Saturday, March 7, 2026
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बहुआयामी हिमालयी व्यक्तित्व- प्रो. चित्तरंजन दास

उड़ीसा साहित्य अकादमी, भुवनेश्वर
एवम्।
प्रो. चित्तरंजन दास फाउण्डेशन, उड़ीसा द्वारा आयोजित।
‘चित्तरंजन दास जन्म शताब्दी समारोह ‘
21 दिसम्बर, 2023।
बहुआयामी हिमालयी व्यक्तित्व- प्रो. चित्तरंजन दास।
उड़िया और उत्तराखण्डी समाज के साझी विरासत के प्रतीक।

@Dr. Arun Kuksal ।। संस्मरण।। वक्तव्य।।

Arun kuksal,
Arun kuksal

मैं चित्त भाई की ‘जंगल स्कूल: एक शैक्षिक प्रयोग’/‘जंगल चिठ्ठी’ से बात आगे बढ़ाता हूं। प्रो. चित्तरंजन दास के बुनियादी शिक्षा के अपने अनुभवों की यह किताब देश-दुनिया में शिक्षा के क्षेत्र में बहुचर्चित प्रयासों और उन पर आधारित कई व्यक्तित्वों और उनकी किताबों का स्मरण कराती है।

चित्त भाई की चम्पतिमुण्डा गांव के ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ में सन् 1954 से 1958 तक की शैक्षिक गतिविधियां बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में सच्ची घटना पर आधारित चंगीज आइत्मातोव का विश्व चर्चित उपन्यास ‘पहला अध्यापक’ के नायक दूइशेन की तरह हैं। दूइशेन ने सोवियत संघ के किरगीजिया पहाड़ी इलाके के कुरकुरेव गांव में शिक्षा की अलख जगाई थी। इसी काल में अमेरिका में ‘होम स्कूलिंग मूवमैंट’ के अग्रणी सर्मथक और बहुचर्चित किताब ‘एस्केप फ्रॉम चाइल्डहुड’ के लेखक अमरीकी शिक्षाविद जॉन होल्ट ने ‘ग्रोइंग विदाउट स्कूलिंग’ विचार को व्यवहारिक धरातल पर उतारा था। उन्होने अपनी पुस्तक ‘एस्केप फ्रॉम चाइल्डहुड’ और ‘हाउ चिल्ड्रन लर्न’ में बच्चों के बुनियादी शिक्षा और अधिकारों पर अपने व्यवहारिक अनुभवों को उजागर किया था। जॉन होल्ट की तरह प्रो. चित्तरंजन दास ने भी बच्चों की संपूर्ण स्वतंत्रता के केन्द्र में शिक्षा प्रदान करने की वकालत की थी।

हमारे देश में गीजुभाई बधेका ने सन् 1916 से 1936 तक भावनगर (गुजरात) में बुनियादी शिक्षा प्रदान करने के प्रयास किए थे। अपने इस दौर के अनुभवों को उन्होने ‘दिवास्वप्न’ और ‘कठिन है माता-पिता बनना’ पुस्तक में उजागर किया था। इसी तरह शिक्षाविद मित्र प्रो. अनन्त गंगोला के वर्ष- 1991 से 1993 तक मध्य प्रदेश के नीलगढ़-धुंधवानी के मध्य में स्थित अभिनव प्रयोगों का ‘चिकनिक स्कूल’ इसी कड़ी का उल्लेखनीय प्रयास था। ‘सब मज़ेदारी है! कथा नीलगढ़’ संस्मरणात्मक चर्चित पुस्तक में अनन्त गंगोला ने इन तीन साल के अनुभवों को लिपिबद्ध किया है।

प्रो. चित्तरंजन दास के उडीसा के अंगुल जिले के चम्पतिमुण्डा गांव के ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ में प्रधानाध्यापक (सन् 1954 से 1958) के रूप में शैक्षिक प्रयोग देश-दुनिया में चर्चित रहे हैं। बुनियादी तालीम के दृष्टिगत ये प्रयोग आज भी प्रासंगिक हैं।

चित्त भाई का कहना था कि, शिक्षा का सीधा रिश्ता व्यक्ति के जीवन- प्रवाह और जीवन-प्रभाव से है। व्यक्ति की जीवनीय सफलता तभी फलीभूत होगी जब वो स्थानीय और परिवेशीय वातावरण के अनुकूल विकसित होगी। अतः अपने देश के परिपक्ष्य में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भारतीयता के अनुकूल बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। याने, भारत की शिक्षा को सर्वप्रथम भारतीय बनना होगा।

चम्पतिमुण्डा गांव के ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ के प्रधानाध्यापक रहते हुए चित्त भाई ने स्पष्ट किया था कि ‘भीड भरे पथ पर बहुत लोग जा रहे हैं, केवल इस कारण से हम उस पथ पर नहीं जायेंगे, यह निर्णय करने के पश्चात ही हम इस अरण्य पथ पर आये हैं।’…’हम सभी वस्तुओं से, सभी क्षेत्रों से सीखेंगे, परन्तु किसी एक के बंदी होकर नहीं रहेंगे।..विकार-मुक्ति, विचार-स्वतंत्रता और निर्भीकता ही हमारी शिक्षा का ध्येय होना चाहिए।’…‘मेरा उद्वेश्य यह है कि जब शिक्षा समाप्त करके हमारे विद्यार्थी बाहर जायेंगे, तब वे लोग वर्तमान के अन्यायपूर्ण दुष्ट समाज को कदापि सिर झुका कर शिष्ट पुरुष बनकर सहन नहीं करेंगे।’

प्रो. चित्तरंजन दास के इन विचारों और प्रयासों के मूल में बच्चों को नौकरीपयोगी पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के क्रूर प्रहारों से बचाना था। उनका मत था कि भारत में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को अभी तक संपूर्ण शिक्षा के केन्द्र में नहीं रखा गया है। वे चाहते थे कि अपने ही प्रयासों से बनाए गये विद्यालयों में बच्चे वो बन जाते हैं जो वो जीवन में बनना चाहते हैं। उन्होने प्रयास किया कि उनका विद्यालय बच्चों में नौकरी की मानसिकता को पनपाने वाला कारखाना न होकर विकार और अहंकार से दूर किसान के घर जैसा बने। जहां वे सरकारी विभागों के प्यादे के बजाय स्वावलम्बी जीवन और जीविका के मालिक बने। आज देश की नई शिक्षानीति में जो बताया जा रहा है वो सब पचास के दशक में चित्त भाई ने करके भी दिखाया था।

