माण, ऐपण कला आदि के माध्यम से वोकल फॉर लोकल के विचार को गति दे रही हैं।
दिव्या रावत ‘मशरूम गर्ल’ के नाम से जानी जाती हैं। शशि बहुगुणा रतूड़ी ‘पिस्यूं लूण’ के माध्यम से पहाड़ की रस्याण देश भर में पहुंचा रही हैं। कंचन जदली के लाटि कार्टून से हर कोई परिचित है। मंजू टम्टा पिछौड़े के माध्यम से संस्कृति का प्रचार व रोजगार का सृजन कर रही हैं। मीनाक्षी खाती, कुंजिका वर्मा, मीनाक्षी भट्ट ऐपण कला का प्रसार कर रही हैं। तुलसी देवी, रश्मि भारती, सीता भट्ट, नूतन तन्नु पंत, सुमन अधिकारी, किरण नौगांई शर्मा, नीलम नेगी, प्रेमा मेहता, श्वेता बंधाणी, आशी डोभाल, रोशनी चौहान, पूनम गोस्वामी, रीना रावत, ममता रावत आदि स्थानीय उत्पाद, बेकरी, मशरूम उत्पादन, गोबर के दीये बनाना, होम स्टे आदि केे द्वारा उद्यमिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

संगीत एवं कला के क्षेत्र में:

संगीत और कला के क्षेत्र में भी महिलाओं ने उत्तराखण्ड को विशिष्ट पहचान दिलाई है। जागर गायन के लिए बसन्ती बिष्ट एवं लोकगीतों के संरक्षण हेतु डॉ० माधुरी बड़थ्वाल पद्मश्री से सम्मानित हो चुकी हैं। इसी क्रम में कबूतरी देवी, वीना तिवारी, चन्द्रलेखा त्रिपाठी, रेखा उनियाल, अनुराधा निराला, पूर्णिमा पाण्डे, मीना राणा, पुष्पा उप्रेती, परुली देवी, नीरजा उप्रेती व ज्योति उप्रेती, संगीता ढौंडियाल, हेमा नेगी करासी, रामेश्वरी भट्ट, पम्मी नवल, रेशमा शाह, पूनम सती, ज्योति नैनवाल, अर्चना सती, अंजलि खरे, प्रतीक्षा बमराड़ा, मधु बेंजवाल, मंजू सुन्दरियाल, दिव्या सेमवाल आदि ने संगीत के क्षेत्र के विशिष्ट नाम हैं। इसी प्रकार चित्रकला के क्षेत्र में चमेली जुगरान, लता शुक्ला अपना अवदान दे रही हैं। प्रथम महिला ढोल वादक संदली देवी, प्रथम महिला ढोल दमाऊ वादक मकानी देवी रही हैं।

पर्वतारोहण:

23 मई, 1984 के दिन उत्तराखण्ड के नाम एक नया कीर्तिमान स्थापित करने का श्रेय उत्तरकाशी जिले के नाकुरी गाँव की बेटी बछेन्द्री पाल को जाता है, जो एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली भारत की प्रथम महिला पर्वतारोही बनीं। पर्वतारोहण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल करने वालों में डॉ० हर्षवन्ती बिष्ट, चन्द्रप्रभा एतवाल, नूतन वशिष्ठ, सविता कंसवाल, तांग्शी-नुंग्शी, हर्षा रावत आदि नाम भी प्रमुख हैं।

खेल:

उत्तराखण्ड की बेटियाँ खेलों के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने खेलों का प्रदर्शन कर राज्य का नाम रोशन कर रही हैं। एकता बिष्ट, स्नेह राणा, मानसी जोशी, प्रेमा रावत, श्वेता वर्मा, पूजा धामी क्रिकेट में तो वन्दना कटारिया हॉकी में अपना हुनर दिखा रही हैं। हिमक्रीड़ा में रीना कौशल धर्मसक्तू उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। इसी प्रकार एथलेटिक्स में गरिमा जोशी ने राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते हैं। अंकिता ध्यानी पेरिस ओलंपिक हेतु चयनित हुईं। मानसी नेगी के नाम भी एथलेटिक्स में राष्ट्रीय स्तर की कई उपलब्धियाँ हैं। पौड़ी के यमकेश्वर ब्लॉक के आमड़ी गांव की रहने वाली प्रतिभा थपलियाल बॉडी बिल्डर के रूप में कई खिताब अपने नाम कर चुकी हैं। महिला वेट लिफ्टिंग में विनीता नौटियाल, ममता बिष्ट, सौम्या नायब, मेघा चंद, कामिनी यादव आदि अपनी पहचान बना रही हैं।

सेना:

भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कमांडर उत्तराखण्ड की बेटी वर्तिका जोशी के नेतृत्व में पहली बार 6 महिला अधिकारियों ने ‘नाविका सागर परिक्रमा’ कर विश्व कर्तिमान स्थापित किया। इसी प्रकार ममता थपलियाल भारतीय वायु सेना में, श्रेयसी निशंक आदि सेना में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

प्रकाशन:

उत्तराखण्ड में रानू बिष्ट ‘समय साक्ष्य’ प्रकाशन के माध्यम से लीक से हटकर कार्य कर रही हैं।

अभिनय:

अभिनय के क्षेत्र में हिमानी शिवपुरी, अर्चना पूर्ण सिंह, चित्रांशी रावत, शिवांगी जोशी, आशा नेगी, उर्वशी रौतेला, तानिया पुरोहित, पार्वती बिष्ट, तेजी मटियानी, सुनीता जुयाल, वसुंधरा नेगी, उर्मि नेगी, चन्द्रकांता मलासी, बबीता अनंत, सुशीला रावत, संयोगिता ध्यानी, कुसुम चौहान, कुसुम भट्ट, सुमन गौड़, गीता उनियाल, इंदु भट्ट, मोहिनी ध्यानी, अंजली नेगी, सुषमा बहुगुणा, सुमन काला, उमा राणा, वीना रावत आदि हिन्दी एवं गढ़वाली फिल्मों में अपना विशिष्ट योगदान दे रही हैं।

पत्रकारिताः

उत्तराखण्ड से पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम है। मीनाक्षी कण्डवाल, ममता तिवारी, दीवा बाफिला राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं। डॉ० अंजलि नौरियाल, ज्योत्स्ना, वर्षा सिंह, मधु बिष्ट, पूजा बड़थ्वाल, वंदना सेमवाल, प्रियंका काण्डपाल आदि इलेक्ट्रानिक एवं प्रिंट मीडिया में अपनी सेवाएँ दे रही हैं।
उत्तराखण्ड की महिलाओं का संघर्ष और उनकी सफलता को इतने कम शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है। ये कुछ ही नाम हैं जिनके कार्यक्षेत्र एवं उपलब्धियों का उल्लेख इस आलेख में किया गया है। विज्ञान, सामाजिक क्षेत्र, जीवन कौशल आदि क्षेत्रों में भी उत्तराखण्ड की महिलाएँ अपना विशिष्ट अवदान दे रही हैं। जिनका अभी यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है।

संपर्क –  बीना बेंजवाल
बी-ब्लॉक, लक्ष्मण सिद्ध कॉलोनी
हर्रावाला, देहरादून।

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