अप्रैल 2026 से लागू हो गए नए ठोस कचरा प्रबंधन नियम – श्री आर्य
By – Prem Pancholi
शहरों के बढ़ते आकर को लेकर सरकार और समाज दोनों चिंतित रहते है। इस अंतराल में शहरों में सबसे अधिक समस्या कचरा निपटान की बढ़ती है। खबर है कि अब अप्रैल से सरकार और समाज समन्वय बनाकर कचरा निवारण के लिए संयुक्त प्रयास करेंगे।
दिलचस्प यही है कि आज शहरीकरण बहुत तीव्र गति से बढ़ रहा है, बाजार फैल रहे हैं, उपभोग की प्रवृत्ति चरम पर है और आधुनिक जीवन की सुविधाएँ हर घर की चौखट तक पहुँच रही हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी समस्या भी उभरकर सामने आती रही है, जिसे लंबे समय तक अनदेखा किया जा रहा था। दरअसल शहरों में बढ़ता ठोस कचरा हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है, जिसकी जिम्मेदारी हर नागरिक सीधे नगर निकायों पर ही छोड़ देते हैं।
अब इसकी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने Solid Waste Management Rules 2026 जो अप्रैल 2026 से पूरे देश में लागू हो गया है।
सहायक निदेशक उत्तराखंड शहरी विकास विभाग विनोद आर्य ने बताया कि WMR 2026 के नियमों के तहत सरकार नागरिकों की भूमिका एवं जिम्मेदारियों को और मजबूत करना चाहती है। उन्होंने बताया कि कचरा प्रबंधन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक हर व्यक्ति इसकी जिम्मेदारी न ले। कहा कि इन नियमों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रत्येक नागरिक के लिए अपने घर, कार्यालय या दुकान में उत्पन्न होने वाले कचरे को चार श्रेणियों में बांटकर (Segregation) अनिवार्य कर दिया गया है। यह बंटवारा यानी Segregation केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक व्यवस्था है, जिसके माध्यम से कचरे को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन में बदल सकते हैं।
उन्होंने बताया कि आज हम जिस कचरे को कूड़े की तरह देखते हैं, वही सही ढंग से अलग अलग भागों में बांटा जाय। जिससे एक तरफ तो कम्पोस्ट और खाद बनेगी और दूसरी तरफ अमुक नागरिक इस रिसाइकिल उत्पाद को रोजगार की दृष्टि से देखेगा। श्री आर्य ने बताया कि समस्या तब उत्पन्न होती है जब गीला, सूखा, हानिकारक और अवशिष्ट कचरा एक साथ मिल जाता है और पूरा कचरा एक हानिकारक मिश्रण में बदल जाता है। उन्होंने बताया कि नए नियमों के अनुसार पहली श्रेणी में गीला, सूखा और कुछ प्लास्टिक रैपर या जैविक कचरा आता है, जिसे आमतौर पर हम रोज रसोई में पैदा करते हैं। इसमें सब्जियों और फलों के छिलके, बचा हुआ भोजन, चाय- कॉफी का अवशेष, बगीचे की पत्तियाँ शामिल होती हैं। यह कचरा धरती में वापस लौट सकता है और इसे कंपोस्ट में बदलकर हम मिट्टी की उर्वरता बढ़ा सकते हैं। दूसरी श्रेणी रिसायकल योग्य कचरे की है, जिसमें कागज, प्लास्टिक, काँच, धातु, गत्ता, पुराने कपड़े और पैकेजिंग सामग्री शामिल हैं। यदि यह कचरा साफ और अलग-अलग कर दिया जाए, तो यह रिसायकल उद्योग के लिए बहुमूल्य संसाधन बन सकता है। तीसरी श्रेणी स्वास्थ्यकर अपशिष्ट जैसे घरेलू हानिकारक कचरे की है, जिसमें इस्तेमाल किए गए डायपर, सैनिटरी पैड- नैपकिन आदि यह व्यक्तिगत स्वच्छता से संबंधित कचरा है जिसे संक्रमण रोकने के लिए अलग से लपेट कर देना अनिवार्य है। चौथी श्रेणी विशेष देखभाल अपशिष्ट कचरे की है, बैटरी, बल्ब, ट्यूबलाइट, दवाइयाँ, रसायन वाले डिब्बे या पेंट के अवशेष शामिल हैं अगर यह कचरा सामान्य कचरे में मिल जाए तो इससे गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा होते है एवं पर्यावरण को क्षति होती है।
श्री आर्य ने यह भी जानकारी दी है कि इस नए नियम में एक विशेष प्राविधान यह भी है कि थोक अपशिष्ट जैसे 5,000 वर्ग मीटर से अधिक वाले होटल, आवासीय सोसायटियों और संस्थानों को अपने परिसर के भीतर ही गीले कचरे को कम्पोस्ट या बायो-मीथेनेशन के माध्यम से संसाधित करना अनिवार्य है। गीले और सूखे कचरे के मिश्रण के बाद न तो रिसायकल संभव रह जाता है और न ही कम्पोस्टिंग। ऐसे मिश्रित कचरे से मीथेन जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं, जो आग लगने और हवा के प्रदूषण की प्रमुख वजह हैं। डंपिंग ग्राउंडों के आसपास रहने वाले लोगों में सांस की बीमारियाँ, त्वचा रोग और संक्रमण की सम्भावना रहती हैं। यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा भी है, क्योंकि अक्सर सबसे गरीब समुदाय ही इन डंपिंग साइटों के पास रहने को मजबूर होते हैं।सहायक निदेशक शहरी श्री आर्य ने बताया कि नए नियमों के तहत नागरिकों को चार डिब्बों का उपयोग अनिवार्य बताया गया है और इसके साथ ही नगर निकायों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनका कचरा संग्रहण तंत्र इस विभाजन के अनुरूप काम करे। इसके लिए अलग-अलग गाड़ियों, कचरा केंद्रों और प्रोसेसिंग प्लांटों की व्यवस्था की जा रही है।
