Saturday, September 12, 2026
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बहनों के विछोह वेदना से साक्षात् करती आशा ममगाई की शोध पुस्तक।

बहनों के विछोह वेदना से साक्षात् करती आशा ममगाई की शोध पुस्तक।

 

By – Prem Pancholi

 

वैशिष्ट्य और काव्य दर्शन एक शोध ग्रन्थ है। मदन मोहन नाम के एक गढ़वाली कवि की कविताओं पर किए गए लघु शोध में शोधार्थी ने एक एक पंक्ति को चित्रित किया है। जैसे गढ़वाली में एक कहावत है कि “तेरू बल क्या नाल गांठियाउ?” अर्थात एक नाल यानी नाभि वाले कभी जुदा नहीं हो सकते। वे एक दूसरे को बिना बोले स्वस्फूर्त अहसास करते है। ऐसे ही एक नाभि में पैदा हुई अंजली और आशा दो बहने है। जब अंजली ने भरी जवानी में इस मायावी दुनियां को अलविदा कहा तो सच में ऐसे वक्त छोटी बहन आशा का क्या हाल हुआ होगा? यह बयां करना नामुमकिन है। फलत: यही कह सकते है कि जुदा होने की वेदना के परिणामस्वरूप आशा ममगाई द्वारा लिखित हमारे हाथों में यह पुस्तक है।

गढ़वाली भूमिका से आई और शहर में पली, बड़ी और पढ़ी डॉ० आशा ममगाई आज एक व्यवस्थित लेखिका है। उनका यह शोध दस्तावेज हमारे हाथों में एक पुस्तक के रूप में है। मगर जब हम इस ग्रन्थ के पीछे का इतिहास पढ़ते है तो प्रेम की “सच्ची डोरी” इन्हीं के हाथों बंधी है। दरअसल आशा ममगाई को इस लघु शोध के लिए हालांकि एसजीआरआर विश्वविद्यालय ने अवार्ड किया है मगर एक पंक्ति में कहूं तो एक बहन के लिए यह सच्ची श्रद्धांजलि है। आशा ममगाई की बड़ी बहन गढ़वाली फिल्म “तेरी सौं” के एक गीत “आंदी जांदी सांस छै तू” को हर पल गाती और सुनती रहती थी। ईश्वर को शायद यह नागवार गुजरा और आशा ममगाई की बड़ी बहन उनसे हमेशा हमेशा के लिए जुदा कर दी। यह शोक संतप्त समय कभी भी उक्त परिवार से बिसराय नहीं जा सकता था। अतएव आशा ममगाई का जीवन दीदी के जाने के बाद अवसाद ने घर कर दिया था। यह दौर आशा के जीवन के लिए घुन की तरह बनता जा रहा था। वे दोनों बहने बिछुड़ गई , पर आशा ने ठान ली कि वे निराशा को पुनार्शा में बदल सकती है। वैसे भी आशा की बड़ी बहन अंजली तो श्रृंगार की एक जीती जागती प्रतिमूर्ति थी। इसीलिए अंजली को श्रृंगार रस वाले साहित्य पसंद थे, जिनमें गढ़वाली फिल्म “तेरी सौं” का एक गीत वह समय मिलते जरूर गुनगुनाती थीं। इस गीत का मालूम जैसे आशा को हुआ कि यह गीत मदन मोहन नाम के एक गढ़वाली कवि ने लिखा, तो दीदी अंजली को श्रद्धांजलि बावत शोध योजना अपने उसी विश्वविद्यालय के साथ बना डाली जहां आशा भी अध्ययनरत थी। सो इस शोध के लिए कवि मदन मोहन की 119 कविताओं का चयन किया गया। जिसमें कवि की कविताओं के विशेष दर्शन पर शोध आरंभ हुआ और आज पुस्तक के रूप में पाठकों के बीच है।