चितरंजन दास मानते थे कि ‘हमने बच्चों को संपूर्ण मनुष्य की दृष्टि से देखना नहीं सीखा है। हम बच्चे के मस्तिष्क को जान गये हैं, परन्तु उसके हृदय के विषय में अनभिज्ञ हैं। जो शिक्षक बच्चे के हृदय को पहचानता है, जिसने उसके हृदय पर प्रभाव डालना सीखा है, वही बच्चों के जीवन के प्रति सबसे अधिक न्यायपूर्ण विचार कर सकता है।’

वे कहते थे कि मुझे शिक्षण से प्रेम था इसलिए मैं मूल रूप से शिक्षक हूं। किसी घटना या मजबूरी या कहीं और नौकरी न मिलने के कारण वे शिक्षक नहीं बने। उनका मत था कि शिक्षक बनने के लिए सर्वप्रथम यही अर्हता होनी चाहिए। तभी, हमारे शिक्षक पूर्ण स्वतंत्रता और निर्भीकता से बच्चों को शिक्षण प्रदान करने में दक्ष हो पायेंगे। जबकि, वास्तविकता यह है कि हमारे देश में जिनको बच्चों के सर्वागींण विकास और मानवीय बनाने की जिम्मेदारी है, उस शिक्षक की सामाजिक स्थिति एवं मान-सम्मान सेवक से भी दीन-हीन है। फिर भला, जो स्वयं डरा हुआ है, वह निडर होने की शिक्षा कैसे दे सकता है?

(चित्त भाई ‘शिलातीर्थ’ यात्रा-पुस्तक में एक उच्च-प्राथमिक विद्यालय में परीक्षा के दौरान शिक्षा विभाग के डिप्टी साहब के रुतबे और उनके स्कूल में आने से शिक्षकों में व्याप्त भय को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं कि- ‘हमारे देश में शिक्षकों से बच्चे पढ़ाई के समय निर्भीक होने का उपदेश अनेक बार सुनते हैं। निडर होने का उपदेश पुस्तक में पढ़ते भी हैं और परीक्षा में इसको लिखते भी हैं।…परंतु शिक्षकों को दूर से आ रहे सरकारी अधिकारी और बाबू से डरते हुए देख वह बच्चा अपने मन के धरातल पर धीरे-धीरे दो भागों में विभक्त्त हो जाता है। परीक्षा उपयोगी ज्ञान और अपने जीवन में उपयोग करने लायक ज्ञान के बीच वह सावधानी से सीमा-रेखा खींच देता है। दोनों पक्षों के ज्ञान के बीच कोई आवागमन संभव नहीं हो पाता।’ (पृष्ठ-33)

‘जंगल चिठ्ठी’ किताब में चित्त भाई महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा और प्रचलित शिक्षा प्रणाली के बीच के द्वन्द्ध को स्पष्ट करते हैं। वे बुनियादी शिक्षा के बजाय नौकरीपयोगी प्रचलित शिक्षा को अधिक बड़ावा देने की सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हैं। उनका मत था कि, इससे अभिजात्य गुणों के वशीभूत बच्चे शारीरिक श्रम को बोझिल और गौंण मानने लगेंगे। शारीरिक श्रम की महत्वा से ज्यादा किताबी ज्ञान को बढ़ावा देना बेहद घातक है। उनका मानना था कि आधुनिक शिक्षा में ग्रामीणों का लोकज्ञान और हुनर हर स्तर पर उपेक्षा का शिकार हुआ है।
चित्त भाई की इन चिठ्ठियों में शिक्षा, शिक्षार्थी और शिक्षक के केन्द्र में भारतीय सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था से उभरे धर्म, संस्कृति, भाषा, साहित्य, जातिगत विभेद, वर्ग विभेद, पर्यावरण आदि पर गहन चिन्तन-मनन है। उस दौर में देशभर में सरकारी और गैरसरकारी नये विचार और योजनायें अपना आकार ले रही थी, उसका विहंगम अवलोकन भी इन चिठिठ्यों में है। यह किताब, वास्तव में देश की आजादी के बाद के पहले दशक के शैक्षिक परिदृश्य का एक हिस्सा है।

तब हमारे योजनाकार अग्रेजों की अंग्रेजियत को छोड़ने को तैयार नहीं थे। वरन, वो उसकी भौंडी नकल करके अपने रुतबे को स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। और, उसी को ही विकास समझ रहे थे। इसी का परिणाम यह है कि विद्यालयों में बुनियादी तालीम के विचार को नहीं पनपने दिया गया।

‘जंगल चिठ्ठी’ किताब में प्रो. चितरंजन दास अपने विदेशों (प्रमुखतया डेनमार्क, इजरायल और फिनलैंड) में अध्ययन और अध्यापन के दौरान के अनुभवों के आधार पर सरकारी तंत्र को बार-बार सावधान करते हैं। इन देशों की तरह स्थानीय परिवेश और काम-धन्धों के हिसाब से स्कूल का टाईम टेबिल बनाने और उनके प्रयासों और उपलब्धियों से सीख लेने का सुझाव वे बार-बार देते हैं। आज शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ये देश हमारे देश से कहीं आगे हैं।

‘उत्तर बुनियादी शिक्षा-संस्थान’ चम्पतिमुण्डा के विद्यालय में अधिकतर गरीब परिवारों के बच्चे थे। सरकारी उपेक्षा और लापरवाही के कारण निर्धन के लिए बुनियादी शिक्षा और सम्पन्न के लिए प्रचलित शिक्षा का स्पष्ट भेद पनपने लगा था। देश में नीति-नियंताओं की अदूदर्शिता के कारण सामाजिक सेवा के लिए बुनियादी शिक्षा और नौकरी के लिए प्रचलित शिक्षा का विचार आकार ले रहा था। चित्तरंजन दास ने इस प्रवृत्ति को रोकने के प्रयास भी किए। उनका दृडमत था कि गरीब और सम्पन्न के लिए अलग-अलग शिक्षा की व्यवस्था बाद में गम्भीर समस्याओं का कारण होगी। चित्त भाई के शैक्षिक अभिनव प्रयास भले ही पूर्णतया सफल नहीं हो पाये हों पर वे निर्मूल सिद्ध नहीं हुए हैं। शिक्षा व्यवस्था को सुधारने में आज भी उनकी महत्वा है।

