इतिहास के अध्येता वरिष्ठ पत्रकार राजू गुसाईं ने पिछले हफ्ते अपनी दो सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जानना चाहा था की 1938 में टिहरी गढ़वाल के वे तीन गांव कौन से थे जो नीमा नाम की किसी नदी में बाढ़ के कारण बह गए थे।
गुसाईं जी ने उस दौरान वेस्टर्न दिल्ली प्रेस और फिर राइटर के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबरों का हवाला दिया। कई साथी जानकारी जुटाने में जुटे। भूगर्भशास्त्री प्रोफेसर एमपीएस बिस्ट जी ने भी बताया कि हां ऐसी घटना हुई थी लेकिन खबरों में नीमा या नामी नदी का उल्लेख होने से कंफ्यूजन है।
फिर स्टेट गजट से जलकुर नदी का खुलासा हुआ और उन तीन गांव का भी जहां बाढ़ से नुकसान हुआ था। दरअसल भूस्खलन और बादल फटने की घटना जलकुर नदी में भी नहीं हुई थी। जलकुर की एक सहायक नदी है रावत गांव का गधेरा जो रौणद रमोली में बहता है और ठीक लम्बगांव के नीचे पिपलोगी गांव में जलकुर नदी से मिल जाता है।
24 व 25 अगस्त 1938 को भारी बारिश हुई और 25 अगस्त की सुबह 10:00 बजे रावत गांव के ऊपर से भारी बारिश के साथ भूस्खलन हुआ और बड़ी मात्रा में मलवा रावत गांव, बिजपुर गांव और पिपलोगी की गांव में भारी नुकसान कर गया। रावत गांव में 7 लोग बह गए। यह भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर आरसी रमोला जी का गांव है। फिर बिजपुर गांव में तबाही हुई। यह पूर्व विधायक फूल सिंह बिष्ट जी और हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी गोविंद बिष्ट जी का गांव है।
पिपलोगी गांव में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ पीपलोगी और बिजपुर गांव के पूर्वज एक ही हैं। संभवतः उस समय रावत गांव की गाड के मुहाने के निकट कुछ दुकानें थीं। क्योंकि दो दुकानों के बहने और उनके मालिक हरि सिंह व वीर सिंह और 7 अन्य के बहने का उल्लेख खबर में है, जबकि ठाकुर सरन सिंह और उनके दो नौकर भी बह गए थे। वीर सिंह और हरी सिंह किसी सुजुरु गांव (शायद सुजड़ गांव) के थे और उनकी यहां पर दुकान थी।
अब बात आती है कि नौघर गांव में कैसे नुकसान हुआ। क्योंकि नौघर जलकुर नदी के किनारे कुछ ऊपर है। रावत गांव, बिजपुर और पीपलोगी जलकुर नदी के उस पार और नौघर जलकुर नदी के इस ओर। लम्बगांव की तरफ। दरअसल, जब रावत गांव की गाड से भारी मलवा बहकर आया तो पीपलोगी में जलकुर नदी का प्रवाह रुक गया और झील पीछे की तरफ नौघर गांव की तरफ फैल गई। और फिर कुछ ही समय में जलकुर नदी के पानी के भारी दबाव में टूट भी गई। इससे नौघर पीपलोगी और फिर निचली घाटी में बसे अन्य गांव बौंसाडी़, चौधार, भैंगा आदि गांव में भी नुकसान हुआ होगा।
खास बात यह भी कि 25 अगस्त को तबाही हुई 31 अगस्त को अखबारों में खबर छपी। एक सितंबर को रियासती सरकार ने जांच शुरू की और 25 सितंबर को पूरे नुकसान की रिपोर्ट भी तैयार हो गई। टिहरी रियासत के चीफ सेक्रेटरी ने रियासत के पोलिटिकल एजेंट पंजाब हिल स्टेट शिमला को जो रिपोर्ट भेजी उसमें नुकसान का पूरा ब्योरा है। 32 लोग व 8 मवेशी बहे। 53 घराट और 30 एकड़ सिंचित भूमि नष्ट हुई। नुकसान ऊपरी घाटी के चार गांव सहित निचली घाटी में भी हुआ होगा। एक महीने के भीतर नुकसान का बुरा तैयार हो गया। अब सोचिए एक महीने बाद भी क्या धराली में हुए नुकसान की अभी पूरी रिपोर्ट क्या आपके पास है।
