एक खेत से दूसरे खेत में कूदते -फांदते, गांव के रास्ते व पथरीली पगडंडियों पर दौड़ते-भागते, मुठ्ठी बांध हथेली उल्टी कर रंग-बिरंगी मक्खी को पास-फेल, पास-फेल कर उड़ाते हुए बचपन की खट्टी-मीठी यादों को समेटे हुए शूरवीर रावत जी की उनके गांव के संस्मरणों पर सद्य प्रकाशित पुस्तक “चमकीली चादर पर मटमैले आखर” पुस्तक पढ़ने का सुअवसर मिला।
हम लोगों की पीढ़ी बिना समुचित साधनों और बिना किसी सहारे या कमजोर सहारे पर अपने पहाड़ के गांव छोड़कर मैदानी शहरों में आ बसी है और फिर यहीं की होकर रह गयी है। अपने साथ अपने पीछे छूटे हुए लोगों, अपने खेत -खलिहान, बाट-घाट, गांव-स्कूल की अनेक यादें मन-मस्तिष्क में संजोकर जी रहे हैं। ये यादें हमें कभी गुदगुदाती है, कभी हंसाती और कभी रुलाती भी हैं। जिन लोगों के पास लेखन का हुनर है वे अपनी लेखन कला से अपनी यादों को संजोते हुए साहित्य की अभिवृद्धि करते हैं । कालांतर में ये पुस्तकाकार संस्मरण साहित्य की धरोहर बन जाते हैं।
ऐसे ही हुनरदार लेखक शूरवीर रावत जी की लेखनी से टिहरी गढ़वाल के भिलंगना की खूबसूरत घाटी में बसे अपने गांव की स्मृतियों को संजोकर लिखी गयी उक्त पुस्तक में दादी की झुणकी की खनक से लेकर गांव की होली के रंग ही नहीं अपितु दीवाली के दियों की रोशनी भी झिलमिलाती है। ला ग्रेजुएट प्रधान जीत सिंह पंवार, मदननेगी का सौणू की यादों के साथ ही उम्मेद सिंह भाई की शरारत भी बसी हैं । चुलु की चटनी का न बिसरने वाला स्वाद भी चटखारें मार रहा है।
रोचक शैली में लिखी गयी यह पुस्तक पठनीय है, विशेषकर दूर शहरों में बसे हमारे प्रवासी भाई बंधुओं के लिए तो यह गांव की खुद बिसराने वाली किताब है। आज हमारे पहाड़ के गांव के गांव पलायन की मार झेलते हुए जन शून्य होते जा रहे हैं। इस पुस्तक में 37 शीर्षकों के अंतर्गत समेटी गयी गांव की स्मृतियों में पलायन का दर्द महसूस किया जा सकता है। पुस्तक पढ़ते हुए ये पंक्तियां जेहन में उपजती हैं-
ढू़ंढ रही हैं छाया/काया कहां खो गयी रेले में/परछाईं ही परछाईं हैं/लोग नहीं हैं मेले में।
किसके कंधों पर सिर रखें/किससे अपना दुखड़ा गाएं/किस खोए हुए को ढूंढें जिससे/लिपटें अपनी सुनाएं/छोड़ गए मंदिर, युग नायक/ छुपे हुए किस ठेले में।
अपने बचपन की यादों में खोकर लेखक ‘अपनों से अपनी बात—-‘ कहते हुए गजल सम्राट जगजीत सिंह की पंक्तियां याद कर लिखता है –
“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो/भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी/मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन—— ”
लेखक की भावनाएं अपने गांव से कितनी जुडी हैं, उनकी ये पंक्तियां बताती हैं- “किसी अन्यके लिए मेरा गांव मिट्टी पत्थर से युक्त मात्र एक गांव हो सकता है किंतु मेरे लिए तो यह मेरे सपनों, मेरे अरमानों, मेरी कामनाओं, मेरे जज्बातों का घर है—“
पुस्तक विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, 8 प्रथम तल, के सी सिटी सेंटर, डिसपेंसरी रोड़, देहरादून 248001 द्वारा प्रकाशित की गयी है।
140 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 195/ रूपए मात्र है।
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