Sunday, September 13, 2026
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शिक्षा में रचनात्मकता का समावेश समाज को जीवंत बनाए रखता है – सेमवाल

शिक्षा में रचनात्मकता का समावेश समाज को जीवंत बनाए रखता है – सेमवाल

Ankur patrika
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दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र और अंकुर संस्था के संयुक्त तत्वाधान में आज प्रातः’ शिक्षा और उसकी चिंताएं विषय पर’ विमर्श का एक आयोजन किया गया.

इस अवसर पर साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं टिहरी के मुख्य शिक्षा अधिकारी एस.पी.सेमवाल ने कहा कि समाज में जो भी नया और अनोखा दिखाई देता है वह रचनात्मक विचार से ही उत्पन्न होता है। उन्होंने कहा कि रचनात्मकता ही है जो समाज को जीवंत बनाए रखती है। विद्यालयों में सृजनात्मकता की आवश्यकता पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सूचना, तकनीक और कम्प्यूटरीकृत युग में भी मौलिकता, हाथ के कौशल और बौद्धिक सम्पदा का कोई विकल्प नहीं हो सकता। भावनाओं की कद्र करने वाले शिक्षकों की आवश्यकता है। तथ्य, सत्य और कथ्य के साथ चलने वाला और चलाने वाला शिक्षक ही हो सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क के विकास की यात्रा करोड़ों साल पुरानी है। अंकुर की टीम की सोच का विस्तार पूरे राज्य में हो। जो छात्र किताबी पढ़ाई से बाहर सहयोग करते हैं उनका नज़रिया आम नहीं रह जाता। वे छात्र समाज को संवेदनशील बनाने का काम करते हैं। बच्चों के बीच में काम करने वाले शिक्षक चाहते हैं कि बेहतर नागरिक बढ़ें। मनुष्यता बची रहे। बढ़ती रहे। इस प्रकृति को सुन्दर बनाने के लिए काम करते हैं। बच्चे सवाल करें। इसके लिए ज़रूरी है कि बच्चों के लिए ऐसी पत्रिकाएं निकलें।

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बतौर विशिष्ट वक्ता व्यंग्यकार, कवि, शिक्षाविद् और जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, देहरादून के पूर्व प्राचार्य राकेश जुगरान ने कहा कि सार्वजनिक विद्यालयों में भारत के नौनिहाल बसते हैं। पढ़ते हैं आगे बढ़ते हैं। आज भी हाशिए के समाज का भविष्य सार्वजनिक विद्यालयों में ही पुष्पित-पल्लवित हो रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी सार्वजनिक विद्यालयों के सम्पर्क में रहें। उन्हें बचाए-बनाए रखने के लिए सहयोग करें। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक शिक्षा में जो समस्याएं हैं उनका समाधान भी वहीं से आएगा। सार्वजनिक शिक्षा की भूमि को बचाए हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए साथी हमेशा शिक्षक ही रहते हैं। समाज के लिए ही व्यक्ति पैदा होता है। वह समाज के साथ चलना और उसके सामाजिक विकास में योगदान देता है। राकेश जुगरान ने कहा कि रचनात्मकता कोई अलग चीज़ नहीं है। शिक्षा में बदलाव समय के साथ आता है। शिक्षा ही इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना करने का साहत देती है। हम तार्किक तौर पर चीजों को समझने का अवसर भी शिक्षा देती है। समाज में चिन्तन करने वाले शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक ही समाज का समग्र विकास कर सकते हैं। समाज समग्रता से सृजनशील रहे। सकारात्मक रहे। इसके लिए बाधाएं हैं। रचनात्मकता बढ़े। इसके लिए सभी को प्रयास करने होगे। सभी छात्र, अभिभावक, शिक्षक की समझ ही रचनाशील समाज बना सकते हैं। अभी रटन्त प्रणाली पूरी तरह से खत्म नहीं हो पा रही है। रचनात्मकता का मूल्यांकन करने वाली समझ भी ज़रूरी है। अंकुर के साथी और बढ़े तभी रचनाशील समाज बढ़ेगा।

