प्रेमचंद भारतीयता एवं भारतीय मूल्य के रचनाकार हैं – प्रो. लोहनी
मानविकी विद्याशाखा के निदेशक प्रो. गिरिजा प्रसाद पाण्डे ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में कहा कि बिना साहित्य के इतिहास को देखना बहुत कठिन होता है। प्रेमचंद की रचनाएं हमारे समाज की वैकल्पिक इतिहास हैं। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में समाज को एक खास तौर पर देखा और प्रस्तुत किया। प्रेमचंद के पात्र समाज के नायक के रूप हमारे सामने आते हैं। प्रेमचंद के हिंदी चुनने के पीछे हिंदी के समन्वय की भाषा होना है। यह अनायास नहीं है कि उन्होंने उर्दू छोड़ हिंदी चुना। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि-आलोचक एवं हिंदी विभाग, कुमाऊं विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. शिरीष कुमार मौर्य ने प्रेमचंद के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि प्रेमचंद पर महानता थोपी गई। कई आलोचकों ने उन्हें अतिरेक में देखा। जबकि मैं प्रस्तावित करना चाहता हूं कि उन्हें साधारण के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रेमचंद ने भाषा को साधारण बनाया। प्रेमचंद की रचनाओं में एक सांस्कृतिक मेलजोल दिखता है, जिनमें एक भाषाई तहजीब है। प्रेमचंद की स्त्री पात्र सताई जाती हैं लेकिन हारती नहीं है। प्रेमचंद भाषा और विषयों में एक नए सौंदर्यशास्त्र की वकालत करते हैं। गोदान सामंतवाद से पूंजीवाद के आने की सूचना है। गोदान का बिखराव ही उसका विशिष्ट मूल्य है। इस संगोष्ठी के दूसरे वक्ता डॉ. अनिल कुमार कार्की ने कहा कि प्रेमचंद का जीवन और उनका रचनाकर्म में एका है। कार्यक्रम की पहली वक्ता डॉ. पुष्पा बुढलाकोटी ने प्रेमचंद पर अपनी बात रखते हुए कहा कि प्रेमचंद के पात्र गांव और शहर की सीमाओं को पाट देते हैं।
RELATED ARTICLES










