आपातकाल की आंधी में साहस और प्रेम की गाथा: डॉ. प्रभाकर उनियाल और विनोदबाला बहुगुणा का विवाह।
By Sheeshpal Gusai
1975-76 का दौर उत्तराखंड के इतिहास में एक अनूठा और उथल-पुथल भरा पड़ाव था। टिहरी रियासत का राजशाही युग समाप्त हो चुका था, और टिहरी जिला उत्तर प्रदेश के सरकारी तंत्र में समाहित हो गया था। नरेंद्रनगर, जो तब जिला मुख्यालय था, वहाँ जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) जैसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी अपने दायित्वों के साथ-साथ अपने आवासों में निवास करते थे। इन्हीं में से एक थे गोपाल राम बहुगुणा, जिन्होंने टिहरी गढ़वाल के डीआईओएस के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में अमिट योगदान दिया। किंतु यह कथा केवल उनकी प्रशासनिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं, बल्कि उनकी पुत्री विनोदबाला बहुगुणा और डॉ. प्रभाकर उनियाल के उस रिश्ते की है, जो आपातकाल के काले बादलों तले साहस और प्रेम की मशाल बनकर चमका।
रिश्ते का प्रभात और आपातकाल की छाया
गोपाल राम बहुगुणा, संस्कृत के साधक और आदर्शवादी शिक्षाविद्, नरेंद्रनगर में डीआईओएस के रूप में कार्यरत थे। उनकी पुत्री विनोदबाला का रिश्ता डॉ. प्रभाकर उनियाल से तय हुआ। विनोदबाला जी तब बीएड कर रही थीं। प्रभाकर, जो हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नरेंद्रनगर शाखा में देहरादून से ट्रांसफर हुए थे, एक उत्साही और प्रतिभाशाली युवा थे। किंतु यह वह दौर था जब देश आपातकाल (1975-77) की कठोर गिरफ्त में जकड़ा था। संवैधानिक स्वतंत्रताएँ कुचली जा रही थीं, और असहमति की हर आवाज़ को जेल की सलाखों में कैद कर दिया गया था। जिलाधिकारी को जब इस रिश्ते की खबर मिली, उन्होंने गोपाल जी को बुला कर चेतावनी दी: “बहुगुणा जी, आप अपनी बेटी का रिश्ता कहाँ कर रहे हैं? प्रभाकर उनियाल आपातकाल के खिलाफ बगावत में लिप्त हैं। वे देहरादून से तड़ीपार हैं और जेल में बंद लोगों का बाहर से समर्थन कर रहे हैं। इस रिश्ते पर पुनर्विचार करें।” जिलाधिकारी का संदेश स्पष्ट था—यह रिश्ता सत्ता की नजरों में जोखिम भरा था।
गोपाल जी का अटल संकल्प
गोपाल राम बहुगुणा, जिनका जीवन सत्य, संस्कार और सामाजिक सरोकारों की नींव पर खड़ा था, ने सत्ता के इस दबाव को ठुकरा दिया। उनके लिए यह रिश्ता केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि दो परिवारों के साझा आदर्शों और मूल्यों का संगम था। प्रभाकर के चरित्र और उनके परिवार की प्रतिष्ठा पर उनका अटूट विश्वास था। गोपाल जी का यह निर्णय केवल व्यक्तिगत साहस का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस अंधेरे दौर में सत्ता के सामने सत्य का पक्ष लेने की उनकी अडिग प्रतिबद्धता का परिचायक था।
आपातकाल में प्रेम का परिणय
1976 में, जब आपातकाल अपने चरम पर था, विनोदबाला और प्रभाकर का विवाह देहरादून में संपन्न हुआ। डॉ प्रभाकर कैमरी गांव (चम्बा ) टिहरी के जबकि विनोदबाला गोदी सिराई (पट्टी जुवा) टिहरी की मूल के हैं। दोनों परिवार तब देहरादून में बसे थे। यह विवाह केवल दो हृदयों का मिलन नहीं था, बल्कि विषम परिस्थितियों में आशा, साहस और वैचारिक दृढ़ता का प्रतीक था। श्रीमती विनोदबाला उनियाल, जो आज उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार में महिला उद्यमिता विभाग की राज्य मंत्री हैं, उस दौर को याद करते हुए कहती हैं, “आपातकाल का वह समय हमारे लिए संघर्षमय था। शादी की खुशियाँ उस काली छाया में दब गई थीं। हमने कोई उत्सव नहीं मनाया, क्योंकि हमारा मन उन साथियों के साथ था जो जेलों में बंद थे।”
विवाह के बाद प्रभाकर, जो बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख नेता के रूप में ख्यात हुए, ने एक असाधारण कदम उठाया। वे देहरादून जेल में बंद आरएसएस कार्यकर्ताओं के लिए मिठाई लेकर पहुँचे। जेलर को मिठाई का डब्बा सौंपते हुए उन्होंने कहा, “यह डब्बा अंदर बंद हमारे साथियों तक पहुँचा दीजिए।” यह छोटी-सी घटना उनके निस्वार्थ भाव और वैचारिक अटलता का प्रबल प्रमाण थी।
Vinod bala uniyal bahuguna
संघर्ष और प्रेरणा की अमर विरासत
श्रीमती विनोदबाला उनियाल जब उस दौर को स्मरण करती हैं, तो उनकी आँखों में आपातकाल के कठिन दिनों की स्मृतियाँ जीवंत हो उठती हैं। वे कहती हैं, “हमारे परिवार ने आपातकाल में अभूतपूर्व संघर्ष देखा। वह समय हमें सिखाता है कि सत्य और स्वतंत्रता के लिए लड़ना कितना अनिवार्य है।” डॉ. प्रभाकर उनियाल, जो स्टेट बैंक में वरिष्ठ पद पर अपनी सेवा के साथ-साथ आरएसएस के प्रति समर्पित रहे, आज हमारे बीच नहीं हैं। किंतु उनकी वैचारिक निष्ठा और गोपाल राम बहुगुणा के साहस ने जो विरासत रची, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
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