उत्तराखण्ड में वर्षा और बरसात का चक्र
By – Chandrashekhar Tewari
उत्तराखण्ड का पूरा क्षेत्र मानसूनी जलवायु प्रदेश में आता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की हवाओं से यहाँ बहुत वर्षा होती है। प्रदेश की निचली शिवालिक श्रेणियों की स्थिति से मानसूनी हवाओं को उपर उठने में मदद मिल जाती है। इन हवाओं का आरोहण होता है और शीतलन की प्रक्रिया होती है तापमान में कमी आ जाने पर संघनन की प्रकिया से घने बादल बनने लगते हैं। इन्हीं बादलों से जुलाई व अगस्त माह में प्रदेश के विभिन्न भागों में तीव्रता के साथ वर्षा होती है। शिवालिक भाग में सबसे अधिक वर्षा की मात्रा दिखायी देती है। उत्तर दिशा को बढ़ते रहने से बादलों की वर्षण क्षमता में धीरे-धीरे कमी आने लगती है। महान हिमालय के बाद के वृष्टि छाया प्रदेश में तो बहुत ही कम वर्षा होती है। दक्षिण में तराई-भाबर व गंगा के मैदानी भागों में भी अपेक्षाकृत सामान्य से निम्न वर्षा होती है।
उत्तराखण्ड में सर्वाधिक वर्षा जून से सितम्बर के मध्य में होती है। इस अवधि में दून व शिवालिक व उसके समीपवर्ती भागों में 160 सेमी. से अधिक बारिश होती है। जबकि लघुहिमालय के निचले भागों व तराई में 60 से 120 सेमी. के करीब तथा महान हिमालय के दक्षिणवर्ती ढालों में 60 सेमी. से कम वर्षा होती है। जनवरी व फरवरी में प्रदेश में 7.5 से 10 सेमी. बारिश तथा मार्च से मई के मध्य 5.0 से 20 सेमी. के बीच बारिश होती है। सितम्बर के बाद वर्षा की मात्रा व उसके मिजाज में बदलाव आने लगता है और अक्टूबर से दिसम्बर तकस्थानीय भौगोलिक कारणों से बारिश होती है। इस अवधि में प्रदेश में बहुत ही कम वर्षा यानि 5.0 से 7.5 सेमी. के आसपास होती है।

दिसम्बर से फरवरी तक लघु हिमालय की ऊँची पहाड़ियों तथा महान हिमालय के बुग्यालों व उच्च पर्वत शिखरों में सामान्य हिमपात होता है। दिसम्बर से फरवरी माह तक प्रदेश के लघुहिमालय क्षेत्र के कई पर्वत शिखर जैसे गागर, ध्वज शिखर, मुनस्यारी, शामा,भटकोट, मनाघेर, भड़सार, सुक्खी, ख़िरसू , मोरियाना टॉप,बिनसर, मुक्तेश्वर, धनोल्टी, काणाताल, ग्वालदम, मौरनौला, देवस्थल, देववन, चकराता, भराड़ीसैण, दूधातोली, शिखर-भनार सहित कई अन्य ऊँची पहाड़ियां बर्फ से लकदक हो जाती हैं। इनमें कभी-कभार 3-4 फुट तक भी बर्फ गिर जाती है। प्रदेश के पर्वतीय जनमानस में एक पुरानी कहावत प्रचलन में रहती है – ‘ह्यून हिमाल और चौमास माल’ जिसका सामान्य अर्थ है कि यहां शीतकाल ‘ह्यून’ की बारिश हिमालय यानि उत्तर दिशा की ओर से तथा मानसूनकाल (चौमास) की बारिश दक्षिणी मैदानी दिशा की ओर से आती है।
@लेखक दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में एसोसिएट रिसर्च है