दरअसल सच यह है कि किसी भी व्यवस्था की सफलता बाबत नागरिकों के व्यवहार की आवश्यकता होती ही है। माना यदि हम घरों में कचरा अलग नहीं करेंगे, तो न कोई मशीन इसे साफ कर पाएगी और न कोई नगर निगम इसे ठीक से संभाल पाएगा। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं है। यह सामाजिक संस्कृति का निर्माण भी है। जैसे सीट बेल्ट लगाने, हेलमेट पहनने या धूम्रपान निषेध जैसे व्यवहारिक बदलावों को समय के साथ सीखा एवं जीवन मे अपनाया गया, उसी तरह कचरा अलग करना भी एक आदत बन सकती है।
अच्छा तो यही है कि जब हम शहरी परिवार ऐसा करना शुरू करेंगे, तो आने वाली पीढ़ी भी इस कार्य में आदतन हो जाएगी। उन्होंने अपेक्षा की है कि एक सोसाइटी इसे लागू करती है, तो पूरे समुदाय में अनुशासन विकसित होता है। यदि पूरा शहर यह नियम अपनाता है, तब वास्तव में वह शहर “स्मार्ट सिटी” बनेगा। अक्सर यह शिकायत लगातार आती हैं कि नगर निगम समय पर कचरा नहीं उठाता, पर यह भी उतना ही सच है कि हम भी कचरा ऐसे रूप में देते हैं जिसे साफ करना किसी भी सफाई कर्मचारी के लिए बेहद कठिन और कभी-कभी अमानवीय भी होता है। गीले और सूखे कचरे के मिश्रण से पूरा कचरा सड़ जाता है, बदबू फैलाता है, और सफाईकर्मियों को हाथों से उसे अलग करना पड़ता है। यह उनके स्वास्थ्य और गरिमा दोनों के खिलाफ है। उनका मानना है कि यदि हम स्रोत पर कचरा अलग करें, तो हम न केवल शहर की सफाई बेहतर बनाते हैं, बल्कि उन लाखों सफाई कर्मियों के जीवन को भी सहज और सुरक्षित बनाते हैं जो हमारे लिए रोजाना यह कठिन काम करते हैं। इनमें नागरिकों को प्रोत्साहित करने की योजनाएँ भी शामिल हैं। कई नगर निकाय अब इस नए नियम के तहत कचरा देने वाले लोगों को डिजिटल रिवॉर्ड पॉइंट्स देंगे, जिन्हें नगर निकायों के टैक्स एवं अन्य बिलों पर लाभ के रूप में उपयोग किया जा सकेगा। इसके अलावा, जो परिवार या सोसाइटी अपने स्तर पर कम्पोस्ट बनाएंगे, उन्हें प्रमाणपत्र, सम्मान और प्रोत्साहन राशि भी दी जा सकती है। कई शहरों में सूखे कचरे को बेचकर आय अर्जित करने की प्रणाली भी लागू हो रही है, जिससे नागरिक न केवल स्वच्छता में योगदान देंगे, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभ उठा सकेंगे।
कचरे का पृथकीकरण यदि नागरिकों द्वारा पूर्णरूप से किया जाता है, तो इसके दूरगामी लाभ हम सभी के सामने होंगे। अतः डंपिंग ग्राउंडों की जरूरत आधी हो सकती है, शहरों में बदबू और मच्छरों की समस्या घट सकती है, बीमारियाँ कम हो सकती हैं, और रिसायकल उद्योग को नया जीवन मिल सकता है।
अब्बल तो यह होगा कि पर्यावरण की रक्षा होने के साथ-साथ लाखों नए रोजगार भी पैदा होंगे। हरित अर्थव्यवस्था भविष्य का सबसे बड़ा अवसर है, और कचरा प्रबंधन उसमें एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है। हमें गंभीरता से सोचना चाहिए कि हम अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा शहर, वातावरण एवं पर्यावरण छोड़ना चाहते हैं। क्या हम उन्हें कचरे के पहाड़, प्रदूषित हवा, जहरीला पानी और बीमारियों से भरी बस्तियाँ देना चाहते हैं? या ऐसा शहर जहाँ स्वच्छता केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि हर घर की आदत हो? जहाँ के बच्चे कचरा अलग करना उतने ही सहज तरीके से सीखें, जितनी सहजता से वे पढ़ना- लिखना सीखते हैं? बदलाव कठिन नहीं है, कठिन सिर्फ शुरुआत है। एक बार चार डिब्बों की आदत पड़ जाए, तो यह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएगी।
उल्लेखनीय हो कि शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता बनी रहे इसके लिए 2026 का नया नियम केवल नियमों का सेट नहीं है, बल्कि भारत के नागरिकों के लिए एक बड़े परिवर्तन का अवसर है। एक अप्रैल से न केवल कचरा प्रबंधन बदलेगा, बल्कि हमारी नागरिक चेतना का एक नया अध्याय भी शुरू हो गया है। यह नियम हमें याद दिलाते हैं कि स्वच्छ भारत नागरिक बनाते हैं। हमें अपने कचरे की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी, क्योंकि स्वच्छता केवल एक सेवा नहीं, बल्कि एक संस्कार है। यदि प्रत्येक नागरिक यह संकल्प ले कि वह कचरा चार श्रेणियों में अलग करेगा, तो एक सप्ताह में आदत बनेगी, एक महीने में गली बदलेगी, एक वर्ष में शहर बदल जाएगा।