उत्तराखण्ड हिमालय
हम हिमालयवासी उत्तराखण्डियों के लिए चित्त भाई की पहचान एक प्रखर अध्येयता के साथ एक सहोदर मित्र की भी है। उत्तराखण्ड के प्रति अपने विशेष प्रेम को उन्होने जग-जाहिर भी किया है। यह सर्वविदित है कि वे सर्वोदयी विचारक आदरणीय सदन मिश्रा जी के गुरु होने के साथ उन्हें अपना छोटा भाई भी मानते थे। अपने एक पत्र में उन्होने श्री सदन मिश्रा के पिताजी को लिखा था कि ‘आप मुझे अपना पांचवा बेटा समझिये’। इस नाते, चित्त भाई हम सभी हिमालयवासी उत्तराखण्डियों के भी भाई थे। वे अक्सर अपनी उत्तराखण्ड यात्रा के दौरान सदन जी के घर में पारिवारिक सदस्य के रूप में तमाम उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते थे। यह हम उत्तराखण्डियों के लिए गर्व का विषय है कि अपनी प्रकाशित 22 डायरियों में 14वीं डायरी उन्होने सदन मिश्रा जी को समर्पित की थी। यह उनके उत्तराखण्ड के प्रति प्रेम का प्रतीक है।

हिमालय को हमारे देश का शुभ्र मुकुट कहा जाता है। ‘हिम’ याने ‘बर्फ’ और ‘आलय’ माने ‘घर’ अर्थात हिमालय का शाब्दिक अर्थ है ‘बर्फ का घर’। हिमालय को आदि कैलाश ‘सत्यम् शिवम्’ और सुन्दरम्’ का प्रतीक माना जाता है। हिमालय अप्रीतम ही नहीं यहां के मनुष्यों के साथ तमाम जीव-प्रजातियों के लिए भी अपरिहार्य है। हिमालय का आकार पृथ्वी का मात्र 0.3 प्रतिशत है, लेकिन पृथ्वी की जैव विविधता का 10 प्रतिशत हिमालय में है। परन्तु, आज जिन हालातों से हिमालय और उसका जनजीवन गुजर रहा है, उसमें उसकी इस अदभुत वन्यता की हिफाज़त करना चुनौती बनता जा रहा है। नवीन पर्वत श्रृखंला होने के कारण यह अभी भी बढ़ने की ओर अग्रसर हैं। जिसके कारण यहां अक्सर भूकम्प आते रहते हैं। इसलिए, हिमालय के खतरे भी बेहद गंभीर हैं।

हिमालय एक तरफ आज भी स्वयं निर्माण की प्रक्रिया में है, तो दूसरी ओर यहां की वन्यता और जनजीवन का मां-पिता के रूप में पालनहार भी है। यह गौरतलब है कि हिमालयी वन्यता की न तो पुनर्रचना हो सकती है और न ही इसकी वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है। अतः यह मजबूती से समझना होगा कि हिमालय की वन्यता ने ही उसे देवभूमि की दिव्य पहचान दी है। अतः हिमालयवासियों के सुरक्षित और खुशहाल जीने का एक मात्र आधार हिमालय की वन्यता की हिफ़ाजत और सलामती में ही है।

वैश्विक स्तर पर हिमालय पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन का नियामक होने के साथ मानव संस्कृति एवं सभ्यता के विकास क्रम का भी साक्षी है। हिमालय क्षेत्र अपनी अनुपम वन्यता के बदौलत नैसर्गिक सुन्दरता और आध्यात्मिक शांति के लिए लोगों को आकृष्ट करता है, तो साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों, उत्पादों, वस्तुओं और सेवाओं के रूप में एक विश्व बाजार के बतौर लोकप्रिय भी है। इन्हीं खूबियों के कारण संपूर्ण हिमालय क्षेत्र दुनिया में तकरीबन 130 करोड़ लोगों के जीवन और जीविका का प्रमुख आधार है।

हिमालय के इन शिखरों की गोद में उच्च-हिमालयी क्षेत्र में पल्लवित समाजों के घर-गांव हैं। उन समाजों के लिए हिमालय चुनौती नहीं, रहवासी है। हिमालय में रह कर वे प्रकृति की विकटता का नहीं, उसकी विराटता को महसूस करते हैं। इस विराटता में ही दोनों का सह-अस्तित्व और वैभव विकसित हुआ है।

हिमालयवासियों का जीवन और जीविका का आधार, अतीत और आयाम घुमक्कड़ी रहा है। स्वाभाविक है कि, हिमालय के प्रति इस समाज का आकर्षण पारिवारिक आत्मीयता से ओत-प्रोत है। भारत, तिब्बत-चीन और नेपाल की सीमाओं से घिरे इस क्षेत्र में आज भी देशों की परिधि से बेफिक्र हिमालयी समाज अपनी जीवंतता और समग्रता में जीता है। जिनके, दिलों में देश की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है।

विश्व की सर्वाधिक नवीन पर्वत श्रृखंला भारतीय हिमालय 2500 किमी. लम्बे और 400 किमी. चौड़े क्षेत्र में फैला है। देश की कुल जल सम्पदा का 63 प्रतिशत का श्रोत हिमालय है। हिमालय को इसीलिए ‘पानी की प्राचीर’ का खि़ताब दिया गया है।

हमारे देश में 11 हिमालयी राज्य हैं। उत्तराखण्ड इसका मध्य हिमालयी राज्य है। जिसका गठन भारतीय गणतंत्र के 27वें राज्य के रूप में 9 नवम्बर, 2000 को हुआ था। उत्तराखण्ड के पूर्व में नेपाल, पश्चिम में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में उत्तर-प्रदेश और उत्तर में तिब्बत क्षेत्र है।

उत्तराखण्ड का 88 प्रतिशत पहाड़ी और 12 प्रतिशत मैदानी क्षेत्र है। इसके कुमांऊं और गढवाल दो मण्डल हैं।

गढ़वाल मण्डल के हिस्से में स्थित हिमालय प्राचीन महापुरुषों यथा- बुद्ध, शंकराचार्य, ऋषभदेव, गुरुनानक, गोरखनाथ, विवेकानन्द आदि की कर्मभूमि रही है। किवदंती है कि पांडवों ने गढ़वाल से स्वर्ग को प्रस्थान किया था। कालीदास के साहित्य का केन्द्र बिन्दु हिमालय ही है। महान व्यक्तित्वों की यात्राओं ने गढ़वाल हिमालय की ओर तीर्थयात्रा की परम्पराओं को विकसित किया। तीर्थयात्रा से इतर गढ़वाल हिमालय से तिब्बत की ओर व्यापार ने हिमालय की यात्राओं को हमेशा नये और बहुआयाम दिए हैं।

गढ़वाल हिमालय की ओर पुरातन यात्राओं में चीनी यात्रियों के प्रसंग इतिहास में दर्ज हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सन् 629 से 645 तक भारत की यात्रा के दौरान अधिकांशतया हिमालय की ओर यात्रा की थी। थॉमस हार्डविक, मूरक्रोफ्ट, हेबर, हूकर, रोरिक, हाइम, गैनसीर, इब्नबतूता, अलबरूनी, पंडित नैनसिंह रावत, किशन सिंह रावत, राहुल सांकृत्यायन, बाबा नागार्जुन, प्रणवानन्द, सुंदरानंद, अनेेक घुमक्कड़, पर्वतारोही, अन्वेषक, लेखकों की यहां की यात्राओं के विवरण मौजूद हैं। काल-चक्र के विभिन्न सोपानों में सम्पन्न तमाम यात्राओं ने यहां के प्राकृतिक और मानवीय जीवन की समग्र विकास यात्रा को भी सार्वजनिक किया है।

प्रो. चित्तरंजन दास जी की गढ़वाल हिमालय की ओर की गई विभिन्न यात्राओं के विवरण गढ़वाली जन-जीवन के इसी प्रकार के समग्र विकास यात्रा को उद्घाटित करते हैं। सन् 1959 में उन्होने केदारनाथ-बद्रीनाथ और सन् 1960 में यमनोत्री-गंगोत्री और गोमुख की यात्रा की थी। यमनोत्री-गंगोत्री यात्रा में प्रो. चित्तरंजन दास ने ऋर्षिकेश में आध्यात्मगुरु शिवानंद, गोमुख मार्ग में स्वामी सुन्दरानंद, बूढ़ाकेदार के निकट सिल्यारा आश्रम में पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा जी एवं उनकी धर्मपत्नी विमला बहुगुणाा जी से मुलाकात की थी। हिमालय से जुड़े कई मुद्दों पर इन महानुभावों से उनका गम्भीर-चिन्तन मनन भी हुआ था। इन दिनों बूढ़ाकेदार में दलितों के मंदिर प्रवेश का आन्दोलन चल रहा था। चित्त भाई आन्दोलनकारियों से मिले और उन्हें अपना समर्थन भी प्रदान किया था। चित्त भाई की यह यात्रा-डायरी अप्रकाशित है। मेरा सुझाव है कि चित्त भाई की सन् 1960 की यमनोत्री-गंगोत्री-गोमुख यात्रा को भी पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जाय। इन दो यात्राओं के बाद वे दो बार और गढ़वाल क्षेत्र में आये थे।

‘शिलातीर्थ’
उत्तराखण्ड हिमालय पर केन्द्रित प्रो. चित्तरंजन दास द्वारा विगत शताब्दी के 60 के दशक में उड़िया भाषा में लिखी ‘शिलातीर्थ’ यात्रा-लेखन की श्रेष्ठ पुस्तकों में शामिल है। स्वयं चित्त भाई स्वीकारते हैं कि ‘शिलातीर्थ’ मेरी ऐसी पुस्तक है, जिसे लिखते समय मुझे सबसे अधिक आंतरिक तृप्ति प्राप्त हुई है।’ ‘शिलातीर्थ’ की लोकप्रियता के कारण आज भी इस किताब को पढ़कर हजारों की तादाद में तीर्थयात्री, युवा और पर्यटक उत्तराखण्ड हिमालय की ओर आते हैं।

अक्सर कहा जाता है कि ‘जो हिमालय में रहते हैं, वे भी इसको बहुत ज्यादा नहीं जानते हैं।’ वास्तव में ‘हिमालय भी हिमालय को नहीं जानता है। दुर्गमता के कारण इसका एक छोर दूसरे को नहीं पहचानता है। हम सिर्फ अपने हिस्से के हिमालय को जानते हैं। और, इसे जानने के लिए भी एक जीवन छोटा पड़ जाता है।
इसी संदर्भ में, रूसी लेखक रसूल हमज़ातोव की प्रसिद्ध किताब ‘मेरा दा़ग़िस्ताान’ में हिमालयी लोगों पर लिखा गया कि ‘पहाड़ में रहने वाले लोगों से पूछा गया – किसलिए आप इतनी दूर और दुर्गम पहाड़ों में अपने गांव बसाते हैं। आप तक पहुंचना लगभग असंभव और साथ ही ख़तरनाक भी है… तब पहाड़ी लोगों ने जवाब दिया कि अच्छे दोस्त तो सभी तरह के ख़तरों का सामना करते हुए मुश्किल रास्तों से भी हम तक पहुंच जायेंगे और बुरे दोस्तों की हमें ज़रूरत नहीं है।’ आज हिमालयवासियों की बिडम्बना यह है कि हिमालय को उसके मित्रों से ज्यादा उसके शत्रु जानने लगे हैं।

चित्त भाई हम हिमालयवासी उत्तराखण्डियों के ऐसे परम मित्र थे जो विकट कठिनाईयों को सहते हुए हमारे सुख-दुःख में बराबर के साझेदार रहे। हिमालय और हिमालयवासियों के जीवन के इन अंतर-संबंधों का मर्म चित्त भाई ने समझकर उनके समाधानों पर भी सुझाव दिए। उनका कहना था कि, ‘हिमालय के अद्वितीय सौंदर्य के साथ ही इसके स्वयं के जीवन और इस पर निर्भर जीवनों के मर्म को सबसे पहले समझा जाना चाहिए। तभी हिमालय हमारा और हम हिमालय के रह पायेंगे।’

प्रो. चित्तरंजन दास मानते हैं कि ‘आदमी में कर्मठता और सहजता का एक साथ होना सफल एवं सुखी जीवन है। और, हिमालय कर्मठता एवं सहजता को सिखाने का सर्वोत्तम प्रशिक्षक है। हिमालय का शैल रूप शिलातीर्थों में परिणत होकर मानवीय जीवन-दायित्वों को आदर्श रूप में वहन करना सिखाते हैं। वास्तव में, बार-बार हिमालय की ओर आने की कामना के मूल में जीवन को सहजता से स्वीकार करने की दक्षता पाना है।’

