यह हर कोई देख रहा है कि पिछले दो वर्षों से कोई पुलिस पेट्रोलिंग नहीं दिखाई दे रही है। इधर पुलिस की “चेन ऑफ कमांड” भ्रष्टाचार के कारण ध्वस्त दिख रही है। शिकायतो पर जनता की फीडबैक खत्म दिखाई दे रही है। जनता और पुलिस के मध्य का समन्वय टूट चुका है। तो यही कहा जाएगा कि इस कारण भी राजधानी देहरादून और अन्य जगह हिस्ट्रीशीटर, गैंगस्टर आदि बदमाशों के लिए यहां ऐशगाह का अड्डा बना हुआ है। जब परिस्थितियां ही ऐसी है तो ऐसे बदमाश यहां की जगह क्यों छोड़ेंगे? यहीं गुंडागर्दी फैलाएंगे। शांत वादियों को अशांत करेंगे।
उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून से लेकर कुमाऊं द्वार हल्द्वानी तक पिछले 14 दिनों के भीतर कई जघन्य अपराध और हत्याकांड की खबरें सामने आ रही है। जो राज्य शांति और सुकून के लिए जाना जाता है वहां अब सामान्य नागरिक डरा और सहमा सा दिखाई दे रहा है।
दरअसल यह घटना कोई कमतर नहीं है। यह घटनाएं राज्य की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर रही है। अर्थात ऐसे बदमाशों को कौन यहां “सह” दे रहा है? यथा एक मां ने बेटे को मरवाने के लिए सुपारी दी। झारखंड का बदमाश देहरादून में मारा जाता है। हल्द्वानी में दो प्रेमी जोड़ो को पत्थर से मौत के घाट उतार जाता है। यह दिल दहला देनी वाली घटना जितना फजीहत राज्य सरकार की कर रही है उससे अधिक राज्य की पुलिस की ओर संकेत कर रही है कि पुलिस की परफॉर्मेस कहां पर है। जबकि यह भी प्रश्न उठ रहा है कि जो ये बदमाश देहरादून आदि जगहों पर डेरा डाले हुए है उन्हें प्रवास कैसे मिल जाता है? क्या उन मकान मालिक की तरफ से किराया बाबत पुलिस वेरिबिकेशन नहीं होता है। अथवा यदि बदमाश यहां मकान या अपार्टमेंट खरीदकर भी रहा है तो रजिस्ट्री करते वक्त जमानती व्यक्ति ही बदमाश का नजदीकी है। यानी बदमाशों को जानने वाला सख्श पहले से ही यथा स्थान मौजूद है। पुलिस को चाहिए कि वे इस तरफ भी अपनी कार्रवाई तेज करें।
ज्ञात हो कि इस तरह की वारदाते कभी बीते जमाने में पश्चिम यूपी की तरफ से आती थी। जहां देशभर के बदमाश जड़े जमाए रखते थे। अब पिछले कुछ समय से देहरादून और हल्द्वानी आदि जगहों से गुंडों और बदमाशों द्वारा घटित वारदाते सबसे अधिक सामने आ रही है। माना कि एक महिला ने अपने बेटे को मरवाने बाबत सुपारी दी है। वह भी अपने चालक के मार्फत। इससे स्पष्ट हो रहा है कि उक्त परिवार का चालक गुंडों का एजेंट है और सुपारी लेने वाले गुंडों का अड्डा देहरादून में है। जो भविष्य में और भी वारदाते कर सकते है। समझना यही है कि जब इन गुंडों पर पुलिस कार्रवाई हो रही थी तो इन्होंने पुलिस पर पलटकर वार हमला किया है। अर्थात यह गुंडे देहरादून में ही फल फूल रहे है। और अपने को देहरादून में ही सुरक्षित रखे हुए है। ताज्जुब तब होती है जब इतने बड़े बदमाश देहरादून की पुलिस की नजर में नहीं आते है। इसीलिए बार बार सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा हो रहा है।
ताज्जुब हो कि झारखंड का बदमाश भी देहरादून में शरण लिए हुए था। ऐसे में अंदेशा हो रहा है कि क्या ऐसे बदमाश और भी होंगे जो देहरादून में ही छुपे होंगे? इस तरह का संशय लोगो के मन में बार बार कौंध रहा है। जिसका जबाव पुलिस के पास ही हो सकता है। पर संशय बरकरार है कि क्या सरकार और पुलिस के मध्य समन्वय की कमी है। क्या पुलिस किसी राजनीतिक दबाव में काम कर रही है। क्या बदमाश सत्ता के नजदीक है। इन तमाम सवालों के ज़बाब बदमाशों पर की जाने वाली कठोर कार्रवाई ही दे सकती है।







