Friday, September 11, 2026
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पौने दो सौ साल पुरानी फोटो जीवंत और आज का हिमालय संकट में। पढ़े पूरी रिपोर्ट

By – Prem Pancholi

यह देहरादून का दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र है। यहां पर आजकल पौने दो सौ साल पहले के इतिहास औऱ भूगोल से संबंधित चित्रों की प्रदर्शनी लगी है।
जी हां! सन 1854-55 के दौरान बवेरिया यानी अब जर्मनी का भाग के तीन साहसिक अंवेषक भारत आये औऱ ईस्ट इंडिया कम्पनी की इज़ाज़त लेकर हिमालयी क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध करने गए। जिनमें रोबर्ट शलाहगिंटावाईट, हरमन शलाहगिंटावाईट औऱ अडोल्फ शलाहगिंटावाईट प्रमुख थे।

इन्होंने कश्मीर, हिमाचल, गढ़वाल – कुमाऊं हिमालय से लेकर तिब्बत नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को दर्ज किया औऱ कई तस्वीरें खींची। यह भी कह सकते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में कैमरे का प्रयोग करने वाले शायद यह पहले लोग थे। चूंकि तस्वीरें ब्लैक एंड व्हाइट थी औऱ आज के मुकाबले में रिजोल्यूशन बहुत बढ़िया नहीं था। अतः तस्वीरों के आधार पर पेंटिंग्स भी बनायी गयी l जिसकी यह प्रदर्शनी है।

इतिहास के जानकार और हिमालयी सहयात्री प्रो० शेखर पाठक बताते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी औऱ शलाहगिंटावाईट बन्धुओं के बीच हुए समझौते के तहत ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा शोध के नतीजों औऱ तस्वीरों को प्रकाशित किया जाना था l किन्तु सन 1857 की असफल क्रांति के इस्ट इंडिया कम्पनी का राज ही खत्म हो गया। भारत का राज सीधे ब्रिटिश राज्य के अधीन हो गया। तब ये तस्वीरें लॉकर्स में ही रखी रह गयी l

जब कुछ वर्ष पूर्व इतिहासकार, घुमक्कड़ प्रोफेसर शेखर पाठक म्युनिख स्थित अल्पाईन म्यूजियम में हिमालय अभियानों के सन्दर्भ में पंडित नैन सिंह रावत पर व्याख्यान देने गए, तो उन्हें इन तस्वीरों के बारे में जानकारी मिली।

प्रोफेसर पाठक के प्रयासों से ये तस्वीरें पहली बार भारत लायी गयी। ताकि आज के विद्यार्थी भी इन्हें सुन सकें और देख सके। इन्हीं तस्वीरों की प्रदर्शनी “दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र” में चल रही है जो आठ मई तक सार्वजनिक रूप से लोगो के लिए खुली रखी गई है। बिल्कुल इन पेंटिंग्स के ज़रिए हिमालय के एक ऐतिहासिक कालखंड से बातें की जा सकती है।

पहाड़ के संस्थापक पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने बातचीत में बताया कि एक दशक पहले, उन्हें बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के प्रो. हरमन क्रेट्ज़मैन ने हिमालयन एक्सप्लोरेशन पर बोलने के लिए बुलाया और वे पंडित नैन सिंह रावत पर बोलने के लिए म्यूनिख के एल्पाइन्स म्यूज़ियम ले गए। तब अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट और कार्ल रिटर के बारे में और जानने और सुनने के बारे में सोच रहा था और भारतीय भूगोल, टोपोग्राफिक सर्वे और हिमालयन स्टडीज़ में श्लागिन्ट्वाइट भाइयों के योगदान के बारे में भी जानना चाहता था। लेकिन यह उससे कहीं ज़्यादा था। कहा कि यह सच में उनके और पहाड़ के लिए एक नई शुरुआत थी।

