हिमालयी जनजीवन के अतीत की शानदार फैंटेसी और वर्तमान का कबूलनामा-
Dr Arun kuksal
“क्या ऐसा नहीं लगता कि हम, वर्तमान में जी रहे लोग, अतीत और वर्तमान की दोनों धाराओं को अपने दोनों हाथों से थामे रखने की ज़िद के साथ, एक तर्कातीत अंध-आस्था के सहारे भागे चले जा रहे हैं, हालाँकि खुद नहीं जानते कि जा कहाँ रहे हैं, आगे बढ़ भी रहे हैं या नहीं…फिर भी हम इसे ही प्रगति का नाम देते हैं।…’’ (पृष्ठ-94)
बटरोही की किताब ‘दो पंडितों की तपस्या से दरकते पहाड़’ ने हिमालय के एक बड़े हिस्से के सामाजिक जीवन के अतीत, वर्तमान और भविष्य की उक्त कसमसाहट को सशक्त स्वर दिया है। ये स्वर सामाजिक प्रचलन में विद्यमान मिथक, लोक कथा और किस्सागोई में शामिल कई किरदारों के हैं। ये किरदार इस किताब में अपनी बात और पक्ष बुलन्द करने की कोशिश में हैं। ये बात अलग है कि कहीं उनके स्वर निरीह तो कहीं उनमें भयंकर गर्जना है। बटरोही ने घुमावदार फैंटेसी विधा में इन किरदारों को पुनः गढ़ा भी है।
बटरोही मानते हैं कि अपने समयकाल के समाज और उसके जीवन को अवाक् करने वाले ये किरदार वर्तमान में भी अप्रसांगिक नहीं है।
‘‘हमारे दौर के सर्वाधिक चर्चित नास्तिक विचारक स्टीफन हॉकिंग और युवाल नोवा हरारी ने समय और मानव जाति का जो इतिहास हमें थमाया है, वे भी अपने विषद अध्ययन के बावजूद इनरुवा लाटा और दाड़िम बुड़िया के मिथकों के रहस्य को नहीं सुलझा पाए।… पिता आकाश और माता पृथ्वी के गर्भ से जनन की सनातन प्रक्रिया से जन्मी इन संतानों को आज तक भी उनकी शक्ति और संवेदना के आधार पर नहीं समझा जा सका है। सृष्टि का विकास-क्रम क्या पतन का ही इतिहास है? महानता और विराटता से शुरू होकर निरीहता और शून्य तक पहुँचने वाली यात्रा? धैर्य रखिए, आने वाला वक्त अपने ही जन्मदाताओं के द्वारा कूड़े की तरह हाशिये में झोंक दिए गए इन्हीं संतानों के महाशक्ति बनने का दौर है।’’ (पृष्ठ-8)
समाज में प्रचलित मिथकों, किवदन्तियों, दन्तकथाओं का असल सत्य से अक्सर सीधा सामना भले ही नहीं हुआ होगा, परन्तु वे सत्य के निकट अवश्य होते हैं। क्योंकि, उनके उदगम और उपज के कारक वहीं मौजूद रहे हैं। वहीं से जनमानस में अपने फैलाव और लोकप्रियता को वे जीवंत रख पाते हैं।
बटरोही इस तथ्य को स्वीकारते हुए फैंटेसी के माध्यम से इसे जग-जाहिर करते हैं। लीक से हटकर ऐसी रचना को पढ़ने के हम अभ्यस्त नहीं है।
यह किताब इन संदर्भों में लेखन के एक नये प्रयोग और राह की संभावनाओं के रूप में सार्वजनिक हुई है।
इस किताब में स्टीफन हॉकिंग, युवाल नोवा हरारी, किन्नर रजनी रावत, वृहन्नला, गौरी सावंत, ठाकुर नरपत सिंह दानू, हरदा शास्त्री, गोविंद बल्लभ पंत, जवाहर लाल नेहरू, निर्मल वर्मा, महेन्द्र सिंह धौनी, धौनी और मौनी भाइयों की गाथा, इंद्र-अहिल्या के मिथक, दानव वंश एवं अन्य मल्ल/पैक के किस्से, प्रसिद्व इतिहासकार डॉ. राम सिंह की किताब ‘राग-भाग काली कुमाऊँ’ (राग-भाग का अर्थ है कि लोगों के अपने अतीत के व्यक्तियों, घटनाओं और स्थलों के बारे में संचित विश्वास, जो उन्होने अपने पुरखों/पूर्वजों से आत्मसात कर