– फिर से लिख दे रहा हूं, ताकि सनद रहे। – आकाश भी केदारनाथ का संतुलन बनाता है।
By Mahipal negi
2013 की आपदा के बाद भी केदारनाथ में जिस तरह से सबक नहीं सीखे गए, और अब भी भारी निर्माण, हैलीकॉप्टर व इन्सानों की भीड़ पहुंच रही है, उससे इस शिवधाम और यहां पहुंच रहे यात्रियों को फिर से भारी खतरे की आशंका पैदा हो गई है।
“केदारखण्ड” ग्रंथ बताता है कि इस पौराणिक धाम के सन्तुलन में ही मंदिर की सुरक्षा भी निहित है। यह धाम और मंदिर टिका हुआ ही सन्तुलन पर है। 2013 की आपदा में सन्तुलन को बिगाड़ने वाले तमाम निर्माण ध्वस्त हुये और हजारों लोग मौत के मुंह में चले गए।
प्राचीन केदरखंड ग्रंथ के अनुसार शिव के इस धाम का संतुलन बना है, आकाश, पर्वत, ग्लेशियर, नदी, जलधारा, जलकुण्ड, नदियों के संगम से। धाम स्थापित नहीं, स्वयंभू है। मंदिर स्थापित है, लेकिन धाम जंगम (प्रत्यक्ष) है। भौगोलिक रूप से यह अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्र है। “केदार” का अर्थ ही है जलमयी या दलदली भूमि।
केदारनाथ का सेटलमेंट मोरैन के ऊपर हैं। केदारनाथ सहित सभी तीर्थ स्थलों की नदी घाटियों की कैरिंग कैपेसिटी (वहन क्षमता) का अब तक भी आकलन भी नहीं हो पाया है। केदारधाम एक तरह से भूजल के ऊपर तैर रहा है। केदारखण्ड बताता है कि केदारनाथ में अनेक स्थानों पर पानी बुलबुलों के रूप में निकलता है। जलमयी भूमि में चरण रखने से भी भूमि कम्पायमान हो जाती है।
2013 की भीषण आपदा में भी मंदिर के सुरक्षित रहने के पीछे पारिस्थितिकी और लोक विज्ञान की समझ रही है। मंदिर से भारी ढांचा धाम के किसी और हिस्से में बनाया जा रहा है तो यह असन्तुलन पैदा करेगा।
यह भी ध्यान रहे, आकाश भी इस धाम का सन्तुलन बनाता है। जिसे हैलीकाप्टर भी खण्डित करते हैं। 2013 की आपदा का सम्बन्ध आकाश के असन्तुलन से भी था, जब पश्चिमी विक्षोभ और और पूर्वी मानसून की भिड़ंत इसी के आकाश में हो गई थी।
एक बात और समझिए कुछ दिन पहले जो हेलीकॉप्टर दुर्घटना हुई, उसके पीछे एक मिनट बाद एक और हेलीकॉप्टर ने उड़ान भरी थी। पहले वाला जो दुर्घटनाग्रस्त हुआ उसने बादलों के नीचे उड़ने का प्रयास किया जबकि दूसरा बादलों के ऊपर से सुरक्षित निकल गया। दोनों के आकलन में किस कारण भ्रम हुआ। इस संवेदनशील घाटी में बादलों की उड़ान कभी भी भ्रमित कर सकती है।
मान्यता है कि केदारनाथ में शिव ध्यान अवस्था में रहते हैं। हमसे पहले वाली पीढ़ी के लोग कहते हैं कि केदारनाथ में बिना शोर शराबा, दबे पांव चलना होता था। अब तो पांवों की भी धमा चौकड़ी है और भारी शोर शराबा भी। और इस शोर शराबे में भूगर्भ विज्ञान और लोक विज्ञान की बात करना, किसकी समझ में आएगा …..?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) की इंडियन डिजास्टर रिपोर्ट 2013 में कुल 19 संस्तुतियां की गई हैं एक संस्तुति में कहा गया है कि इस क्षेत्र में रिस्क जोन को मानचित्र पर चिन्हित किया जाना चाहिए। नदी तटों के निकट पर्यटन और तीर्थाटन के दबाव को रोकना होगा।
इसी तरह एक रिपोर्ट वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान ने भी इस आपदा के बाद तैयार की थी, जिसमें केदार घाटी को बहुत ही संवेदनशील बताया गया और स्पष्ट कहा गया कि भारी निर्माण और यात्रियों व पर्यटकों के दबाव से इस तरह की आपदाओं का खतरा बढ़ेगा।
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