पहाड़ी क्षेत्रों में भविष्य की बागवानी,स्टोन फ्रुट्स – उद्यान विशेषज्ञ डा० राजेंद्र कुकसाल।
स्टोन फ्रुट्स याने गुठली दार फल जैसे आडू प्लम खुबानी चेरी बादाम एवं अखरोट।
उत्तराखंड राज्य का अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र भौगोलिक रुप से temperate zone (शीतोष्ण ) नही है ,उत्तराखंड राज्य 28 – 31 डिग्री उत्तरीय अक्षांश (latitude)पर है,जबकि हिमाचल प्रदेश 30 – 33 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर है हिमाचल प्रदेश में जितनी ठंड 1500 मीटर पर पड़ती है उत्तराखंड में उतनी ही ठंड 2000 मीटर की ऊंचाई पर पड़ती है। यहां पर उंचाई व बर्फीले पहाड़ों का लाभ लेते हैं अब जलवायु परिवर्तन एवं अन्य कारणों से पहाड़ियों में उतनी ठंड नही मिल पाती है जितनी सेब के पेडौं के लिए आबश्यक है।
राज्य सरकार द्वारा सेब के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसके अन्तर्गत राज्य में एपिल मिशन योजना चलाई जा रही है। योजना में लगे अधिकतर बाग जो 2000 मीटर से कम की ऊंचाई में तथा दक्षिण ढलान पर लगे हैं उनमें कैंकर,रूट रोट रूट वोरर ऊली एफिड माइट आदि कीट व्याधियों के कारण बागवानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
उत्तराखंड पर्यटन व तीर्थाटन का अग्रणी राज्य है। यात्रियों/पर्यटकों को मई से जुलाई तक ताजे फल मिलें व स्थानीय रोजगार भी बढ़े साथ ही पलायन भी रुके, इसके लिए आवश्यक है कि हम स्टोन फ्रुट्स की तरफ जायं।
स्टोन फ्रुट्स सेब से पहले याने मई से जुलाई माह में तैयार हो जाते हैं ,सेब की तुलना में स्टोन फ्रुट्स के बागीचे की देखरेख करना आसान है, सेब के लिए जहां बड़ी मात्रा में कीट व्याधि नाशक रसायनों का स्प्रे और उर्वरकों का इस्तेमाल करना जरूरी है ,वहीं स्टोन फ्रुट्स के बागीचे में इनकी कम जरूरत रहती है, इस तरह इन फलों के उत्पादन की लागत सेब की तुलना में काफी कम है ।
स्थान विशेष की ऊंचाई व पहाड़ी की ढाल व बाजार की मांग के अनुसार फल पौधों की किस्मों का चयन करें।