आने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक बनाये रखे हैं।), कश्मीर, किन्नौर और केदारनाथ के दरकते हुए पहाड़, ‘ट्रांस जेंडर’, ‘मेंटली चैलेंज्ड’, दोैंनकोट, ब्लैकहोल, किन्नौर, गुमदेश, ‘बिरखम’ (योद्धाओं के द्वारा स्थापित खंबे के आकार की भारी-भरकम शिलाएं) देवीधूरा का पाषाण युद्ध, पृथ्वी की प्रतीक बाराही देवी का मंदिर, इनरुवा लाटा, दाड़िम बहू/माई, घूरू-बू, मोहनियाँ कोठारी आदि और भी कई अन्य इस फैंटेसी के संवाहक हैं।
फैंटेसी का केन्द्र बिन्दु बटरोही की ही सन् 1985 में प्रकाशित ‘सड़क का भूगोल’ कहानी संग्रह में शामिल कहानी ‘किम्पुरुष’ और कुमाऊँ की एक लोककथा ‘लछुवैकि नौ कुड़ी बाखई और दाड़िम बुड़ि (लछुवा कोठारी की नौ घरों की श्रृंखला और दाड़िम बुढ़िया) है।
‘किम्पुरुष’ के शिव और पुरोहित पात्रों के आपसी संवाद फैंटेसी की शक्ल में मानव सोच की अनन्तता/अंतता को बताते हैं। ‘व्यवस्था को किम्पुरुष ने दफ़ना दिया है।’ के ठहराव के साथ कहानी अपने विराम बिन्दु पर पहुँचती है। वो व्यवस्था जिसे हम सब ढ़ोने के लिए आज भी अभिशप्त हैं।
क्योंकि-
‘‘बात यह है दोस्त, जब व्यवस्था के द्वारा भेजी गई राख उनके शरीर पर पड़ती है तो वे लोग एक नए आदमी को जन्म देते हैं….जो उन्हीं की तरह सोचता है, और बिना बताए ही उसे मालूम हो जाता है कि खाक के बोरों का क्या करना है। वह बोरों को देखते ही चिल्लाता हुआ उन्हें अपने सिर पर रख लेता है और व्यवस्था के गुणगान करने लगता है।
‘मगर तुम तो कह रहे थे कि बोरों में खाक़ होती ही नहीं!’ पुरोहित ने दाहिनी ओर थूक छिटकाते हुए कहा।
‘…दोस्त, अगर उनमें खाक़ ही भरी होती तो वे लोग सचमुच उपजाऊ न हो गए होते! उन्हें इस बात पर पूरा भरोसा होता है कि व्यवस्था ने उनमें ज़रूर खाक़ भरी होगी। और, वे लोग खाली बोरे सिर पर रखकर नाचने लगते हैं।’’ (‘किम्पुरुष’, पृष्ठ-55)
इस किताब की फैंटेसी का दूसरा छोर कमिश्नर ओकले और उप्रेती द्वारा संपादित पुस्तक ‘फोकलोर्स ऑफ कुमाऊँ एण्ड गढ़वाल’ जो सन् 1880 के करीब प्रकाशित हुई, में लछुवा कोठारी के 9 पुत्रों और दाड़िम बुढ़िया की कहानी है। कहा गया कि परगना-गंगोली, पट्टी बेरीनाग का कोठार गाँव जिसमें लछुवा कोठारी की नौ घरों वाली बाखइ आज भी है। इस कहानी में, मोहनियाँ कोठारी, दाड़िम बहू (जो बाद में दाड़िम माई बन गई) इनरुवा लाटा, घूरू-बू के जीवन चक्र और तत्कालीन सामाजिक जन-जीवन का मिज़ाज मानव की प्रचलित जड़ों की ओर लौटने जैसा है।
बहती धारा के विरुद्ध यह प्रवाह जीवन के असल सच को झटके से कहने के बाद शांत जरूर होता है पर उसमें शांति की नहीं बैचैनी की महक है-
‘‘…वह जानती थी कि उसे सचमुच औरत के सहारे की ज़रूरत थी। उसी पल दाड़िमी के मन में यह बात भी तो उभरी थी कि उसे भी एक पुरुष की ज़रूरत थी, जिसे वह जाने कब से तलाशती रही थी।…तब से लेकर आज तक चालीस साल की लंबी अवधि बीत चुकी है, दाड़िमी इतने सालों तक मंदिर के उसी सीलन भरे कमरे में रहती आ रही थी, उन कुछ वर्षों को छोड़कर, जब वह बुढ़ापे की दहलीज़ पर कोठार गाँव के अपने ससुराल के घर में अपने देवता के लिए खाना बनाने के लिए लौट आई थी। (पृष्ठ-97)