मैडम स्टेफ़नी क्लेड्ट, जिन्होंने इस एग्ज़िबिशन को क्यूरेट, डिज़ाइन और लागू किया, ने बहुत प्यार से म्यूनिख में ‘स्टैट्लिश ग्राफ़िशे सैम्लंग’ में एक मीटिंग अरेंज की, जहाँ कई ड्रॉइंग्स को बहुत ध्यान से रखा गया था। कहा कि वह खुशकिस्मत भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने नैनीताल और कुमाऊँ के आस-पास के इलाकों, ऊँचे हिमालय के नज़ारों और उन्नीसवीं सदी के बीच की पवित्र जगहों की ड्रॉइंग्स, स्केच और पेंटिंग्स को हाई क्वालिटी और ओरिजिनल डिटेल में देखा। हालांकि देहरादून में सर्वे ऑफ़ इंडिया और स्टॉकहोम में स्वेन हेडिन फ़ाउंडेशन में श्लागिन्ट्वाइट वॉल्यूम देखे हैं और उनके बड़े हिमालयन डॉक्यूमेंटेशन का अंदाज़ा लगाया है।

प्रो० पाठक ने बताया कि हरमन और स्टेफ़नी के लगातार शामिल होने और पहल करने से यह मुमकिन हुआ और वे पहले फ़ेज़ में तीन जगहों पर ओपनिंग लेक्चर के साथ एक्ज़िबिशन ऑर्गनाइज़ कर रहे हैं – इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली; दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर, देहरादून और CRST कॉलेज/RST उत्तराखंड एकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन, नैनीताल।

पहाड़ की तरफ़ से ‘एल्पाइन्स म्यूज़ियम’, ‘स्टैट्लिश ग्राफ़िशे सैम्लुंग म्यूनचेन’, बवेरियन स्टेट लाइब्रेरी, श्लागिन्ट्वाइट फ़ैमिली के सदस्यों और उन इंस्टीट्यूशन-ऑर्गेनाइज़ेशन-स्पॉन्सर-लोगों का दिल से शुक्रिया अदा करते हैं, जिन्होंने इंडिया में एक्ज़िबिशन होस्ट करने में मदद की। वे प्रोफ़ेसर हरमन क्रेट्ज़मैन, मैडम स्टेफ़नी क्लेड्ट, डॉ. जोहानिस एरिक्सन, स्टीफ़न रिटर और इन संस्थानों के अन्य लोगों को भारत में इस प्रदर्शनी के लिए इतनी गहरी दिलचस्पी और नियमित समर्थन के लिए धन्यवाद देते हैं। आईआईसी और इसके अध्यक्ष श्याम शरण (और आईआईसी के अन्य लोगों) के भी आभारी हैं; जर्मन दूतावास, दिल्ली के राजदूत फिलिप एकरमैन, डीएलआरसी के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर बी.के. जोशी, निदेशक एन. रविशंकर, एन.एस. नपलच्याल, सी.एस. तिवारी और निकोलस हॉफलैंड, लोकेश ओहरी (आईएनटीएसीएच), संजीव चोपड़ा (वीओडब्ल्यू), देहरादून, श्री बी.पी. पांडे, डी.जी, आरएसटीयूएए, अनूप साह, प्रबंधक मनोज पांडे, प्राचार्य, सीआरएसटी कॉलेज, नैनीताल एग्ज़िबिशन और उससे जुड़े पब्लिकेशन को सपोर्ट करने के लिए टूरिज़्म डिपार्टमेंट, उत्तराखंड सरकार के मिस्टर डी. गर्ब्याल का शुक्रिया करते है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ टीम चंदन डांगी दिल्ली, जी. पांडे, ए. उपाध्याय, पी. बिष्ट एच. पाठक इसके पीछे काम कर रही है। उनका और एस. जोशी, श्रीमती उषा कश्यप का भी शुक्रिया, जिन्होंने कैटलॉग और कैलेंडर को प्रिंट करने में कम समय में बहुत कुछ किया।


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साभार: आलेख के तकनीकी पक्ष मुकेश प्रसाद बहुगुणा की वाल से लिये गए है।
फोटो साभार : आशी डोभाल

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