Monday, June 29, 2026
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फिल्म दानू भुला : वायदा निभाने शहर से गांव पहुंच प्रताप

 

उत्तराखंड सरकार की फिल्म नीति आने के बाद अब उत्तराखंडी फिल्मो में कई तरह की कहानियां इन फिल्मों का हिस्सा बन रही है। इसी क्रम में गढ़वाली फिल्म “दानू भुला” दर्शकों के दिलों में अलग छाप छोड़ रही है। अर्थात यूं कह सकते हैं कि अधिकांश गढ़वाली फिल्मों की कहानियां विपदा और संकटों को दर्शाने में आगे रही है। जबकि “दानू भुला” ने इन सभी परिस्थितियों से आगे बढ़कर उत्तराखंड की पलायन की समस्या को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। यह भी बताने का प्रयास किया गया है कि पहाड़ में भी विकास के नए आयाम स्थापित किए जा सकते है।

इधर फिल्म ने जहां सकारात्मक मुद्दों को उठाने का दम भरा है वहीं मूवी मसाला को प्रस्तुत करने में भी कहानी और निर्देशन की भूमिका महत्वपूर्ण कही जाएगी।

“दानू भुला” नाम से चर्चा में आई इस गढ़वाली फिल्म ने संवादों में भी गढ़वाली भाषा की अच्छी पकड़ बनाकर रखी है। हालांकि और अच्छा प्रस्तुत करने की वजह से कहीं कहीं अतिरिक्त शब्दों का उच्चारण भी किया गया है, जिससे किरदार के संवादों में झोल दिखाई दिया है।

दिलचस्प यही है कि फिल्म की कहानी में एकदम नया मोड़ था, इसलिए कि पलायन की समस्या को बहुत अधिक मजबूरी नहीं दिखाई गई है, मगर रोजगार की तलाश में पलायन कर चुका व्यक्ति वापसी की जद्दोजहद ताउम्र करता रहता है। इधर शहरों में रह रहे कुछ पहाड़ी लोगों की धमक व्यवसाय से लेकर अन्य कारोबार में बहुत अच्छी दिखाई गई, जो हर पहाड़ी की मदद में खड़े रहते है। इस दौरान संवादों ने कई बार दर्शकों के आंखों में आंसू छलकाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। कह सकते है कि फिल्म ने सकारात्मकता के साथ साथ कहानी को नया मोड़ दिया है।

इसे निर्देशन की कला कहे या कहानीकार की कुशलता, फिल्म में हर किरदार विश्वास से लबरेज दिखाई दिया। संवादों और अभिनय की बेहद कुशलता में यह बताने का बहुत ही मार्मिक सचित्रण किया गया कि पलायन कैसे होता है? पलायन कर चुका व्यक्ति दूसरे को अपने साथ ले जाने के लिए वे सभी और सर्वाधिक षडयंत्र रचता है? जैसे दृश्य हर दर्शक के मन में बार बार कई सवाल खड़ा करता है।

कुलमिलाकर फिल्म की कहानी के अंत में यह भी मोड आया कि महानगर में जो एक कारखाने का मालिक होता है वह अब वापस आकर अपने पहाड़ में नया कारखाना लगाना चाहता है, जिसकी वह पूरी तैयारी कर लेता है। फिल्म की कहानी का अंत इसी दृश्य में होता है।

अन्य गढ़वाली फिल्मों की अपेक्षा इस फिल्म का तकनीकी पक्ष बहुत मजबूत है, मगर संगीत पक्ष कमजोर था। कहानी की मजबूती ही कही जाएगी कि संवाद बंधे हुए लगे, जबकि कुछ संवाद बिखरे बिखरे लग रहे थे। फलस्वरूप इसके फिल्म में 80 फीसदी किरदारों ने ही कमाल करके दिखाया। 20 फीसदी किरदार संवादों को बांध नहीं पा रहे थे। फिर भी मूवी मसाला के सभी पक्षों को छुआ गया है। कुछ किरदारों के स्क्रीन प्ले कमजोर होने की वजह से उनका अभिनय यहां कमजोर दिखाई दिया। दरअसल प्यार, मुहब्बत और संस्कार से लबरेज यह फिल्म हालांकि बीत चुके पलायन की समस्या पर बात करती है और दूसरी तरफ फिल्म हर किरदार को सकारात्मकता की ओर ले जा रही होती है।

महत्वपूर्ण यही रहा कि इस फिल्म में हर किरदार मुख्य किरदार के रूप में अभिनय करता दिखाई दे रहा था। दरअसल हर किरदार के पास परिपूर्ण संवाद थे।

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