किताब में ‘दो पंडितों की तपस्या से दरकते पहाड़’ के चरित्र गोविन्द बल्लभ पंत (उत्तराखण्ड) और जवाहर लाल नेहरू (कश्मीर) के साथ कथाकार निर्मल वर्मा (हिमाचंल) के वैचारिक और व्यवहारिक व्यक्तित्वों को रेखांकित किया गया है।
आज के संदर्भों में उत्तराखण्ड, कश्मीर और हिमाचंल के दरकते पहाड़ों और उनमें स्थित मानवीय बसासतों की कष्टकारी पीड़ा के होते हुए इन बौद्धिकों पर प्रश्न चिन्ह् उभरना लाज़िमी है। इन पहाड़ों के साथ इन दिग्पुरुषों की दरकती देह का दर्शन इसमें है।
सही मायने में हिमालय और हिमालयवासियों पर बटरोही की यह फैंटेसी आज के हालत का कबूलनामा भी है। जिसे हर पाठकीय स्तर पर गम्भीरता और रोचकता के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
ताकि, उन मिथकों जिनसे हम बच कर निकलना चाहते हैं, अच्छा हो, उनको समझकर जीवन में आगे बढ़ा जाए। बटरोही की फैंटेसी किताब इसी ओर इशारा करती है।
छाना गांव (छानगों), पट्टी-सालम, जनपद-अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) में 25 अप्रैल, 1946 को जन्में प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ विगत 50 वर्षों से हिन्दी लेखन में सक्रिय हैं। बटरोहीजी की ख्याति देश-दुनिया और हिन्दी साहित्य संसार में एक कथाकार के रूप में है। वे वर्ष-2006 में कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल से विभागाध्यक्ष (हिंदी) और अधिष्ठाता कला संकाय के पद से सेवा-निवृत्त हुए। उसके बाद, वर्ष-1997 से 2000 तक ‘ऑत्वॉश लोरांद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बुदापैश्त’ (हंगरी) में हिंदी के प्रोफ़ेसर रहे।
बटरोही जी के रचना संसार के कई फ़लक हैं, यथा- दिवास्वप्न, सड़क का भूगोल, अनाथ मुहल्ले के ठुलदा, हिडिम्बा के गाँव में, मोत्दा च्चा बड़बाज्यू (कहानी), बर्फ, महर ठाुकुरों का गाँव, थोकदार किसी की नहीं सुनता (उपन्यास), गर्भगृह में नैनीताल, पहाड़ की जडें, हम तीन थोकदार, दो पंडितों की तपस्या से दरकते पहाड़ (आख्यान), आगे के पीछे (चार उपन्यासिकाएँ), गांधी संदर्भ, इक्कीसवीं सदी में गांधी, कुमाउँनी संस्कृति(संपादन), कहानी-रचना प्रक्रिया और स्वरूप, कहानी: संवाद का तीसरा आयाम, हिंदी कहानी के अट्ठारह कदम (आलोचना), एक ही धारा, सुबह का भूला, सुदामा, वीर गाथाएँ (बाल साहित्य) आदि प्रकाशित साहित्य हैं।
अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़े बटरोही जी को वर्ष -2024 में उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा उनके उत्कृष्ट दीर्घकालीन साहित्य सृजन के लिए ‘सुमित्रानंदन पंत साहित्य गौरव’ से सम्मानित किया गया है।
बटरोही जी की शानदार साहित्यक-लेखन अनवरत यात्रा जारी रहे, यही शुभ-कामना है।
पुस्तक- दो पंडितों की तपस्या से दरकते पहाड़
लेखक- बटरोही
आवरण- कुँअर रविन्द्र
प्रकाशक- समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून
संस्करण- प्रथम, 2023, मूल्य- 125, पृष्ठ- 100
अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड







