Sunday, September 13, 2026
Home टिहरी गढ़वाल एक तपस्विनी की खानाबदोश जीवन यात्रा, आखिर थम गई .

एक तपस्विनी की खानाबदोश जीवन यात्रा, आखिर थम गई .

एक तपस्विनी की खानाबदोश जीवन यात्रा, आखिर थम गई .

By – Mahipal Negi

टिहरी के दो प्रतिष्ठित बहुगुणा और नौटियाल परिवार। अम्बादत्त बहुगुणा और नारायणदत्त नौटियाल, रियासत काल में  अधिकारियों के रूप में नियुक्त थे। लेकिन दोनों के घर में विद्रोही संतानों ने जन्म लिया।

सुंदरलाल बहुगुणा और विमला नौटियाल। इन दोनों के पिता रियासत काल में बड़े अधिकारी रहे। सुंदरलाल बहुगुणा आजादी की लड़ाई में जेल गए और विमला नौटियाल सरला बहन की शिष्य बन लक्ष्मी आश्रम कौसानी पहुंच गई।

विमला नौटियाल के दो भाई बुद्धि सागर और विद्यासागर भी राजा की जेल में रह चुके थे और प्रखर साम्यवादी हुए। सुंदरलाल बहुगुणा लाहौर से पढ़कर लौटे और टिहरी में कांग्रेस के बड़े नेता के रूप में उभरने लगे।

1950 का दशक। 1955 – 56 की बात होगी। सुंदरलाल और विमला जी के रिश्ते की बात चली तो विमला जी ने शर्त लगा दी कि राजनीति छोड़नी होगी और दूरस्थ गांव में जन सेवा का संकल्प लेना होगा। तब विमला जी की उम्र 22 – 23 साल और सुंदरलाल जी की 27 – 28 साल की रही होगी।

फिर से समझिए दोनों प्रतिष्ठित परिवारों और रियासत काल में राज अधिकारियों के बच्चे थे। गंगोत्री राजमार्ग पर दोनों के गांव मरोड़ा और मालदेवल थे। निकट ही टिहरी शहर था। मतलब कि रिश्ता होते ही राजनीति छोड़ टिहरी से दूर गांवों में जाकर जनसेवा शुरू करनी थी। दोनों ने संकल्प लिया, पिट्ठू बांधा और टिहरी से 40 किलोमीटर दूर पैदल चलकर सिलियारा गांव में एक छोटा सा आश्रम बनाया। तब टिहरी से पैदल आना जाना ही होता था। सड़क वहां 1960 के दशक में गई।

यह दोनों के सहजीवन की शुरुआत थी। दोनों युवा थे । राज अधिकारियों के बच्चे थे। राष्ट्रीय राजमार्ग पर गांव था, लेकिन सब छोड़कर पैदल गांव – गांव और जंगल जंगल घूमने लगे। बालिका शिक्षा, ग्राम स्वराज,चिपको, शराब बंदी, टिहरी बांध का आंदोलन। कभी स्थाई रूप से एक जगह बसे ही नहीं।

इनकी खानाबदोश जिंदगी देख बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा तो किसी और ने ही लिया था, जिस बात को बहुत लोग नहीं जानते। जीवन के उत्तरार्ध में टिहरी बांध के आंदोलन में गंगा के तट पर जो घाट जैसा ही था, 15 साल और गुजार दिए। सुंदरलाल को सुंदरलाल बहुगुणा बनाने का काम जिस युवा तपस्विनी विमला ने किया, आज प्रातः ही उन्होंने अंतिम सांस ली।

मेरे लिए यह हमेशा ही विस्मित करने वाला रहा कि कैसे दो प्रतिष्ठित खाते – पीते रियासत भर में पहचान वाले परिवारों के दो बच्चों ने कठिन खानाबदोश जीवन चुना और आजीवन उसके प्रति संकल्पबद्ध रहे। आलोचनाएं असहमतियां जरूर बहुतों की रही।

Vimla bahuguna
Vimla bahuguna

मेरे लिए यह भी अचम्भे की बात है कि कैसे 22 – 23 और 27 – 28 साल के नौजवान अपने हवेली जैसे घरों को छोड़कर जब एक बार बाहर निकले तो कभी भी स्थाई घरों में वापस नहीं  जा पाए। जिन्होंने सिलियारा आश्रम और टिहरी के गंगा हिमालय कुटी में उनकी झोपड़ी देखी होगी, वे ठीक-ठाक आकलन कर सकते हैं। सुंदरलाल जी और विमला जी दोनों का मूल्यांकन हमेशा साथ-साथ ही किया जा सकता है।

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