राज्य स्थापना दिवस पर विशेष : उत्सव मनाने में सत्ता व्यवस्थित, “रजतोत्सव” पर विकास से संबंधित प्रश्न अनुत्तरित।
By – Prem Pancholi

यह साल राज्य का रजत वर्ष है। एक नवंबर से राज्यभर में लगातार अलग अलग सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थान “रजतोत्सव” मना रहे है, 9 नवंबर को प्रधानमंत्री श्री मोदी भी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून आए और सरकार की पीठ थपथपाकर चले गए यहां तक ठीक है। देखना यह होगा कि इस उत्सव में कौन कौन शामिल नहीं हो रहे है, जो हो रहे हैं उन्हें किस तरह की खुशी मिल रही है। दरअसल यह साल सच में उत्तराखंड राज्य के लिए उत्सव का साल तो है ही। चिंतनीय पहलू है कि स्थाई राजधानी, मूल निवास, भू कानून और रोजगार नीति पर 25 साल में कोई भी सरकार निर्णय नहीं ले पाई।
ज्ञात हो कि राज्य की प्रमुख मांग शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन की समस्या का समाधान थी। यानी अब इन तीनों के लिए राज्य में पुख्ता व्यवस्था करनी सरकारों की जिम्मेदारी थी। मगर इन्हीं विभागों के कर्मचारी सड़कों पर अधिक दिखाई देते है। नजारा यह है कि इन्हीं आंदोलनकारी कर्मचारियों के केंद्र या तो खाली है या खंडहर में तब्दील हो गए हैं। चूंकि 25 सालों में स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के कर्मचारी किसी न किसी मुद्दे पर आंदोलित ही है। यही बड़ा सवाल है कि हमने 25 सालों में इन महत्वपूर्ण विषय शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए कारगर कदम नहीं उठा पाए। हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य केंद्र हैं तो चिकित्सक नहीं और शिक्षक हैं तो छात्र नहीं, छात्र हैं तो शिक्षक नहीं जैसी स्थिति आज तक बनी हुई है। इधर आंकड़ों पर गौर फरमाए तो शिक्षको की संख्या लगभग हैं। मगर वे अपनी सुविधा अनुसार पसंदीदा स्कूलों में ही तैनात है। कुलमिलाकर हम अपने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को 25 सालों में पटरी पर नहीं ला पाए हैं।
इन पच्चीस सालों में एक ऐसा विभाग यानी उपनल नाम का अस्तित्व में आया जिसने राज्य के लोगों में दरार पैदा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उपनल में पंजीकृत बेरोजगार ही नौकरी पा सकते है और जो सैनिक परिवार से संबंध रखते हों उन्हें तो यह विभाग सरकार के किसी न किसी विभाग में नौकरी का इंतजाम कर ही देता है। प्रश्न यही है कि जब शिक्षित बेरोजगारों को पंजीकृत करने के लिए “सेवा योजना विभाग” सरकार के पास पहले से ही था तो उपनल की आवश्यकता क्यों महसूस की गई? उपनल के मार्फत सरकारी नौकरी पा चुके कई सैकड़ों युवाओं को कई बार बाहर का रास्ता दिखा दिया। कईयों को नौकरी से हटा दिया गया। इस तरह के भी अनियोजित और अनावश्यक कार्य पिछले 25 सालों में हमने पुष्ट किए है।
दिलचस्प यह है कि रजत जयंती वर्ष मानने तक पुलिस विभाग में चाहे भ्रष्टाचार की कई शिकायतें सामने आई हो, पर स्थानीयता के अनुसार ही इस विभाग में भर्तियां हुई है। 25 साल के सफर में हम दावा के साथ कह सकते हैं कि शिक्षा विभाग और पुलिस विभाग इस बात के लिए अपवाद है कि इन विभागों में राज्य के निवासियों को ही रोजगार मिला है। बाकी यदि अन्य विभागों में रोजगार प्राप्त कर रहे लोगो का आंकड़ा निकाला जाए तो सरकार के पास कोई जबाव नहीं है। इन्हीं अन्य विभागों ने भ्रष्टाचार को पनपाया है। हालात इस कदर है कि सरकार का दिल कहलाने वाला सचिवालय एवं विधानसभा जैसी जगह पर भ्रष्टाचार की इतनी बदबू आती है कि मास्क पहनकर भी खड़ा नहीं रहा जा सकता है। सचिवालय में भारत सरकार से तैनात कर्मियों को छोड़ दें तो यहां 90 प्रतिशत कर्मचारी बाहरी राज्यों से बताए जाते है। यही स्थिति विधानसभा की भी है।
इसके अलावा सरकार अलग अलग विभागों में विकास के लिए विभिन्न परियोजनाएं संचालित कर रही है जैसे आजीविका, जलजीवन मिशन, कैंपा आदि दर्जनों परियोजनाओं में 90 प्रतिशत से भी अधिक कर्मचारी राज्य से बाहर के तैनात है। उद्योग विभाग का तो ईश्वर ही भला कर सकता है। राज्य में संचालित विभिन्न उद्योगों में राज्य के निवासी एजेंसियों के मार्फत मजदूरी कर रहे है, जिन आंकड़ों को सरकार रोजगार बता रही है। जबकि इन उद्योगों में राज्य के लोगों को स्थाई रोजगार सिर्फ 10 प्रतिशत ही बताया जाता है और 90 प्रतिशत स्थाई रोजगार बाहरी राज्यों के लोगों को दिया जा रहा है। उद्योगों में रोजगार के आंकड़ों पर यदि विश्लेषण किया जाए तो विभिन्न उद्योगों में ऐसे स्थाई कर्मचारी, अधिकारी 10 प्रतिशत ही होते है जो स्थानांतरित होकर आते है, फिर भी यह आंकड़ा राज्य के निवासियों को निराश ही करता दिखाई दे रहा है।
यह जरूर हुआ कि 25 सालों में विधायकों का आंकड़ा देखा जाए तो इनकी संख्या भी 1750 (एक हजार सात सौ पच्चास) से कम नहीं है। इसी तरह एक दर्जन मुख्यमंत्री भी बने है जो इस आंकड़े को और अधिक बढ़ा देता है। अर्थात यहां पर इस संख्या से जुड़े परिवार जश्न का हिस्सा है जो विभिन्न मंचों पर दिखाई भी दे रहे है।
दूसरी तरफ इन 25 सालों के सफर में सरकार के विरोध में एक व्यवस्थित बेरोजगार आंदोलन का जन्म हुआ है। जो सरकारी भ्रष्ट नीतियों सहित नौकरियों में हो रही धांधली के लिए आंदोलित रहते है। हालांकि कुछ नाम मात्र के विषय पर बेरोजगार आंदोलन की मांगों को सरकार ने माना है। पर यह निर्णय भी किसी नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसे ही साबित हुई है।
गौरतलब यही है कि सरकारें अपनी पीठ थपथपाने में कमतर नहीं है। अब तक की सरकारों ने राज्यहित में कई नीतियां बनाई है। जिन नीतियों का असर 25 सालों में दिखाई नहीं दिया है। नकल विरोधी कानून को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी नीतियां जनविरोधी साबित हुई है। वनाधिकार कानून 2006 का सरकार अनुपालन नहीं कर पाई। बांधो के निर्माण के लिए कोई विशेष और स्पष्ट नीति सामने नहीं आई। ऐसी तमाम नीतियां सरकारों ने बनाई है जो या तो वजूद में नहीं आई या शासन में बैठे चाटुकार अधिकारियों को रास नहीं आई और समय पर क्रियान्वयन नहीं कर पाए। जैसे की पर्यटन के क्षेत्र में हो रहा है। राज्य में पर्यटन के लिए नीति और स्थानों का चयन तथा पर्यटन को कैसे बढ़ावा दिया जाए जैसी व्यवस्था के लिए ऐसी कंपनियों को कार्य सौंपा गया जिनके कर्मचारी यहां की भाषा तो दूर हिंदी भी अच्छी तरह से नहीं जानते। इसलिए 25 सालों में हम पर्यटन विकास के क्षेत्र में खास बढ़ोतरी नहीं कर पाए।
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य में जितनी भी विकासीय योजनाएं बन रही है या निर्माणाधीन है वे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए ही जानी जाती है। जिसका जीता जागत उदाहरण निर्माणाधीन ऑल वेदर रोड, निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाएं है। जिस पर मीडिया के लोग और सत्ता के नजदीकी लोग सवाल करते हैं कि जहां जहां इस तरह की योजनाएं बन रही है वहां वहां के लोग विरोध नहीं कर रहे है। इसका जबाव उन्हीं ग्रामीणों के अनुसार है कि जब उनके शिक्षित नौनिहालों को सरकार रोजगार नहीं दे पा रही है तो वे इन कंपनियों के मार्फत यदि स्थानीय स्तर पर अस्थाई रोजगार पा रहे है तो वे विरोध क्यों करें। अतः इस तरह की दरारें सरकार और जनता के बीच साफ साफ दिखाई दे रही है। इसी तरह का उदाहरण प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन का सामने आया है। प्रधानमंत्री मोदी का सपना है कि 2027 तक ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल सेवा आरंभ हो जाए। निर्माणाधीन इस रेल परियोजना से 30 ऐसे गांव है जिनके जलस्रोत सूख गए है। गांव के हर घर में दरारें आ गई है। इन गांवों के नीचे से रेल की टनल गुजर रही है जो अभी निर्माणाधीन है। अब ये गांव के लोग यदि विरोध करें तो उनके नौनिहाल जो निर्माणाधीन रेलवे लाइन में अस्थाई रोजगार पा चुके है को हटना पड़ेगा, चुप हैं तो उनके गांव खतरे के निशान पर आ गए है। पर्यावरण का कितना नुकसान हुआ उसके लिए उत्तराखंड खतरे से खाली नहीं है। ऐसे दर्जनों उदाहरण इस राज्य में पिछले 25 सालों से अखबारों की सुर्खियां बनी है।
कुलमिलाकर यही कहा जा सकता है कि कौन कौन इस राज्य में उत्सव मना रहे है और कौन कौन नहीं मना रहे है या सवाल खड़े कर रहे है? इसी पर सरकार को सोचना होगा। अर्थात जिस राज्य के 43 लोगो ने अपनी शहादत दी है और ऐसी कल्पना की हो कि अपने राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था हो, ऐसा पलायन न हो जिससे गांव बंजर हो जाए और रोजगार के लिए आंदोलन करना पड़े। यह सवाल राज्य के 25 वे साल भी खड़ा है जो “रजतोत्सव” पर सोचने के लिए बाध्य कर रहा है।







