Sunday, September 13, 2026
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जौनसारी भाषा में “ण” का सर्वाधिक प्रयोग क्यों

जौनसार बावर के इन्द्रौली गांव के दो बुजुर्ग लोग काम से वापस आते हुए घर के लिए सन् 1945ई० के समय की फोटो

Jaunsar bavar
Jaunsar bavar

आज बात करते हैं पुराने जौनसार बावर के बारे में कैसा था। पहले के जमाने के लोग जब घर बनाते तो पत्थर और लकड़ी का बनाते थे क्योंकि जौनसार बावर एक पहाड़ी इलाका है और यहाँ ठंडा पड़ जाता था क्योंकि सहिया तक बर्फ पड़ती थी। पहले और जब घर बनाते तो बड़े बड़े पेड़ काट के लाया करते थे। और जो घर बनाते थे वह तीन मंजिल बनाते थे पहली मंजिल जानवरों के लिए और दूसरी मंजिल आपकी अनाज के बनाई जाती थी जिसको ओबरा कहाँ जाता है ।क्योंकि अनाज बहुत हुआ करता था जौनसार बावर में जैसे आपका जह , गेंहू ,कोदू , कोदो, टेटे (मक्की) आदि रखने के लिए बनाई जाती थी और और समान के लिए ही जिसके लिए जौनसारी ओबरा बोला जाता था और तीसरी मंजिल जिसमे आपके आपके बड़ो बितर फिर मोछेली, रसोई जिसमें खाना बानाया जाता था और नहाने के लिए बनाया जाता था। और जूते रखने के लिए भी और छत में पत्थर के पीस बनाते थे जो कि यह बहुत दूर से लाने पड़ते थे क्योंकि इस घर बनाने में बहुत महनत लगती थी।और दरवाजे भी बहुत छोटे बनाते थे और आपके पहले के लोग सदियों में ज्यादा ऊन के कपड़े ज्यादा पहनते थे क्योंकि ठंडा रहता था । और जो खानपान था वह बहुत सिंपल हुआ करता था। जैसे की आपका लेमड़ो बहुत खाते थे इसको चौलाई को जान्दरे में दलकर पानी के साथ तब तक घुमा घुमाकर पकाते थे और इसे घी दूध या मट्ठे के साथ जो की जौनसार बावर में इसक़ छाश बोलते हैं इसके साथ खाया जाता था और दूसरा आपका सातू जो अधिकतर दो प्रकार के होते हैं जो यह दो चीजों के साथ खाते थे। एक आपका मट्ठा और दूसरा आपका पानी के साथ खाते और साथ मे चुल्लू की चटनी होती थी । और बहुत चीजे थी और पहले जौनसार बावर के लोग अगर कुछ अन्य समान लाना है तो तो चकराता , या कालसी पैदल जाता था जिसके पास घोड़ा होता था वह घोड़े पर समान लाता था जो लखवाड़़ के इलाके में थे वह मंसूरी जाते थे क्योंकि उन लोगों को नजदीक पड़ता था । समान के लिए बाकी कालसी, चकराता । बताते है कि जो कन्दाड़ गांव है वह बर्फ के नीच दब गया था और सारे लोग इन्द्रौली गांव में आ गए थे। रहने इतनी बर्फ पड़ी थी और पहले जो देवता के दियाण होता था जैसे कि वर्मा होते वह हर एक परिवार से सुबह शाम एक, एक रोटी लेता था ।जो जौनसार बावर में पाड़छो कहते है और इन्द्रौली, कन्दाड़ के तरफ इतधी बर्फ पड़ती थी जो रोटी लेने आता था। वह खिडकी से मांगता थे और पहले नहाने के लिए साबुन नहीं होते थे ।पहले और चीज होती थी। और जो महिला होती थी वह अपने बाल जो आग की राख होती थी। उसे दो लेती थी जो की इससे उकरे पड़ते थे। यह इतने छोटे छोटे होते थे की बहुत कम दिखाई देता था और जब कोई मोरोज दिवाली बिस्सू होते थे तो छानी के लोग वह शाम चार बजे के बाद छानी से गांव आते थे घर आके रात को गाना लगाते थे और यह एक महीने तक चलता था। और पहले चांदी ज्यादा पहनते थे शादी त्यौहार में सोना इतना नहीं था जौनसार बावर में पहले नाथ बड़ी होती थी और थूगल भी होते थे अब शायद से अब यह बहुत कम घर में मिलेगी चांदी पहले के लोग बहुत ताकतवर होते थे। ऐसे भी मर्द थे जो घोड़ा उठा लेते थे जंगल से और घर तक लाते थे। क्योंकि पहले अच्छा खानपान और सिंपल था और पहले के जमाने में लड़की की शादी जल्दी ही करा देते थे किसी की पांच साल किसी की 15 साल में करा देते थे और पहले पांडव प्रथा होती थी। यह प्रथा 1990 के बाद खत्म हो गई थी ।
पहले घर में एक ही स्याणा होता था । वह ही सब व्यवस्था करता था। और उसका कहना परिवार के सभी लोग कहना मानते थे। स्याणा पहले ही काम बता देता था। की यह काम यह व्यक्ति करेगा वह काम यह व्यक्ति और त्योहार में राशन आ सामान और बच्चों महिलाओं और मर्दों के लिए कपड़ा भी स्याणा लाता था बल्कि घर परिवार खूमणी , रिश्तेदारी तक सब देखते थे,
जौनसार बावर की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार किसी भी व्यक्ति के प्रति जन्म से मृत्यु तक समाज की पूरी-पूरी सहभागिता है। यहाँ पर दूसरे की सहायता निःशुल्क या निष्पक्ष करने की सामाजिक मान्यता है। जैसे यदि किसी का खेती का काम पिछड़ जाए तो सारा गाँव आकर उसका काम निपटा देता है। यदि किसी के यहाँ शादी-विवाह या कोई उत्सव हो तो लकड़ी इकट्ठा करना, खाना बनाना, परोसना, बर्तन साफ करना, घरों को शादी के लिए, मेहमानों के लिए प्रदान करना, सबको सुलाने की व्यवस्था सामूहिक रूप से की जाती थी। इसी प्रकार यदि कोई मकान बना रहा है, तो लकड़ी के फट्टे (दोगा) जो बहुत दूर जंगल से लाने होते थे, उसके लिए सारा गाँव जाकर ले आता था। घास काटना हो तो उसे भी सामूहिक रूप से किया जाता था। यदि कोई भारी सामान हो जैसे-बड़ी लकड़ी, गुतु या बड़ा पत्थर या पटाल उसके लिए सारा गाँव इकट्ठा होकर जाता था। भारी चीज को लकड़ी में बांधकर उठाकर उस आदमी के घर पहुँचा देते थे। इस सामूहिक भार को साँग कहते हैं। यदि गाँव में कोई बीमार पड़ जाए तो मरीज को पीठ में चिकित्सालय पहुँचाते है। यह श्रमदान होता है, यदि किसी के पास पैसा ना हो तो आपस में इकट्ठा कर लेते हैं। यदि दिल्ली, चंडीगढ़ आदि मरीज को पहुँचाना हो तो लोग साथ चले जाते हैं व हर प्रकार की मदद करते हैं।
यदि दुर्भाग्य से किसी के यहाँ मृत्यु हो जाती है तो लोग गाँव व खत के उसके दाह संस्कार में जाते हैं, व लकड़ी अपने कंधों पर रखकर श्मशान पहुँचा देते हैं। यही नहीं औरतें जब उस घर में शोक
प्रकट करने को जाती हैं तो आटा-चावल साथ लेकर जाती हैं, जो उस परिवार को स्वीकार करना होता है, यहाँ तीसरे पांचवें या नौवें दिन शोक खोल दिया जाता है। बावर में अधिकतर उसी दिन शोक खोल दिया जाता है।
खत के लोग तीसरे दिन शोक प्रकट करने को आते हैं। वह भी साथ में अनाज लेकर आते हैं। रिश्तेदार रस्म पगड़ी जिसे (गटाउणों) कहते हैं, उसमें तेल व अनाज लाते हैं। परिवार व बिरादरी के लोग गटाउणें तक तेल का उपयोग नहीं करते हैं।