अंकुर के सचिव, साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली ने कहा कि यदि देहरादून जनपद की ही बात करें सात लाख बच्चे हैं जिनकों अंकों की प्रतिस्पर्धा से इतर मौलिकता, रचनात्मकता और हाथ के कौशलों की ओर ले जाए जाने की ज़रूरत है। पूरे उत्तराखण्ड की बात करें तो तीस लाख से अधिक बच्चे हैं जिन्हें रचनाशील और संवेदनशील बनाने के लिए सिर्फ और सिर्फ स्कूली पढ़ाई के भरोसे नहीं रहा जा सकता।

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शिक्षक एवं अंकुर के अध्यक्ष मोहन चौहान ने कहा कि विद्यार्थी आंदोलन से ही शिक्षा की खूबियों और खामियों की समझ बनी। यह भी महसूस होने लगा कि शिक्षा कैसी होनी चाहिए? यह सवाल परेशान करता रहा। जब सार्वजनिक शिक्षा में आए तो यह महसूस हुआ कि हर बच्चे को अच्छी और सम्पूर्ण शिक्षा हासिल हो। हम साथियों ने विभिन्न विद्यालयों में रहते हुए साझा गतिविधियों का करना चाहा। जिसमें मौलिकता हो। बच्चों को रचनात्मकता के अवसर मिले। बहुत सारी गतिविधियों के अवसर विद्यालय में ही मिलते रहे। पिछले बीस-पच्चीस सालों में जो विद्यार्थी अंकुर के सम्पर्क में आए, वह भी आगे चलकर समाज में सकारात्मक योगदान देते हैं।

अंकुर के साथी एवं शिक्षक सतीश जोशी ने कहा कि अंकुर का प्रकाशन का अनुभव शानदार रहा। बच्चों के साथ कहानी-कविता लेखन पर काम करने के बाद अंकुर पत्रिका का प्रकाशन निजी सहयोग से हो पाया है। यह बड़ी बात है।

इस अवसर पर दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम समन्वयक चन्द्रशेखर तिवारी ने कहा कि समाज की ओर से समाज के लिए यह शिक्षा विमर्श बहुत शानदार रहा। यह सोच, दृष्टि और विचार आगे बढ़े। यह हर क्षेत्र में हो। बच्चे ही देश के संवाहक हैं। उनकी सकारात्मकता के लिए रचनाशील शिक्षक आगे आएं।

इस अवसर पर संचालन करते हुए शिक्षक प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’ ने कहा कि आज ज़रूरत इस बात की है कि मनुष्यता बनी और बची रहे इसके लिए प्रयास किए जाने की ज़रूरत है। उन्होंने आयोजन के वक्ताओं का परिचय दिया। उन्होंने अंकुर की स्थापना से जुड़े साथियों का स्वागत किया। उन्होंने यह भी कहा कि सकारात्मक सोच का दायरा बढ़ना चाहिए। यह तेजी से बढ़ रहा है लेकिन अभी रचनाशील समाज की ओर हमें और भी बढ़ना होगा।

उप जिलाधिकारी ऋषिकेश शैलेन्द्र नेगी ने कहा कि सकारात्मक सोच के लोग आगे आएं। शिक्षा की समझ धीरे-धीरे आती है। साथियों के अनुभवों से विस्तार मिलता है। हम सबके के लिए अभाव और संघर्ष बहुत काम आता है। मार्गदर्शन से बदलाव आता है। हमें बच्चों के साथ काम करने की ज़रूरत है।

इस अवसर पर राजकीय इंटर कॉलेज, रणाकोट में बच्चों के साथ तैयार की गई ‘अंकुर’ पत्रिका का लोकार्पण भी हुआ। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में जनकवि अतुल शर्मा, नन्दकिशोर हटवाल, मुकेश नौटियाल, सत्यानन्द बडोनी, सुनीता मोहन, कीर्ति भण्डारी, अनीता बहुगुणा, श्रुति जोशी, सुंदर सिंह बिष्ट और डॉ. लालता प्रसाद सहित सैकड़ों छात्र, शिक्षक, अभिभावक, साहित्यकार आदि उपस्थित रहे।

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