Sunday, June 28, 2026
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उपन्यास फांस : इक्कीसवीं सदी के किसानों के संकट को रेखांकित करता।

By – Mohan chauhan

संजीव का उपन्यास ‘फांस’ इक्कीसवीं सदी के भारतीय किसान के अस्तित्व पर मंडराते संकट का एक ऐसा दस्तावेज है जो राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पतन की गहरे से पड़ताल करता है। यदि इसके आर्थिक पक्ष की गहराई को देखें, तो यह उपन्यास केवल कर्ज की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक पूंजीवादी षड्यंत्र का खुलासा करता है जिसने खेती को एक ‘कॉर्पोरेट खेल’ बना दिया है।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि हमारे देश के किसानों की उस दर्दनाक सच्चाई का आईना है जिसे हम अक्सर अखबारों की छोटी खबरों में पढ़कर भूल जाते हैं। यह उपन्यास महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है, जहाँ कपास की खेती करने वाले किसान भारी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। लेखक संजीव ने दिखाया है कि खेती अब केवल पसीना बहाने का काम नहीं रह गई है, बल्कि यह एक खतरनाक जुआ बन गई है। किसान जब बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने के लिए बाजार जाता है, तो उसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महंगे उत्पादों पर निर्भर होना पड़ता है। इसके लिए वह बैंक या साहूकार से कर्ज लेता है। अगर फसल अच्छी हुई तो ठीक, वरना ब्याज का पहाड़ खड़ा हो जाता है। उपन्यास यह कड़वा सच उजागर करता है कि किसान जितनी मेहनत करता है, वह उतना ही कर्ज के दलदल में धंसता चला जाता है। यहाँ ‘फांस’ सिर्फ रस्सी का फंदा नहीं है, बल्कि वह ‘कर्ज’ है जो किसान के गले को धीरे-धीरे घोंटता है।

यह उपन्यास व्यवस्था पर करारा प्रहार करता है। संजीव दिखाते हैं कि सरकारें आती-जाती हैं, नीतियां बनती हैं और फाइलों में अरबों रुपये के राहत पैकेज भी घोषित होते हैं, लेकिन हकीकत में किसान तक सिर्फ आश्वासन पहुँचता है। नेताओं के लिए किसान का मुद्दा केवल चुनाव जीतने का जरिया है। इसमें व्यवस्था के उस न नंगे सत्य को भी उजागर किया है जिसमें जब कोई किसान मरता है, तो सरकारी अमला उसकी मदद करने के बजाय यह साबित करने में लग जाता है कि उसने खेती की वजह से नहीं, बल्कि किसी निजी कारण से जान दी है, ताकि मुआवजा न देना पड़े। यह संवेदनहीनता उपन्यास के हर पन्ने पर महसूस की जा सकती है।

यह उपन्यास उस सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य की राजनीति की पोल खोलता है जो कागजों पर तो किसान हितैषी दिखती है, लेकिन हकीकत में बिचौलियों और बड़े व्यापारियों की जेबें भरती है। फसल के दाम तय करने की शक्ति जब किसान के हाथ से निकलकर ग्लोबल मार्केट की सट्टेबाजी में चली जाती है, तो वह केवल एक उत्पादक नहीं बल्कि अपनी ही जमीन पर एक बेबस मजदूर बनकर रह जाता है।

इस उपन्यास में ग्रामीण भारत के उस बदलते चरित्र का चित्रण है जहाँ सामूहिकता का स्थान व्यक्तिवाद और ईर्ष्या ने ले लिया है। संजीव ने जातिगत समीकरणों के उस सूक्ष्म प्रभाव को भी पकड़ा है जो संकट के समय किसान की एकजुटता को बाधित करते हैं। उपन्यास में ग्रामीण परिवेश की वह क्रूरता भी दिखाई गई है जहाँ एक किसान की मौत केवल एक न्यूज हेडलाइन या मुआवजे की फाइल बनकर रह जाती है। इसमें महिलाओं के संघर्ष को भी एक नई ऊंचाई दी है। जब घर का मुखिया ‘फांस’ लगाकर अपनी जान दे देता है, तो पीछे छूटी स्त्रियों का संघर्ष केवल पेट भरने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन्हें उस पुरुष-प्रधान समाज में अपना असतित्व बचाने और कर्जदारों के अपमान से भी लड़ना पड़ता है। यह उपन्यास दिखाता है कि कैसे एक किसान की विधवा ‘मजदूर’ बनने की प्रक्रिया में अपनी गरिमा और पहचान को बचाने की जद्दोजहद करती है।

सांस्कृतिक रूप से यह उपन्यास अत्यंत विचलित करने वाले प्रश्न खड़े करता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे किसान अध्यात्म के उस विकृत रूप की ओर मुड़ता है जो उसे मुक्ति के बजाय मोहभंग की ओर ले जाता है। उपन्यास में वर्णित अध्यात्म थेरेपी और बाबाओं का प्रभाव उस वैचारिक खोखलेपन का प्रतीक है जो हताश मनुष्य को तर्क से दूर ले जाकर भाग्यवादिता के अंधेरे में धकेल देता है। उपन्यास में यह भी बखूबी चित्रित किया गया है कि कैसे आधुनिकता की दौड़ में ग्रामीण लोक-संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान पीछे छूट रहा है और उसकी जगह एक ऐसी हाइब्रिड संस्कृति ले रही है जिसमें न तो शहर की सुविधाएं हैं और न ही गाँव का सुकून।

उपन्यास में ‘मेंडालेखा’ गाँव का जिक्र एक उम्मीद की किरण की तरह आता है। गढ़चिरौली के इस गाँव ने “दिल्ली में हमारी सरकार, हमारे गाँव में हम सरकार” का नारा बुलंद कर यह सिद्ध किया कि यदि ग्रामीण समाज संगठित हो जाए, तो वह बाजार और सरकार के शोषण से बच सकता है। यहाँ की ‘कोया’ व्यवस्था सामूहिक निर्णय और संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार की बात करती है। संजीव ने दिखाया है कि जहाँ विदर्भ के किसान अकेलेपन और कर्ज के बोझ तले दबकर ‘फांस’ लगा रहे हैं, वहीं मेंडालेखा के लोग बाँस और वनोपज पर अपना नियंत्रण रखकर आर्थिक रूप से स्वावलंबी बने हुए हैं। यह व्यवस्था निजी स्वार्थ के बजाय ‘सामूहिकता’ पर टिकी है, जो किसानों के लिए एक रक्षा कवच का काम करती है।

‘संजीव ने बहुत ही सरल लेकिन मर्मस्पर्शी शब्दों में यह संदेश दिया है कि किसान का संकट केवल खेती का संकट नहीं, बल्कि हमारी पूरी संस्कृति और मानवता का संकट है। यह उपन्यास हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में विकास कर रहे हैं, अगर हमारे समाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ही ‘फांस’ पर झूलने को मजबूर है।

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