प्रो. चितरंजन दास स्वीकारते हैं कि ‘…बद्रीनाथ और केदारनाथ मेरे लिए हिमालय के सर्वप्रथम आकर्षण नहीं हैं। हिमालय का सर्वप्रथम आकर्षण है स्वयं हिमालय। धर्म कमा कर स्वयं का और अपने पितरों का उद्वार करने के लिए मैं पैदल नहीं चल रहा हूं- मेरा मार्ग इसे देखने का मार्ग है। इसे अनुभव करने का मार्ग है। अनुभव कर अपने अंदर शांत हो जाने का मार्ग है। यही मेरी मुक्ति है, मेरी विमुक्ति हैं। पाप मेरे जीवन का प्रमुख उत्प्रेरक नहीं है। हिमालय एक दरवाजा खोलने पर जो मुझे सैकड़ों दरवाजे खोलने के लिए प्रेरित करता है, उसे ही मैंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ उत्प्रेरक मान लिया है।’ (पृष्ठ-62) उनका दृड मत था कि जीवन-यात्रा और तीर्थ-यात्रा में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। जीवन-यात्रा को भी तीर्थ-यात्रा की तरह परिपूर्ण करना चाहिए। अपनी हिमालयी यात्राओं में उन्होने इसी नीति का अनुसरण किया था।

चित्त भाई सन् 1959 में बलवन्त विद्यापीठ ग्रामीण संस्थान, विचपुरी-आगरा (उत्तर प्रदेश) में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। संयोग से श्री सदन मिश्रा उसी संस्थान में उनके शिष्य के रूप में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। इन्हीं गुरु और शिष्य के आगरा, काठगोदाम, नैनीताल, अल्मोड़ा, कौसानी, गरुड़, ग्वालदम, देवाल से हाटकल्याणी गांव में पहुंचने के रोचक संस्मरणों से ‘शिलातीर्थ’ यात्रा-पुस्तक प्रारम्भ होती है। इस यात्रा के प्रमुख पड़ाव हाटकल्याणी, नारायणबगड़, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि, काकडागाड़, गुप्तकाशी, रामपुर, गौरीकुण्ड, रामबाड़ा, केदारनाथ, ऊखीमठ, कालीमठ, तुंगनाथ, चमोली, पीपलकोटी, जोशीमठ, पाण्डुकेश्वर और बद्रीनाथ थे।

चमोली (गढ़वाल) के बधाण क्षेत्र में स्थित सदन मिश्राजी के पैतृक गांव हाटकल्याणी से 22 मई, 1959 को चितरंजन दास, सदन मिश्रा, उनके पिता सहित चार पुरुष और एक महिला केदारनाथ-बद्रीनाथ की ओर चल पड़ते हैं। हिमालय की भव्यता, विकटता, जनजीवन और लोक-विश्वासों से नये-नये परिचित चित्त भाई अपनी सह-यात्री महिला की वेशभूषा से अचंभित है-

‘तीर्थयात्रा पर जा रही थी। इसलिए बहुत प्रेम से गहनों और आभूषणों के द्वारा अपने पूरे शरीर को सुसज्जित कर तैयार हुई थीं। पैरों में चांदी की पायल, हाथों में तीन-तीन सोने-चांदी के कंगन। नाक में बड़ी सी सोने की नथ। पूरा तीर्थ मार्ग पैदल चलकर देव-दर्शन करने वे हमारे साथ साहस कर निकल पड़ी थी। केवल गढ़वाली पहाड़ी औरतों में ही इतना साहस संभव होता है। (पृष्ठ-36)

चित्त भाई के लिए यह यात्रा मात्र तीर्थयात्रा का लबादा ओढ़े नहीं थी। वे मानते थे कि यह देवभूमि ही नहीं मनुष्यों की भूमि पहले है। स्थानीय लोगों को नज़रअंदाज करके केवल मंदिर दर्शन से पुण्य नहीं मिलेगा। अतः एक तीर्थयात्री, पर्यटक और घुमक्कड़ को स्थानीय समाज को जानने और समझने की दृष्टि भी साथ लिए चलनी चाहिए। इसीलिए चित्त भाई तब के पर्वतीय समाज के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और अन्य पहुलुओं पर प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा को भी साथ लिए चले थे। इस यात्रा में, विदेशों और देश के अन्य हिमालयी क्षेत्रों की अपनी पूर्व की यात्राओं का तुलनात्मक विश्लेषण भी वे पाठकों तक पहुंचाते हैं।

उनका दृडमत था कि हमें दूसरों से कहने-लिखने से ज्यादा खुद साबित करके दिखाना होगा। वे कहते कि, पहाड़ के गांव में आना-जाना और गांव में ग्रामीणों जैसा रहना इन दोनों प्रवृत्तियों में बहुत अन्तर है। गांव में जीवकोपार्जन करके जीवन को चलाने की दिक्कतें दिखती कम हैं उसे गांव में रहकर ही महसूस किया जा सकता है। और, ऐसा उन्होने स्वयं करके दिखाया भी। वे कहते कि, बात यह है कि बाहरी लोग जो हिमालय को देखते हैं और जो इनमें रहते हैं के बीच यह देखने और रहने का अन्तर ही हिमालय को जानने-समझने के दृष्टिकोणों को असमान बना देता है। मूलभूत सुविधाओं से अनछुए ये पेड-पहाड़ दिखने में सुन्दर लगेंगे पर जब आपको इनमें ही रहना हो तब यह विचार, विचार ही रह सकता है। यह तथ्य आज के संदर्भ में सटीक और सच के बहुत करीब है।

इस किताब में विगत शताब्दी के 50 से 60 के दशक का गढ़वाल-कुमाऊं का जनजीवन साकार हुआ है। ये वो दौर था जब पैदल यात्रायें अपना अस्तित्व खोने की कगार पर थी। चित्त भाई के यात्री-दल ने केदारनाथ और बद्रीनाथ की 17 दिनों की यह यात्रा 254 मील पैदल और मात्र 11 मील बस से तय की थी।

वास्तव में, गढ़वाल में पैदल तीर्थयात्रा के दृष्टिगत वह एक संक्रमणकाल का दौर था। नई मोटर सड़कों से नये यात्रा मार्ग दिखने लगे थे। मोटर गाड़ियों के आने से तीर्थयात्रा का स्वरूप भी बदलने लगा था। पुराने यात्रा पड़ाव अब नये यात्रा मार्ग से दूर होते जा रहे थे। बदलाव की इस प्रक्रिया में तमाम अव्यवस्थायें यथा- मोटर गाड़ियों के लिए आपाधापी, पण्डों एवं मोटर मालिकों की मनमानी सर्वत्र व्याप्त थी। तीर्थयात्री एक से निपटे तो दूसरा परेशान करने के लिए हाज़िर हो जाते थे। पंडो की नज़र से बचने के लिए चित्त भाई कहते ‘मैं तो गढ़वाल के बधाण क्षेत्र का हूं’। चित्त भाई ने अपनी गढ़वाल हिमालय की इन यात्राओं में मानवीय आचरण के मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्षों को भी उजागर करते हुए लिखा हैं कि ‘तीर्थ यात्रायें शोरगुल, आडंबर या पाखंड का विषय नहीं है। लेकिन, हमारे समाज में तीर्थ-यात्राओं में यही सब प्रमुखता से देखने और सुनने को मिलता है।’

