Thursday, May 14, 2026
Home crime कोटद्वार घटना : विश्वगुरु बनने के रास्ते एक और रोड़ा।

कोटद्वार घटना : विश्वगुरु बनने के रास्ते एक और रोड़ा।

By – Prem Pancholi

 

कोटद्वार की घटना पर देश के भीतर ही कई सवाल खड़े हो गए है। जिस तरह से एक संगठन ने सिर्फ नाम वाले शब्द पर आपत्ति जताई है वह किसी भी सूरत में संविधान सम्मत नहीं कहा जा रहा है। अर्थात जब हम एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं तो हमें अपने संविधान के अनुसार “कानूनी कार्रवाई” की तरफ आगे बढ़ना था, न कि “हिंसा” की तरफ। जैसा कि सोशल मीडिया में वायरल हो रही वीडियो से मालूम हो रहा है।

अलबत्ता सवाल आज भी वहीं का वहीं है कि “बाबा” शब्द से कुछ संगठनों या संगठन के कार्यकर्ताओं को समस्या हो रही है। इसी समस्या के समाधान के लिए अपने देश में दुनियां का सबसे अच्छा और बड़ा संविधान है। यह हमे अधिकार देता है कि “गलत” पर कानूनी कार्रवाई होगी। जिसके लिए बकायदा पुलिस सहित अन्य सुरक्षा एजेंसियां है, न्यायालय है और बहुत कुछ। पर हिंसा के लिए दुनियां के किसी भी संविधान में जगह नहीं है।

माना कि “बाबा” शब्द पर आपत्ति है तो अवैध धंधों को अंजाम देने वाले कई जगह “बाबा” शब्द का इस्तेमाल कर रहे है। समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार और अमानवीय व्यवहार पर इस तरह के संगठन चुप्पी साध लेते है। यह इसलिए कहा जा रहा है कि कोटद्वार के पास के ही “अंकिता भंडारी” मामले में इस तरह के संगठन सामने नहीं आए है। तो अचानक “बाबा” के नाम से कपड़ों की दुकान चलाने वाले के विपरीत एक संगठन सामने आ रहा है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। वैसे भी नाम पर आपत्ति क्यों? जबकि नाम वाले शब्द अब वैश्विक हो गए हैं।

मौजूदा जनरेशन के नाम से आप यह भी मालूम नहीं कर सकते कि यह किस समुदाय का है। जब हम ऐसा देखते हैं तो सच में भारत एक गुलदस्ता के रूप में नजर आता है। मगर जब कोटद्वार और इसी तरह की अन्य घटनाओ को देखते है तो ऐसा लगता है कि हम प्रगति नहीं बल्कि स्वयं दुर्गति की ओर लौट रहे हैं।

यहां यदि मैं धार्मिकता पर बात करूंगा तो क्या पता मै भी ऐसे दलों के निशाने पर आ जाऊ। मगर हम भारत और भारतीयता की बात कर ही सकते है। पहले हम भारत के उत्तराखंड की बात करेंगे तो इस प्रदेश को देव भूमि के नाम से भी जानते है। देवभूमि, देवताओं का स्थान, जहां हिंसा और भेद – वाद को कोई जगह नहीं है। सेवा, समर्पण, पूजा और कर्म को यहां स्थान दिया गया है। बद्रीनाथ से लेकर पिरान कलियर तक कभी भी धार्मिक उन्माद की कोई घटना सामने नहीं आई है।

अतएव 33कोटि देवी देवताओं ने भी शायद हिंसा को कोई जगह नहीं दी है। ईश्वर, अल्लाह, ईशु मसीह, वाहेगुरु आदि सभी के दरबार में जब कोई भी इंसान नाम का खड़ा होगा या जाएगा तो वह शांतिपूर्वक ही वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएगा। दरअसल ऐसे दरबारो में शांति शांति ही नजर आती है।

प्रश्न बार बार खड़ा हो रहा है कि कोटद्वार और पुलवामा में जो हिंसा सामने आई है वह धर्म के नाम पर ही हुई है। जो विश्वगुरु बनते भारत के रास्ते में बहुत बड़ा अवरूद्ध बनता नजर आ रहा है। जबकि हमारे धर्मग्रंथ हिंसा को जगह नहीं देते है। यहां तक कि अपने सामने वाले के अनादर करने की इजाजत भी नहीं देते है। इस बात को हम धर्म गुरुओं के प्रवचनों में सुन सकते है। गीता, कुरान से लेकर बाइबिल और गुरु ग्रन्थ आदि अन्य ग्रन्थ न तो किसी नाम पर आपत्ति करते है न ही किसी “वाद” पर बोलते है। तात्पर्य यही है कि “वाद प्रतिवाद” की किसी भी धार्मिक ग्रन्थ व संविधान में जगह ही नहीं है।

प्रश्न फिर वहीं खड़ा है? की धर्म के नाम पर हिंसा वाली प्रवृति दिन प्रतिदिन कहां से उत्पन्न हो रही है। इसलिए बात अब वर्तमान पर ही की जा सकती है। क्या हम अपने संविधान के अनुरूप अपने कार्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर पा रहे है, या जिम्मेदारियों के निर्वाह में कोई नकारात्मकता सामने आ रही है? दरअसल सवाल यहीं पर स्पष्ट हो रहा है कि जिनके पास समाज को खुशहाल बनाने की जिम्मेदारी आ रही है वे नकारात्मकता की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। जो बढ़ते भारत के रास्ते में एक बड़ा संकट खड़ा करने के रूप में भी सामने आ रहा है।

एक बार हम फिर पीछे मुड़कर देखें तो धार्मिक ग्रन्थ हमे इंसानियत ही सीखाते है। इसी तरह लोकतांत्रिक देश का संविधान भी हमे इंसानियत ही सीखाता है। जैसे कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में हर नागरिक के बराबर अधिकार बताए गए है। नाम, धर्म या पहचान के आधार पर कोई छोटा–बड़ा नहीं बताया गया है। इसी तरह अनुच्छेद 19 भी हर इंसान को अपनी बात, अपना नाम और अपनी पहचान खुलकर कहने का अधिकार देता है। जबकि अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने और रोज़गार करने का अधिकार देता है। यहां भी “इंसानियत” सर्वोपरि है। तो ये नफरत और नकारात्मकता कौन उत्पन्न कर रहा है। यही अहम सवाल है जिसका उत्तर हमें ही ढूंढना होगा। हमे एक बार अपनी शिक्षा व्यवस्था पर वापस ध्यान देना होगा कि हम अपनी भविष्य की पीढ़ी को क्या परोस रहे हैं। यह जिम्मेदारी देश के उन सभी जनप्रतिनिधियों की है जो संविधान के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी लेते है।

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