आशा ममगाई ने अपनी इस शोध पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर लिखा है कि “तेरी य मुखड़ी मेरी जिकुड़ी क, तिखंड़ मा सदानि सदानि रैंण” अर्थात प्रिय दीदी तू कभी भी मेरे कलेजे से अलग नहीं हो सकती। कह सकते है कि प्रेम, मुहब्बत, या दीदार किसी को भी और कहीं भी हो सकता है। बता दूं कि मेरे सामने यह पहली पुस्तक आई है जो इन सभी आयामों को बखूबी दर्शाती है। इसी मुहब्बत की बानगी आशा ममगाई की यह पुस्तक है।

आशा के लिए 17 अप्रैल 2014 का वह दिन कभी न भूलने वाला है। जब ईश्वर ने आशा से अंजली बहन को जुदा कर दिया। दून अस्पताल में इन दोनों बहनों का साथ रहने वाल 17 अप्रैल का अंतिम दिन था। अंजली तो अलविदा कह गई, पर आशा उस “प्रेम वेदना” से टूट चुकी थी। आशा ने हालांकि तीन अलग अलग विषयों में मास्टर डिग्री हासिल की है। पर हर वक्त आशा को दीदी अंजली की सूरत सामने ही दिखाई देती थी। कोरोनाकाल में जब एक दिन आशा ने देखा कि गढ़वाली भाषा में शोध के लिए आवेदन मांगे गए है तो आशा ने अपनी दीदी द्वारा हर वक्त गुनगुनाया जाने वाले गीत को आधार बनाया और लिख डाली यह पुस्तक।

“वा नौनी जब बच्यांद, छुयों का छोया फ़ुटदन” अर्थात इस पंक्ति में कवि सुंदरता की पराकाष्ठा को रेखांकित करने की कोशिश कर रहा है। लेखिका ने इन्हीं पंक्तियों पर वर्णन करते हुए लिखा है कि कवि जिंदादिली है इसलिए उनके सामने सुंदर आकृति, सुंदर युवती अथवा उन्हें यौवनता का भान होता है जिन्हें वे शब्दों में पिरोकर कविता में चरित्रित कर देते है। हालांकि लेखिका ने कवि की चिंता पर कम और कविताओं की आवश्यकताओं पर अधिक जोर दिया है। जैसे “जंदरी सि रिटणी रैंदी, नाज जन पीसेणी रैंदी” यह पंक्ति पहाड़ की महिला की दिनचर्या और उसके संघर्ष को बताती है। दूसरी तरफ यही पंक्ति सौंदर्य बोध भी कराती है, पर लेखिका ने इन पंक्तियों में रस और भाव जरूर बताए है, अपितु कवि के व्यक्तिगत आशय को छोड़कर सामाजिक संरचनाओं पर अधिक ध्यान दिया है। इससे आगे शोधार्थी लेखिका ने कवि के भाव और रस को पहले तीन भागों में बांटा है। भावपक्ष, विभावपक्ष और अनुभाव। इन्हीं से आगे चलकर स्थाई भाव, संचारी भाव, आलंबन, उद्दीपन, आश्रम के अलावा आंतरिक चेष्टाएं, वाह्य परिस्थितियां के बाद कायिक, मानसिक, वाचिक, आहार्य जैसी अलग अलग शाखाओं में कवि के श्रृंगार रस की कविताओं को विभक्त किया है। इसलिए लेखिका स्पष्ट करती है कि कवि के लेखन में समसामयिकी आंदोलन है मगर श्रृंगार के शब्दों में पक्की पकड़ है। फलत: लेखिका रेखांकित कर रही है कि कवि के लेखन में सुख और दुख तनिक है, पर कविता की हर पंक्ति दीदार का भावार्थ बताती ही है। इससे भी आगे कवि ने सिर्फ मुहब्बत पर ही लिखा है। जिसमें गरीबी अमीरी के लिए लेखिका को उनकी कविताओं में कोई स्थान नहीं दिखाई दिया।शोध में सम्मिलित सभी कविताओं का आशय प्रेम में बिछुड़ना और बिछुड़ने की वेदना सर्वाधिक सामने आती है। ऐसा लगता है कि कवि अति साधन संपन्न व्यक्ति है। अतः उन्हें समाज में गरीबी, अमीरी और असमानता दिखाई नहीं देती फकत उन्हें श्रृंगार और यौवनता दिखाई है, जिसके साथ साथ मर्म का अहसास जरूर होता है। यही वजह है कि लेखिका ने कवि के कवित्व में मर्म, प्रेम और विछोह की वेदना को स्पष्ट पाया है जो उसके व्यक्तिगत जीवन में उनके बहन के जाने के बाद अवसाद बन गया था। सो लेखिका ने इस वेदना को सकारात्मकता की ओर आगे बढ़ाया और शोध ग्रन्थ लिख डाला। जो भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को कम तो नहीं कर सकता, पर इस पीड़ा के बन बनस्पत सांत्वना के कार्य कर सकता है। लेखिका ने स्पष्ट किया है कि कवि या लेखक जीवन के हर पल को काल्पनिक रूप से नहीं लिखते। लेखन की हर विधा घटित घटनाओं का बिंब है, ऊर्जा है और संबल है। जो उन्हें अपनी दीदी अंजली की स्मृति में इस शोध कार्य को करने में सामने दिखाई दिया है।

