पचास-पचपन साल पहले लिखा गया उपन्यास क्या आप दोबारा पढ़ेंगे? यदि पढ़ेंगे तो क्या इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई समय बीत जाने के बाद उस उपन्यास की परिस्थितियाँ-देशकाल-चरित्रों से खुद का तारतम्य बिठा पाएँगे? क्या वह उपन्यास आपको अन्त तक जोड़कर रख पाएगा? क्या आप उसे पढ़कर किसी और पाठक को पढ़ने के लिए कहेंगे?
यदि इन सवालों का जवाब आप ‘नहीं-नहीं-नहीं’ जैसा सोच रहे हैं तो मैं आपको कुबड़ी बुढ़िया की हवेली’ उपन्यास पढ़ने के लिए अवश्य कहूँगा।
ए-4 साइज के पन्ने को दो बार मोड़ देने पर जो आकार हमारे हाथों में आता है उससे तनिक से बड़े आकार में यह उपन्यास फिर से सामने आया है। आप इसे एक ही बैठकी में पढ़ लेंगे। यकीनन।
कुबड़ी बुढ़िया की हवेली इस उपन्यास में कहीं नहीं आती। यह बाल पाठकों को खू़ब पसंद आता है। चूँकि इसमें तीन बच्चे मिनी, भोला और राजू ही हवेली के साथ-साथ पूरे उपन्यास में केन्द्र पर रहते हैं तो भी बाल पाठकों का इस उपन्यास से जुड़ाव होना ही है।
मुझे यह कहने में क़तई संकोच नहीं हो रहा है कि मैं कहानियों का पाठक हूँ। उपन्यास मुझे कभी आकर्षित नहीं कर पाते। हालांकि नामचीन उपन्यास मैंने पढ़े हैं लेकिन मैं उपन्यासों का नियमित पाठक नहीं ही हूँ।
खैर. . .‘कुबड़ी बुढ़िया की हवेली’ सुरेंद्र मोहन पाठक द्वारा लिखा गया एक बाल उपन्यास है। हालांकि यह 1971 में प्रकाशित हुआ था। उपन्यास में एक पुरानी हवेली है। आम ख़याल यह है कि हवेली में एक घंटी है जो कभी-कभी अपने आप बजने लगती है। खासकर तब जब अंधेरी रात होती है। उपन्यास में, राजू, मिनी और भोला हवेली में एक गुप्त रास्ते की तलाश करते हैं। इस पुरानी हवेली में जिसका घंटा कभी-कभी अपने आप बजने लगता था। बच्चों को लगता है कि कहानियों में पढ़ी गयी ज्यादातर पुरानी हवेलियों की तरह इस हवेली में भी कोई न कोई गुप्त रास्ता अवश्य है। गुप्त रास्ते की तलाश में तीनों बच्चे पड़ताल करते रहते हैं और आखिर में वह एक रोमांचक, रहस्यपूर्ण मगर खतरनाक रहस्य की तह तक पहुँच ही जाते हैं। उपन्यास की दुनिया में वह भी आम पाठकों की नब्ज़ पकड़ने वाले सुरेन्द्र मोहन पाठक की कलम से खास तौर पर बच्चों के लिए लिखा गया रोमांचक उपन्यास यदि आपने मेरी तरह पहले नहीं पढ़ा है तो अब पढ़िए।
और हाँ! इसे नये कलेवर में पाठकों के लिए साहित्य विमर्श प्रकाशन लाया है। भाषा शैली, शब्दावली, आकार-प्रकार, फोंट आकार, छपाई। सब कुछ मनोनुकूल है। एक बार मँगाइए तो सही। और हाँ। बाल पाठकों को उनके जन्मदिन पर उपहार देने के लिए यह एक शानदार विकल्प हो सकता है।
उपन्यास का आगाज़ आप भी पढ़िएगा-
—
गर्मियां आ गई।
स्कूल बन्द हो गये। राजू और मिनी को इस बार गर्मियों की छट्टियां बिताने के लिये गांव में उनके दादा के पास भेज दिया गया।
राजू और मिनी वकील हरि प्रकाश के बच्चे थे। राजू ग्यारह साल का था और मिनी नौ साल की थी। वकील साहब की पत्नी मीना एक बेहद आधुनिक युवती थी और वह बच्चों का लम्बे समय के लिए गांव में जाकर रहना पसन्द नहीं करती थी। उसका ख्याल था कि गांव में रहकर बच्चे अस्वस्थ हो जाएंगे और बुरी आदतें सीख जायेंगे। हर साल गर्मी की छुट्टियों में वकील साहब बच्चों को गांव भेजने की बात करते थे लेकिन मीना जिद पकड़ लेती थी कि वह बच्चों को गांव नहीं भेजेगी।