जौनसार बावर के सामाजिक ढाँचे में दहेज की अनिवार्यता ना होना, पुनर्विवाह, विधवा विवाह भी यहाँ के समाज की अच्छी सोच का परिचय है। किसी भी दुःख या सुख समाज के नौकरी पेशा लोग हों या राजनैतिक या उच्च या मध्य परिवारों के व्यक्ति हों, सारी कड़वाहटें भूलकर इकट्ठे होकर सहभागी हो जाते हैं। यही हमारे समाज का बड़प्पन व ताकत व एकता है। आज तक भी यह आधुनिकता व अन्य कारण हमारे समाज के बंधन को नहीं तोड़ सका है। महासू देवता इसे भविष्य में भी ऐसा ही रखे यह कामना है। जौनसार बावर में परिवारों को जातियों से नहीं, बल्कि परिवार के आदि पुरुष के नाम से जानते हैं। उदाहरण के लिए जैसे नैन सिंह रावत बुल्हाड़ के परिवार को जमनाण बुलाते हैं। पंडित माधो राम के परिवार को मदियाईक। परिवारों को इस तरह बुलाने का रिवाज सिरमौर, जुब्बल आदि हिमाचल के क्षेत्रों में भी है। इन तीनों क्षेत्रों में अन्त में ण-क-टा लगाया जाता है।
जौनसार में सीमा (बेनाव गाड) तक ण का उपयोग होता है। जैसे- झमनाण, गजियाण, मंगाण तथा बावर में बेनाव के ऊपर क का उपयोग होता है जैसे-मदियाईक, गजियाईक और सिरमौर, जुबल, हिमाचल में टा जैसे-जिनाटा, बाराहटा, जिन्टा आदि का उपयोग होता है।

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