उस दौरान, यात्रीगण पैदल चलते हुए कई पौराणिक स्थलों के दर्शन करते हुए आगे बढ़ते थे। दूरदर्शी लेखक चित्त भाई नये सड़क निर्माण की योजना पर आशंका व्यक्त करते हैं। उनका मत था कि, नये मोटर मार्गों को पुराने पैदल मार्गों से दूर और उनके दिशा परिवर्तन से अनेक तीर्थस्थल भविष्य के तीर्थ मार्ग से अलग-थलग हो जायेंगे। नतीजन, उनका तीर्थयात्रा की दृष्टि से महत्व गौण हो जायेगा। नये सड़क मार्ग बनने से पैदल मार्गो, कम प्रचलित पौराणिक स्थलों और मंदिरों पर पड़ने वाले कई कुप्रभावों का जिक्र उन्होने प्रमुखता से किया था। उन्होने सुझाव दिया था कि, जहां तक संभव हो प्रचलित पैदल मार्गों को ही नया मोटर मार्ग बनाया जाना चाहिए। ताकि, वे भविष्य में उपेक्षित न हो और उनका महत्व आने वाले समय में भी कायम रहे। निश्चित रूप में इस तथ्य को तब समझा जाना चाहिए था।

पैदल मार्गों में स्थित चट्टियों (विश्रामस्थल) के सौहार्दपूर्ण वातावरण और उनके भविष्य को लेकर वे लिखते हैं कि ‘इन चट्टियों में कोई जातिभेद नहीं मानता है। थका-मांदा, धूल से सना यात्री जब किसी दुकान के सम्मुख खड़ा होता है तो कोई उससे उसकी जाति के विषय में कोई प्रश्न नहीं करता है। दुकानदार उठकर उसे अतिथि मानकर उसका स्वागत करता है।…हो सकता है कि कुछ और सालों में मोटर मार्ग आगे बढ़ता जाये। जिससे, तीर्थमार्ग की ये चट्टियां अपने आप समाप्त हो जायें। पेट भरने के लिए अन्य व्यवसाय की खोज में हो सकता है, दुकानदार अन्यत्र चले जायें। इन चट्टियों के द्वारा उत्तराखण्ड के अधिवासियों की जिस सरलता, अच्छाई और भद्रता का परिचय हमें आज मिलता है, वह तब नहीं मिल पायेगा।’ (पृष्ठ-176)

चित्त भाई की वर्षों पूर्व की आशंका आज सही साबित हुई है। मोटर मार्ग बनने से अब गढ़वाल हिमालय में तीर्थयात्रा प्रमुखतया बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमनोत्री और गंगोत्री जाने तक ही सीमित रह गयी है। उनके सुझावों को भले ही तब नजर-अंदाज किया गया। लेकिन यह प्रसन्नता की बात है कि चित्त भाई के सुझावों के अनुरूप ही 64 साल बाद अब गढ़वाल हिमालय के पुराने पैदल मार्गों में बनी चट्टियों और मार्गों को पुर्नजीवित किया जा रहा है।

चित्त भाई ने गढ़वाल हिमालय के तीर्थस्थलों के बारे में देश के विभिन्न समाजों में प्रचलित कहानियों और किवदन्तियों का उल्लेख इस किताब में किया है। जो कि, गढ़वाल में प्रचलित कथाओं से काफी भिन्न हैं। जगह-जगह पर साधु-संतों के प्रवचन, उनसे वार्तालाप, विविध इलाकों की वनस्पतियों, प्रचलित अन्धविश्वासों पर हुए तर्क-विर्तक हैं। पहाड़ी श्रमिकों की दुर्दशा को उन्होने कई बार उद्घाटित किया है। पैदल यात्राओं में वे एक जिज्ञासू का आचरण करके हर एक से उनके हाल-चाल पूछते नज़र आते हैं। जगह-जगह पर विकास के नाम पर अधाधुंध निर्माण कार्यों से भविष्य में होने वाले पर्यावरणीय खतरों से वे आगाह कराते हैं। स्मारकों और मंदिरों को देखते हुए वे उसके पुरातात्विक ज्ञान लेना नहीं भूलते। चित्त भाई बताते हैं कि संपूर्ण हिमालय में उत्तराखण्ड की महत्वा और आकर्षण इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि, हिमालय के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तराखण्ड में ही सर्वाधिक देवी-देवताओं के तीर्थ विराजमान है।
गुप्तकाशी से आगे चलकर नारायणकोटी में आकर वे विद्वान विशालमणि शर्मा की हिमालय और उसके तीर्थस्थलों रचित साहित्य, उनके छापाखाना और पुस्तक की दुकान को देखकर आश्चर्यचकित होते है।

मई माह में 64 साल पहले की इस यात्रा के पड़ाव, चट्टियों, दुकानों, मन्दिरों, धर्मशालाओं, बर्फीले रास्तों पर मीलों पैदल चलकर थकान से चूर होने पर भी रहने, राशन और बरतन का इंतजाम करना, भीगते मौसम में गीली लकड़ियों से खुद खाना बनाना उस समय की तीर्थयात्रा से इस किताब के माध्यम से रोमांचक मुलाकात करने जैसा ही है। घनघोर और वीरान जंगल में जब जेब की एक मात्र दौलत सभी भुने चने कीचड़ में गिर गये, तो भूख-प्यास से बेहाल चित्त भाई की मनोदशा उस समय की तीर्थ यात्रा के दुर्गम कष्टों का एक सामान्य उदाहरण है। ऐसे, जैसे कि किसी सयाने आदमी के कठिन बचपन को देख लिया हो।

प्रो. चितरंजन उस दौर में यात्रा के बाद 2 माह से अधिक अवधि तक सदन मिश्रा जी के परिवार के सदस्य बनकर हाटकल्याणी गांव में रहे। घर के काम-काजों में हाथ बंटाते हुए, उन्होने पहाड़ी खेती, पशुपालन, वन-उपज, जनजीवन के तौर-तरीके, रीति-रिवाज, खान-पान, लोक-भाषा, जातीय-विभेद, व्यवसाय, शिक्षा, खेल और उत्सवों को जाना और सीखा।
हाटकल्याणी गांव में रहते हुए प्रो. चितरंजन दास गढ़वाल के मानवीय और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के सुझावों के साथ गढ़वाली लोक गीतों और लोक कथाओं का भी संकलन और अध्ययन करते हैं।