इस बार वकील साहब की जीत हुई थी। वे अपनी मोटर पर राजू और मिनी को और उनके कुत्ते शेरा को गांव में अपने पिता के पास छोड़ गये थे।
वकील साहब के पिता अर्थात राजू और मिनी के दादा जी गांव के चौधरी थे। गांव में उनका एक बहुत बड़ा खुले-खुले कमरों और ऊंची ऊंची छतों वाला मकान था। बाहर एक बहुत बड़ा आंगन था जहां भैंसें बांधी जाती थी और जिसके एक कोने में उनके नौकर मोती का परिवार रहता था।
बच्चे गांव में आकर बहुत खुश हुए।
अगले दिन चौधरी साहब ने उन्हें सारे गांव में घुमा दिया। सारा गांव राजू और मिनी और उनके कुत्ते शेरा को पहचान गया। क्योंकि गांव के सारे लोग चौधरी साहब के जाने पहचाने थे इसलिए चौधरी साहब ने उनके गांव में घूमने या उनके कहीं खेलने पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई।
राजू और मिनी खुश थे।
अगले दिन वे दोनों गांव के एक सिरे पर स्थित कुबड़ी बुढ़िया की हवेली देखने गये। हवेली बहुत बड़ी थी। उसका नाम कुबड़ी बढ़िया की हवेली कैसे पड़ गया था यह किसी को मालूम नहीं था।
हवेली के दरवाजे पर हवेली का रखवाला बैठा था। उसने अपने सामने साफ सुथरे आधुनिक कपड़े पहने दो बच्चों को देखा तो वह झट जान गया कि वे कौन थे।
“तुम चौधरी साहब के बच्चे हो ?” उसने पूछा।
दोनों ने हामी भर दी।
“हवेली देखने आये हो ?”
एक और अंश पढ़िएगा। भाषा की रवानगी के दर्शन कीजएगा-
“यह सुन्दरी है।” भोला गर्वपूर्ण स्वर में बोला ।
“अरे ।”- राजू हंसता हुआ बोला “मैं तो मिनी को कह रहा था कि सुन्दरी तुम्हारी बहन है
1
भोला मुस्कराया ।
सुन्दरी भोला के कन्धे से उछलकर सिर पर पहुंच गई और तितर बितर राजू मिनी और शेरा को देखने लगी।
“यह काटती तो नहीं?” – राजू ने डरते हुए पूछा।
“नहीं।” – भोला विश्वासपूर्ण स्वर से बोला ।
“तुम हमें अपनी सुन्दरी से खेलने दोगे?” मिनी ने पूछा।
“तुम दोनों मुझे अपने शेरा से खेलने दोगे?” भोला बोला ।
“हां।”- राजू और मिनी एक साथ बोले ।
“तो फिर मैं तुम्हें सुन्दरी से खेलने दूंगा।”
“आओ बाग में चलें।”- राजू बोला ।
इमारत की बगल में ही कई घने फल देने वाले पेड़ उगे हुए थे जो चौधरी साहब की ही जायदाद थी।
वे सब बाग में पहुंच गए।
राजू ने भोला को बताया कि सुबह वे कुबड़ी बुढिया की हवेली देखने गए थे। मिनी ने उसे बताया कि उन्होंने वहां क्या क्या देखा था। साथ ही उसने हवेली में कोई गुप्त रास्ता न होने की शिकायत भी की।
“लेकिन गुप्त रास्ता तो वहां है।” – भोला बोला ।
“क्या ?” – मिनी हैरानी से उसका मुंह देखने लगी।
“गुप्त रास्ता है वहां ?” – राजू बोला ।
“और नहीं तो क्या ?” – भोला बोला “मैने खुद देखा है। वैसे बड़े काका ने दिखाया है मुझे ।”
“तो फिर रखवाले ने वह गुप्त रास्ता हमें क्यों नहीं दिखाया ?” – मिनी बोली ।
“भगवान जाने ।” भोला बोला “तुम लोग मेरे साथ चलो तो मैं तुम्हें गुप्त रास्ता दिखाता…..
बहरहाल, विवरण निम्न है-
उपन्यास – कुबड़ी बुढ़िया की हवेली
उपन्यासकार- सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रकाशक – साहित्य विमर्श
मूल्य- 109
पृष्ठ – 96
प्रकाशन वर्ष – 2021
आईएसबीएन-9789392829031
प्रकाशक का पता-साहित्य विमर्श प्रकाशन
987,सेक्टर 9, गुरुग्राम,हरियाणा 122006
सम्पर्क: 9310599506
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