1938 में टिहरी तक भी सड़क नहीं आई थी। प्रताप नगर में तैनात एसडीओ शूरवीर सिंह पवार प्रभावित क्षेत्रों में गए और रिपोर्ट तैयार की। यह वही शूरवीर सिंह पंवार हैं, जिन्हें टिहरी के पिछली पीढ़ी के लोग पुराना दरबार के दादाजी ठाकुर साहब के नाम से जानते हैं। तब 20 से 22 साल के रहे होंगे। बाद में टिहरी महाराज के निजी सचिव भीरहे हैं और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में उप जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी भी तैनात रहे। इतिहास के अच्छे जानकार और लेखक। शायद उनके संग्रहालय देहरादून में जो अब उनके पोते ठाकुर भवानी प्रताप सिंह संचालित करते हैं में कुछ और जानकारी होगी। शूरवीर सिंह जी टिहरी से प्रतापनगर या प्रतापनगर से प्रभावित क्षेत्र में पैदल ही गए होंगे या घोड़े पर।
उस समय भी इस घाटी में 30 एकड़ सिंचत भूमि और 53 घराट बह गए थे स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गई होगी। जल्दी ही अपने पुरुषार्थ के बल पर इस घाटी के लोग फिर खड़े हो गए। आज भी गांवों में लोग हैं। कुछ घराट आज भी चलते हैं। कुछ सिंचित भूमि आपदा से हमेशा के लिए नष्ट हुई लेकिन शेष पर आज भी खेती हो रही है। सिंचित भूमि बंजर बहुत कम है।
पिपलोगी में जलकुर नदी पर दो पुल बने हैं लम्बगांव से बिजपुर, रावत गांव होते हुए नाग पनियाला और भैंतला तक रोड जाती है। लेकिन एक बात अब भी बहुत स्पष्ट नहीं है कि रावत गांव के ऊपर वह कौन सी जगह होगी, जहां बादल फटने से लैंडस्लाइड हुआ। गूगल अर्थ के मैप पर कोई ऐसा बड़ा स्पाट दिखाई नहीं दे रहा। दूसरा बिजपुर गांव के निकट एक स्लाइड है जो रावत गांव की गाड तक पहुंचता है। इसका मलवा भी नीचे आया होगा, वहां पर एक विशाल पत्थर मौजूद है।
बिजपुर गांव के हमारे साथी पत्रकार गोविंद बिष्ट बताते हैं कि इस आपदा में उन्होंने सुना था कि मैताब सिंह पुत्र मुखमू सिंह (दादाजी) भी बह थे जिनकी पत्नी गोला देवी टिहरी रियासत के जेल दरोगा मोर सिंह नेगी जी की बहन थी उनके गांव के ठाकुर मातबर सिंह बिष्ट ठेकेदार भी इस दौरान या कुछ बाद में शायद आपदा की चपेट में आए थे और उन्हें आज भी गांव में देवता के रूप में पूजा जाता है।
इस आपदा में रावत गांव की ओर से भैड़ देवता की मूर्ति शायद बहकर पिपलोगी आ गई थी। अब पीपलोगी में भी मंदिर बनाया गया है। पोखरी गांव की शिक्षिका राजकुमारी रावत ने बताया कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना कि नौघर के निकट जब झील बनी तो बाद में उनके गांव के 15 वर्ष के एक युवक अमर सिंह भी नहाते हुए डूब गए थे। इस भेळ रौ में डूबना बताया जाता है। ऐसी बहुत सी स्मृतियां जनमानस में अब भी हैं। यह भी कहा जाता है की बादल अंधेरीभेळ में फटा था। संभवतः यह जगह रावत गांव के ऊपर दिन्याळी देवी मंदिर के पास होगी। आपदा अध्ययन की दृष्टि से इनका संकलन और शोध किया जा सकता है।
एक बात और समझने की है कि रावत गांव के मुहाने पर जलकुर नदी का प्रवाह वैसे ही रुका, जैसे हाल ही में हर्षिल में तेलना गाड के मुहाने पर गंगा नदी का और स्याना चट्टी में कुपड़ा गाड के मुहाने पर यमुना नदी का प्रवाह रुका। अंतर सिर्फ यह है कि कुपड़ा व तेलना गाड के जल ग्रहण क्षेत्र में आबादी प्रभावित नहीं हुई क्योंकि उस तरफ कोई गांव नहीं हैं। धराली की बात करें तो खीर गंगा से गंगा का प्रवाह रुकते- रुकते बचा है। धराली की तरह जलकुरर के पिपलोगी में उतनी अधिक आबादी नहीं थी फिर भी भारी नुकसान हुआ। यह नुकसान सुबह 10:00 बजे के बाद हुआ। सोचिए, अगर रात में बाढ़ आई होती तो नुकसान विशेषकर जन और पशु हानि दोगुनी हो सकती थी ।
फोटो साभार – गूगल अर्थ। सीमांकन और मानचित्रीकरण मेरे द्वारा किया गया है।
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