“घड़ी की टिक-टिक, पंखे की सरसराहट और बीच में बजता विविध भारती—यही तो था हमारे जीवन का संगीत।”
By – Mamata Singh
विविध भारती रेडियो के रूप में केवल एक यंत्र नहीं था, वह तो मन का साथी था, जो अकेलेपन में हौसला देता, भीड़ में अपनापन जगाता और दूर रहते प्रियजनों की यादों को गीतों के ज़रिए करीब ले आता था। विविध भारती ने कितनी बड़ी तिलिस्मी दुनिया रच दी थी।

1957 में जन्मा विविध भारती सिर्फ़ रेडियो नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की साँसों की लय बन गया।
विविध भारती पर प्रसारित होने वाला पहला गीत एक विशेष “प्रसार गीत” था। इसके बोल पंडित नरेंद्र शर्मा ने लिखे थे, संगीत अनिल विश्वास ने दिया था और इसे मशहूर गायक मन्ना डे ने गाया था। इस गीत के बोल थे: “नाच मयूरा नाच”।
शुरुआत में इसका प्रसारण केवल दो केंद्रों, बम्बई (अब मुंबई) और मद्रास (अब चेन्नई) से होता था।
भक्ति संगीत, चित्रलोक, जयमाला, छायागीत हवा महल, मनचाहेगीत, गुंजन, एक फनकार, आपकी फरमाइश जैसे कार्यक्रमों के समय से तय होता था घर के कामकाज।
कहीं घर का काम रेडियो के साथ पूरा होता, कहीं फौजी भाइयों को देशवासियों का प्यार पहुँचता, तो कहीं बच्चे कहानी सुनते-सुनते नींद में खो जाते।
छत की दीवारों पर तिरछी हो कर झूलती डालियां आसमान से झरतीं चांदनी से नहा रही होती, हम निखरे सलोने चांद और आसमान में छिटके तारों को निहारते हौले- हौले चहलकदमी कर रहे होते। कानों में छायागीत के गूंजते गाने , गानों से पहले की कॉम्परिंग जैसे एक अलग ही दुनिया में ले जाती।
इस दौरान न किसी और का बोलना सुहाता , न ही पढ़ना। एक प्रेमी की तरह रेडियो साथ होता, जो तिलिस्म पैदा कर रहा होता।
आज भी विविध भारती के स्टूडियो में माइक्रोफोन के सामने कार्यक्रम पेश करने बैठती हूं तो जैसे अतीत हमें पुकार रहा हो।
शुक्रगुजार हूं उन तमाम श्रोताओं की, जो हमें इतना प्यार देते हैं। सिर आंखों पर बिठाते हैं। शुक्रिया विविध भारती का, जिसके स्टूडियो में बैठकर तमाम नामचीन फिल्मी हस्तियों से, तमाम साहित्यिक हस्तियों से, संगीत और कला के नामचीन सितारों से साक्षात्कार का मौका मिला। शुक्रिया तकनीक और तकनीकी विभाग की जिसके माध्यम से विविध भारती गूंजती है पूरी दुनिया में।
शुक्रिया उन माइक्रोफोन्स का जिनके ज़रिए अनगिनत चुनौती भरे कार्यक्रम कर सके।