कुलमिलाकर शोधार्थी लेखिका ने जिस तरह से गढ़वाली कविताओं की एक एक पंक्तियों का अर्थ बताया वह कबीले तारीफ है। जैसे “विंका ज्वागम कतना खैरी चा, सर्या दुन्या विंकी वैरी चा, कनकै जाण वील अब पल्या छाला, मुंड मा भारू अर गाड़ गैरी चा” अर्थात लेखिका बता रही है कि कवि की यह पंक्ति पाठकों को पहाड़ की कंदराओं का अहसास करवा रहे है। यानी बीच में जो छोटी नदी है उस पर पुल नहीं है, उस महिला के सिर पर भारी बोझ है फिर भी उसे वह नदी पार करके घर पहुंचना है। कुछ लोग कहते है कि जब पानी का उफान कम हो जाता तब पार करती? अर्थात इस पंक्ति में पहाड़ की युवती की एक पीड़ा अवश्य दिखती है, पर परिस्थिति नहीं दिखती।

134 पृष्ठों वाली यह पुस्तक शुद्ध रूप से गढ़वाली भाषा में लिखी गई है। इस पुस्तक में चार पेज पर कवि से लिया गया साक्षात्कार है। इस शोध के लिए कवि मदन मोहन की 119 कविताओं को लिया गया है। जबकि 28 पृष्ठ सिर्फ कवि के रचना संसार पर बात की गई है। लेखिका ने आभार हेतु पांच पृष्ठ लिख डाले। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण लेखिका द्वारा “अपनी बात” वाले पृष्ठ है। जहां आशा ने अपनी बड़ी बहन अंजली के साथ बिताए पल को बहुत ही मार्मिकता से शब्दों में गूंथे है। इन्हें पढ़ने पर हर पाठक के आंखे नम हो जाएगी। दूसरी ओर इस शोध पुस्तक में गढ़वाली कवि गिरीश सुंदरियाल, हरीश जुयाल, जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी, डॉ० प्रीतम अपछ्याण की कविताओं का भी संदर्भ लिया गया है। क्योंकि शोध परियोजना के मुख्य में रहे कवि ने इन अन्य कवियों के काव्य संकलनो की भूमिका लिखी थी।
…………………………………..
पुस्तक : मदन मोहन दुकलान कु काव्य वैशिष्ट्य अर दर्शन।
लेखिका – आशा ममगाई।
समीक्षक : प्रेम पंचोली।
प्रकाशक : हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट।
मूल्य : 250रु०।

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