By – IPS Vinod Mishra
वर्ष 1975 में नई दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर, प्रद्युम्न कुमार महानंदिया, जिन्हें लोग प्यार से ‘पीके’ कहते थे, अपना जीवन यापन करने के लिए राहगीरों के चित्र बनाते थे। वह कोई साधारण कलाकार नहीं थे, बल्कि उनकी उंगलियों में एक जादू था और उनकी आँखों में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जो भारतीय समाज में उडीसा की एक पिछड़ी आदिवासी जनजाति से संबंध रखता था, फिर भी जीवन में पिछड़े रहने से इनकार करता था।

एक दिन वह प्रतिदिन की तरह किसी का चित्र बना रहे थे तभी उनके सामने सुनहरे बालों और नीली आँखों वाली एक विदेशी लड़की रुकी। वह चार्लोट वॉन शेडविन थीं, जो एक स्वीडन के एक कुलीन परिवार से थीं और भारत की आध्यात्मिक यात्रा पर आई हुईं थीं। उन्होंने एक ऐसे कलाकार के बारे में सुना था जो जीवित लोगों के चित्र बनाता था और इसलिए उन्होंने उनके सामने बैठने और अपना चित्र बनवाने का फैसला किया।









