सीरगाड़ के महर ठाकुर पृथ्वी थिएटर में
@Laxaman singh Batrohi

मेरे लिए यह एक दिवास्वप्न जैसा था. हिंदुस्तान के एक अनजाने इलाके की कहानी हिंदुस्तान के सबसे बड़े नाटक थिएटर में प्रस्तुत की गई. अपने इलाके में वर्षों तक किसी कोने में पड़ा हुआ उपन्यास एकाएक राष्ट्रीय फलक पर चर्चा के केंद्र में आ गया. ‘महर ठाकुरों का गाँव’, 1974 में दिल्ली के राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उपन्यास को मुंबई के फिल्म और नाट्य-जगत के जाने-माने अभिनेता और निर्देशक प्रमोद पाठक ने पूरे व्यावसायिक ढंग से दो घंटे के नाटक के रूप में प्रस्तुत किया. पहाड़ी लोक-संगीत और वाद्य-यंत्रों के मूल को सुरक्षित रखते हुए पहाड़ी समाज के सौन्दर्य और अंतर्विरोधों को इतने विस्तार से संभवतः पहली बार राष्ट्रीय रंगमंच पर प्रस्तुत किया गया. इससे पहले पिथोरागढ़ में मृगेश पांडे के निर्देशन में और नैनीताल में हरीश राणा ‘बाबा’ तथा मंजूर हुसैन के द्वारा युगमंच के बैनर तले इसे छोटे नाटक के रूप में प्रस्तुत किया गया था. दोनों ही बार प्रस्तुतियाँ बहुत सराही गई थीं.
21 मार्च के छह बजे वाले शो में पृथ्वी थिएटर हाउस फुल था. चार बजे के आसपास हरी मृदुल मिलने आए, उन्होंने टिकट नहीं ख़रीदा था, प्रमोद से कहकर उनके लिए पास की व्यवस्था की. इससे पहले दर्जनों साहित्यकार और कलाप्रेमी एडवांस में टिकट ले चुके थे और नाटक के बाद मिले. प्रसिद्ध लेखक अनूप सेठी सपत्नीक और मेरी पुरानी छात्राएँ रेनू अग्रवाल, रीना पन्त के अलावा लता रामचंद्रन और मेरी भतीजी रेखा तथा दामाद विक्रम सिंह भी मौजूद थे. यह फोटो विक्रम ने ही खींचा है जो आई. आई. टी. मुंबई में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं.
नाटक में कुल पैंतीस-चालीस कलाकार हैं. खास बात यह है कि इनमें पहाड़ी मूल का सिर्फ एक अभिनेता है, सतवाल, जो संयोग से हमारे गाँव छानागाँव के पास ‘सत्यों’ का ही है. मगर कुमाउनी का जो सहज और स्वाभाविक उच्चारण सभी कलाकारों ने किया, वह देखते बनता है, पहाड़ के लोगों के लिए भी यह एक मिसाल है. खुद प्रमोद पाठक भी पहाड़ी मूल के नहीं हैं इसके गीतकार नंदराम आनंद और आभा सिंह, कुलविंदर बक्शीश तथाअवंतिका गुप्ता की सॉंग कौरियोग्राफी, केतन चौधरी का संगीत, सेट-निर्माता साईश पड्नेकर, रिया महेश्वरी के कॉस्टयूम और माया शर्मा के द्वारा पोस्टर डिज़ाइन के अलावा परदे के पीछे मोनू शर्मा, डॉ. सोनल महलवार, और प्रिंस मिश्रा जैसे युवा कलाकारों की प्रतिभा देखते ही बनती है. इनमें से बहुत कम युवाओं ने अभी पहाड़ देखे हैं. मुंबई के इस सबसे बड़े रंगमंच पर पहाड़ का खिलना किसे गौरवान्वित नहीं करेगा!
हरदा शास्त्री, परतिमा, इजा, घुरूबू, तुलदा, गोधनियाँ, थोकदार, दुलप पधान, डंगरिया आदि चरित्रों को निमेश मेहता, कुलविंदर बक्शीश, दीपक सोमालकर, शीतल आर, माया शर्मा, आदित्य गौड़, शशांक शुक्ला, राहुल राघनी, अंजलि सिंह, मुस्कान अग्रवाल, नरेन कुमार, विक्की दत्त, भूषण शिंपी, सुहेल खान, विक्की सतवाल, वंश सभरवाल, अभिषेक जायसवाल, साहिल वर्मा, आदि युवाओं ने कुमाउनी भाषा और जन-जीवन को मानो जीवंत कर डाला.
नाटक देश के कुछ बड़े शहरों में जाएगा और कोई ठीक प्रायोजक मिला तो उत्तराखंड में भी आयेगा. टीम बड़ी है, जाहिर है कि खर्चा भी बड़ा होगा, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि युवा रंगकर्मी इस दिशा में पहल करेंगे. मुंबई के पहले दिन के दोनों शो हाउस फुल थे और प्रमोद ने बताया कि दूसरे दिन के पहले शो में करीब ढाई सौ और दूसरे में डेढ़ सौ दर्शक आये. कई लोगों ने रूचि दिखाई और मीडियाकर्मियों ने इस पर लिखने की बात कही. प्रेस टिप्पणियाँ अभी आई नहीं हैं, हालाँकि स्थानीय अख़बारों में में विज्ञापन प्रकाशित थे.