गढ़वाली भाषा और उड़िया भाषा की समानता के शब्दों को उन्होने उदृत भी किया है। ऐसे अनेकों शब्दों की एक तालिका के रूप में प्रस्तुत कर एक शोधकर्ता की भूमिका उन्होने इस पुस्तक में निभाई है। उडिया और गढ़वाली भाषा के समानार्थी अनेक शब्दों की व्याख्या करते हुए वे बताते हैं, उड़िया भाषा के कई शब्द गढ़वाल के जनजीवन में आये हैं। भात, बाट, हलिया, मुंड, भल, कुकर, बणकुकुड़ा, मूषा, ननी, ठेकि, बोल, गाई, कुतुकुतु, वेला, पठाइबा, चिरिबा, माण, उपाडिबा, सिंघाणि, जन्ह् आदि सैंकड़ों अन्य शब्द उड़िया और गढ़वाली भाषा में समान रूप में प्रचलित हैं।

उड़िया और गढ़वाली भाषा के समान शब्दों के आधार पर चित्त भाई प्रमाणित तौर पर मत व्यक्त करते हैं कि उड़ीसा से पुरातनकाल से गढ़वाल में बसने की प्रथा रही है। चित्त भाई ने इस सेतु को फिर से जीवंत किया है। इसी कारण, गढ़वाली लोगों के प्रति उन्होने बेहद ममता का अनुभव किया। उनका मानना था कि, सभी चीजें केवल आखों से नहीं दिखाई देती हैं। असल चीजें देखने के लिए अपना हृदय अपरिचित के सामने खोलना पड़ता है। उसके पास पूरी सहानुभूति के साथ बैठकर उसकी दिनचर्या में सहयोगी बनना होता है।
तभी तो, वे हाटकल्याणी गांव से अक्सर बाहर आकर कैल नदी, पिण्डर नदी, देवाल, वाण, वेदनी बुग्याल के नजदीकी गांवों में वे जहां-जहां जाते वहां के लोगों के दुःख-सुख में शरीक हो जाते। एक सच्चे मानवतावादी होने के नाते वे केदारनाथ में शिवलिंग पर माथा टेकते हुए वे समस्त जीव जगत के कल्याण की मनौती मांगते। वे प्रार्थना करते कि ‘हे! भगवान् ऐसा हो कि मैं आपको मंदिर से बाहर भी देख पाऊं, ताकि सारे जगत का कल्याण हो।’

प्रो. चितरंजन उल्लेख करते हैं कि, शांतिनिकेतन से जुड़ी विद्वान रानी चंद ने अपनी केदारनाथ, तुंगनाथ और बद्रीनाथ तीर्थयात्रा पर पचास के दशक में बंग्लाभाषा में ‘हिमाद्री’ यात्रा-पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक की लोकप्रियता और उपादेयता को मानते हुए कोलकत्ता विश्वविद्यालय ने ‘हिमाद्री’ यात्रा-पुस्तक को ‘भुवनमोहिनी स्वर्णपदक’ प्रदान किया था।

इस यात्रा-पुस्तक में चित्त भाई उत्तराखंड के सीमान्त क्षेत्र के परिदृश्य के साथ-साथ अतीत, विगत और उस समय में भारत, नेपाल, तिब्बत और चीन के आपसी रिश्तों और विवादों की पड़ताल भी करते हैं। यह किताब हिमालयी पारिस्थिकीय में विकसित समाज के मन-मस्तिष्क में समायी विराटता और वैभव को महसूस कराते हैं। चित्त भाई ने भारतीय हिमालय क्षेत्र के अंतर्गत शामिल क्षेत्रों की समग्र पारिस्थितिकीय संरचना, प्राकृतिक एवं मानवीय विकास-क्रम, पर्यावरणीय संवेदनशीलता, समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता में मानवीय जन-जीवन से जुड़े विविध पक्षों और चुनौतियों को प्रामाणिक तथ्यों के साथ उजागर किया गया है।

चित्त भाई अपनी यात्राओं में सुझाव देते हैं कि, हिमालय जो भारतीय महाद्वीप के सम्पूर्ण पारिस्थिकीय तंत्र का जनक, नियंता और नियंत्रक है की गहन भूगर्भीय, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक चिन्तन किए जाने की आवश्यकता है। इस माध्यम से हिमालयी भू-क्षेत्र और जीव-जगत की गूढ़ जानकारियों को जन सामान्य तक पहुंचाया जा सकता है। आज जरूरत, हिमालयी राज्यों के स्थानीय जन-जीवन को सहज और सरल बनाने के लिए नई वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी के बल पर आर्थिक-सामाजिक प्रगति की आवश्यकता है।

वे उल्लेख करते हैं कि हिमालयवासियों ने हिमालय की विकटता और विराटता को स्वीकार करते हुए उसके पारिस्थितिकीय स्वरूप के अनुरूप अपनी जीवन शैली को अपनाया और जीवनीय कर्मठता के बल पर अपने समाज को समृद्ध, वैभव और आनंद से परिपूर्ण करने में सफलता हासिल की है।

इस बिन्दु पर मुझे गढ़वाल के इतिहास में ‘बावनी अकाल’ का घ्यान आ रहा है। विक्रम संवत् 1852 (सन् 1795) के भयंकर अकाल में गढ़वाली लोग कई दिनों तक भूख से बेहाल रहे परन्तु उन्होने अपनी खेती के परम्परागत बीजों को नहीं खाया। उन्हें विश्वास था जब तक ये परम्परागत बीज उनके पास उपलब्ध है उन पर जीवनीय संकट नहीं आ सकता है। वे आश्वस्त थे कि कुछ समय के दुर्दिनों के बाद अपने इन मौलिक बीजों का खेती में उपयोग करने से वे अकाल पर विजय प्राप्त कर लेंगे। उनका विश्वास सही साबित हुआ उन्हीं बीजों के बदौलत बाद में उनके जीवन में फिर से खुशहाली आ गई थी।

