टमाटर में दैहिक विकार Physiological Disorders
@डा० राजेंद्र कुकसाल।
1 ब्लासम ड्राप – फूलों का झड़ना –
अत्यधिक तापमान एवं सूखे की अवस्था में यह विकार उत्पन्न होता है, जिसके कारण टमाटर में परागण की समस्या उत्पन्न होती है एवं फूल सूख कर झडने लगते हैं।
प्रबंधन – गर्मियों के मौसम में नमी की कमी न होने दें। पौली हाउस में तापमान 30° सैन्टीग्रेड से ऊपर न जाने दें।

2 फलों का फटना –
टमाटर में फलों का फटना एक आम समस्या है, जिसके कारण किसानों को बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल पाता। टमाटर के फलों में दो प्रकार की फटने की समस्या आती है एक फल के ऊपरी भाग में डंठल के चारों ओर तथा दूसरी टमाटर के ऊपरी भाग से नीचे की ओर प्रथम प्रकार के फटने की समस्या अधिक पाई जाती है।
प्रबंधन -इसकी रोकथाम के लिए खेत में लगातार नमी बनाये रखना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त तीन बार 0.3 प्रतिशत बोरेक्स (3 ग्राम बोरेक्स प्रति लीटर पानी) का छिड़काव फल लगने के समय इसके 15 दिनों के बाद तथा जब फल पकने शुरू हो जाए तब किया जाना चाहिए।
3 सनस्केल्ड –
यह एक दैहिक विकार है जिसमें फलों पर पीले या सफेद छाले उभर आते हैं। इसकी रोकथाम के लिए तापमान को 24 ° सेन्टिग्रेड .से अधिक नहीं बढ़ने देना चाहिए। इस समस्या का मुख्य कारण फलों पर गर्मी के मौसम में सूर्य के अधिक प्रकाश पड़ने पर फलों की त्वचा का जल जाना है जिससे फलों में लाल रंग बनने की क्रिया समाप्त हो जाती है तथा फल पीले, सडे व छाले युक्त दिखाई पड़ते हैं।

प्रबंधन -इसकी रोकथाम के लिए फलों को सूर्य की पड़ने वाली सीधी किरणों से बचाना चाहिए। ऐसी किस्मों का प्रयोग किया जाना चाहिए जिनमें पौधों की वानस्पतिक वृद्धि/पत्तों की बढ़वार अच्छी हो तथा फलों को पत्तियों के नीचे छाया में रख कर अधिक तापमान के कारण होने वाले विकार से बाचाया जा सके।
4 कैटफेसिंग –
अधिक ठंड व कम तापमान के कारण कई बार फूलों में पर-परागण के कार्य में किसी प्रकार का अवरोध आ जाने के कारण फल की आकृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अधिक ठंड में फलों की आकृति में बदलाव आ जाता है जिसके कारण कई फल तो चोचदार बन जाते हैं जो देखने में ठीक नहीं लगते हैं।
प्रबंधन -कैटफेसिंग से बचने के लिए पौधों को ठंड से बचाना आवश्यक है। छोटे फलों के आकार वाली प्रजाति का उपयोग करें।मलचिंग के प्रयोग करने से कैटफ़ेस से बचा जा सकता है।
5 पफीनैस(खोखलापन) –
तापमान के उतार चढ़ाव एवं नाइट्रोजन की अत्यधिक मात्रा देने के कारण यह विकार उत्पन्न होता है। फलों के आकार में गिरावट आने से फल बहुत छोटे बन जाते हैं। ऐसे फल पिलपले व खोखले से दिखाई पडते हैं। फलों में पानी की मात्रा में भी कमी आ जाती है तथा फलों का भार कम हो जाता हैं। ऐसे फल उन पौधो पर लगते हैं जहां भूमि की तैयारी करते समय खेत के कोने ऊँचे रह जाते है तथा पौध रोपाई के पश्चात् ऐसे कोने व असमतल भूमि में पौधों की जड़ों को सीमित पानी मिलता है तथा पौधों की बढ़वार में भी कमी आती है। ऐसी अवस्था से पौधों को कम पानी मिलने के कारण फल का फैलाव नहीं हो पाता तथा फल खोखला सा बन जाता है व थोड़ा सा दबाने पर पिचक जाता है।
प्रबंधन -पफीनेस से बचने के लिए खेत की तैयारी करते समय सुहागा लगा कर भूमि को एक समान व समतल बना कर मेढो को बनाना चाहिए। नाइट्रोजन की उचित मात्रा का प्रयोग करें।
6 बलोज़म इड रोट-
टमाटर का ब्लॉसम-एंड रॉट एक शारीरिक रोग है, इस रोग में टमाटर के फल के फूल के सिरे पर एक बड़ा, भूरा से काला, सूखा, चमड़े जैसा क्षेत्र होता है। यह विकार उन स्थानों पर अधिक मिलता है जहां पर भूमि में कैल्शियम तत्त्व की कमी पाई जाती है। कभी-कभी नाइट्रोजन की अत्यधिक मात्रा होने के कारण भी यह विकार होता है।पौली हाउस में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है।

पौधे भूमि से पानी द्वारा पोषक तत्वों को अवशोषित करते हैं खेत में नमी न होने पर अधिक तापमान या अन्य कारणो से पौधे आवश्यकता अनुसार कैल्सियम ग्रहण नहीं कर पाते जिससे फलो में ब्लौसम एण्ड रौट दिखाई देता है।
प्रबंधन -कैल्शियम युक्त उर्वरकों का उपयोग करें।भूमि में हमेशा नमी बनाये रखें इसके लिए समय समय पर सिंचाई करते रहें साथ ही मल्चिंग करें।