पुस्तक के माध्यम से चित्त भाई ने सार स्वरूप यह स्पष्ट संदेश दिया है कि हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए जन सामान्य में सतत् वैज्ञानिक चेतना के माध्यम से उसे ‘बिकाऊ’ नहीं, ‘टिकाऊ’ रखने की सख्त जरूरत है। उनका मानना था कि, ‘हिमालय बहुत नया पहाड़ होते हुए भी मनुष्यों और उनके देवताओं के मुक़ाबले बहुत बूढ़ा है। यह मनुष्यों की भूमि पहले है, देवभूमि बाद में, क्योंकि मनुष्यों ने ही अपने विश्वासों तथा देवी-देवताओं को यहां की प्रकृति में स्थापित किया। हिमालय के सम्मोहक आकर्षण के कारण अक्सर यह बात अनदेखी रहती आयी है। इस विचार के माध्यम से चित्त भाई आम जन से लेकर अध्येताओं के हिमालय के प्रति विचार और व्यवहार को सचेत करते है।

चित्त भाई के विचारों को आत्मसात करते हुए हमें यह आशा करनी ही होगी कि हिमालय की सन्तानों और समस्त मनुष्यों को समय पर समझ आयेगी, पर यह याद रहे कि यह समझ न अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में उपलब्ध है और न कोई बैंक या बहुराष्ट्रीय कम्पनी इसे विकसित कर सकती है। यह समझ यहां के समाजों और समुदायों में है, वहीं से उसे लेना होगा। बस, हमें और हमारे नियन्ताओं को इस समझ को समझने की समझ आये।

यह यात्रा-पुस्तक हिमालयी क्षेत्र में आने वाले तीर्थयात्रियों, अध्येयताओं और घुमक्कड़ों के लिए एक गाइड बुक के रूप में भी है। हिमालयी पारिस्थिकीय और उसके निरंतर बदलते मिजाज के बीच कई दिशा-निर्देश इसमें हैं। चित्त भाई बताते हैं कि, कैसे, अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति को सामान्य एवं सन्तुलित रखते हुए, अपने सह यात्रियों के साथ तारतम्य और आत्मीयता बनाये रखनी चाहिए। इसके कई कारगर अनुभवों को चित्त भाई ने इस किताब का हिस्सा बनाया है। असल में, यह किताब एक यात्रा-वृतांत के दायरे को बहु-व्यापकता प्रदान किए हुए है। इस किताब के जरिए हिमालय की पारिस्थिकीय संवेदनशीलता, वन्यता और सामरिकता बखूबी सामने आयी है। जिसे, नीति-नियंताओं और प्रबुद्ध वर्ग को अवश्य समझना चाहिए।

कहना होगा कि ‘शिलातीर्थ’ आज से 64 साल पहले के गढ़वाल हिमालय पर लिखी यात्रा-पुस्तक के साथ एक अध्येयता और घुमक्कड़ के जीवन के बहुआयामों को भी उद्घाटित करती है। चित्त भाई के माध्यम से गढ़वाल के पर्वतीय अंचलों के विगत शताब्दी में पहाड़ी गांवों के क्रमबद्ध बदलते मिजाज और सामाजिक-आर्थिक जीवन में आने वाली चुनौतियों को समझने की कोशिश करते हैं। यह पुस्तक एक सच्चे घुमक्कड़ को वो ज्ञान और हुनर प्रदान करती है जो उसे घर वापस लौटते हुए पहले से अधिक विवेकशील और जिम्मेदार बनाता है।

तभी तो, प्रो. चितरंजन दास लिखते हैं कि ‘पहाड़ों पर मेहमान बनकर गया था। गढ़वाल को छोड़ विचपुरी (आगरा) लौटते समय ऐसा लग रहा है जैसे अपना घर छोड़ कर आया हूं। हृदय को जहां कहीं स्थान मिलता है वहां ऐसा ही होता है। इसी रीति और नीति से मनुष्य अपने जीवन में स्वयं को प्रसारित करता है।…डेनमार्क से आरंभ कर हाटकल्याणी तक हर जगह मुझे पुत्र होने का अधिकार प्राप्त हुआ, अनेक प्रकार की ममता की डोरों से, विभिन्न लगामों से बंध कर मैं इस जीवन को नश्वरता में एक अमरत्व का भाव भर सका हूं। इसलिए, प्रत्येक जगह को छोड़ कर जाते समय अपने किसी को छोड कर जाने जैसा दुःख मुझे मिला है, परन्तु यह दुःख ही मेरे जीवन की परम संपदा और परम गौरव होकर रहेगा।’ (पृृष्ठ-238)

‘हिमालय आकर मैंने सौंदर्य की जो लीला देखी है, जीवन के साधारण मुहूर्तों में भी उस लीला को मैं भूल नहीं पाऊंगा। हिमालय के पथ पर चल कर मैंने जो पुण्य अर्जन किया है, जीवन-पथ पर चलते समय वही पुण्य मेरी जीवन गति को अधिक सहज बना देगा। …हिमालय के शिलातीर्थ में मैंने जिन देवताओं का दर्शन किया है, जीवन तीर्थ में वे देवता ही मेरे मन में अधिक श्रद्धा ले आयेंगे। इसी हिमालय पर मैं बार-बार आऊंगा, बार-बार इसके चरणों में बैठकर इसकी कथा सुनूगां, इसकी नदियों को, इसकी तुषार-चूड़ा को और इसके प्रसन्न मुख को देख उनसे जीवन में खुश होने के लिए मैं बार-बार हिमालय की ओर जाता रहूंगा।’ (पृष्ठ-250-51)

प्रो. चित्तरंजन दास ने उत्तराखण्ड हिमालय को जो अपनापन दिया है, वह हम हिमालयवासियों की अमूल्य धरोहर है। इस नाते उड़िया और उत्तराखण्डी समाज के साझी विरासत के वे प्रतीक थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व हिमालय की तरह श्रेष्ठ दिव्यता और भव्यता से परिपूर्ण था। वे उड़िया समाज के साथ उत्तराखण्डी समाज के भी अभिभावक थे। तभी तो उनके हिमालय के प्रति व्यक्त विचार और सुझाव आज हिमालयी नीति के निर्माण में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

मैं इस आलेख को विराम देते हुए सार स्वरूप दृडमत से यह स्वीकारता हूं कि प्रो. चित्तरंजन दास को बीसवीं सदी के मानवतावादी, दार्शिनिक, शिक्षाविद, भाषाविद, अध्येयता, अन्वेषक और घुमक्कड़ आदि अनेकों रूपों में सदैव याद किया जाता रहेगा।

अतं मैं इस समारोह में आप सब विद्वतजनों के सम्मुख विचार व्यक्त करने का सम्मान देने के लिए उपस्थित सभी महानुभावों और इस आयोजन से जुड़े सभी प्रतिनिधियों का तहे दिल से हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं।

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