पुरोला नगर पालिक चुनाव : नाव न डूबे, राजनीतिक गोताखोर तैनात।
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सीमांत जनपद उत्तरकाशी का पुरोला ऐसा क्षेत्र है जहां राजनीति की पाठशालाएं चलती है। इस बात का प्रमाण पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री बर्फिया लाल जुवांठा हैं। और बहुत कुछ है पुरोला में राजनीति को लेकर।
फिलहाल वर्तमान में हो रहे पुरोला नगर पालिका के चुनाव पर एक नजर डालते है। 4200 मतदाताओं वाली नगर पालिका पुरोला में पांच प्रत्याशी मैदान में है। इस तरह यहां भाजपा कांग्रेस की सीधी टक्कर नहीं दिख रही है, बल्कि चुनावी समीकरण त्रिकोणीय बनते दिखाई दे रहे है। अब कहा नहीं जा सकता कि चुनाव का यह रथ किस कदर अपनी कड़बट लेता है। बता दें कि यहां भाजपा को बगावती तेवर सर्वाधिक डैमेज कर सकते है। जबकि इस चुनावी समर में भाजपा ने अपने राजनीतिक गोताखोर तैनात कर रखे है। यह राजनीतिक गोताखोर एकदम सक्रिय दिखाई दे रहे है, मगर कभी कभी वे भावनात्मक हो जाते है। इसको देखते हुए ख़ांटी राजनीतिक खिलाड़ी प्यारेलाल ने समय की नजाकत को देखते हुए “चुनावी नाव” को पार लगाने के लिए सेतु का मजबूत कार्य कर रखा है।
इधर पांच में से एक ऐसा प्रत्याशी बताया जा रहा है जो डूबती हुई “चुनावी नाव” के लिए सेतु बनकर बचाने का भरसक कोशिश कर रहे है। अलबत्ता यहां जब आप प्रत्याशियों से बात करेंगे तो वे अंगुलियों पर मतदान गिनवाकर अपनी जीत पक्की बता रहे है।
ज्ञात हो कि कांग्रेस के प्रत्याशी बिहारी लाल छात्र जीवन से ही पुरोला में रहते है। कांग्रेस के साथ जुड़कर उन्होंने कई सामाजिक तथा विकासीय कार्यों को अंजाम दिया है। बिहारी लाल की पत्नी पुरोला नगर पंचायत की निवर्तमान सभासद है। इस कारण भी पिछली परफॉर्मेंस को देखते हुए वे लोगों से मतदान की अपील कर रहे है। वैसे भी बिहारी लाल लोगो की नजर में बहुत ही सौम्य और मिलनसार बताये जा रहे है। बिहारी लाल का कहना है कि पिछली नगर पंचायत में विकास को लेकर एक अच्छा खासा बजट आया था, सो भाजपा के नेताओं ने उस बजट को वापस करवाया दिया। इसलिए इस दौरान भाजपा की कथनी करनी सामने आ रही है। फलस्वरूप इसके उनकी जीत का आंकड़ा पार हो रहा है।
भाजपा के प्यारेलाल भी पुरोला क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय राजनेता है। वे मीठा बोलते है, लोगो के के साथ उनका दोस्ताना व्यवहार है। वे पुरोला के ब्लॉक प्रमुख रहे है तो निवर्तमान नगर पंचायत पुरोला के अध्यक्ष भी रहे है। लंबे समय तक कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहे है। मौजूदा वक्त में इन्हें भी मोदी का जादू चढ़ा और भाजपा के खेवनहार हो गए। अपनी पुरानी जनप्रतिनिधि की पहचान को वे इस बार पुनः चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल कर रहे है। वे भी एकदम आश्वस्त हैं कि इस बार पुरोला की जनता प्यारेलाल का ही फिर से चुनाव करना चाहती है।
भाजपा से बगावत करके आए अमीचंद शाह भी दर दर, घर घर जाकर लोगो से अपने पक्ष में मतदान की भावनात्मक अपील कर रहे है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़कर भाजपा के बैनर पर अमीचंद शाह की एक विशिष्ट पहचान रही है। श्री शाह के पक्ष में यह बात लोग खुलकर कहते हैं कि अमीचंद शाह ने भाजपा के अलावा कभी कुछ और देखा ही नहीं है। लोग यहां तक बताते हैं कि भाजपा के कार्यक्रम को वे विकास का ही कार्यक्रम मानते थे। यानी पुरोला में भाजपा के सच्चे सिफाही रहे है। अब वे न तो थूक पा रहे है और ना ही घूंट पा रहे है। हालांकि पूर्व में उनकी पत्नी खलाड़ी जिला पंचायत सीट से सदस्य जिला पंचायत रही है। भाजपा से दुखी होकर वे मंदिर मंदिर माथा टेक रहे है। यह भी कह रहे हैं कि उनके साथ जो भाजपा के कुछ लोगों ने अन्याय किया है उसका बदला अब अपने पक्ष में मतदान करके लिया जाएगा।
निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाश डबराल भी कोई कम हैसियत नहीं रखते है। पुरोला क्षेत्र में ऐसा कोई सार्वजनिक या व्यक्तिगत कार्यक्रम नहीं होगा, जहां प्रकाश की उपस्थिति न हो। वे हर संभव अपने क्षेत्र में उपस्थित रहते है। यानी सुख दुख में वे लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चले है। प्रकाश के पास विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ कार्य करने का एक अच्छा खासा अनुभव है। जबकि उन्हें लोग मूल रूप से समाज सेवक मानते है। लोग सहानुभूति के आधार पर प्रकाश के पक्ष में मतदान कर सकते है। प्रकाश एकदम आश्वस्त है कि पुरोला की जनता इस बार कार्यकर्ता को जिम्मेदारी देना चाहती है। यानी उनकी जीत पक्की है।
निर्दलीय प्रत्याशी हरिमोहन जुवांठा कभी स्टेट बैंक में सेवारत थे। राजनीति का खुमार उन्हें चुनाव मैदान में खींच लाया है। बताया जाता है कि जब वे स्टेट बैंक पुरोला में कार्यरत थे तो वे लोगों से मिलते भी नहीं थे। क्योंकि वे अपने को ऑफिसर बताते थे। एक बार पुरोला के ही पास के गांव की एक विधवा का खाता कई महीनों तक इसलिए नहीं खुल पाया कि पुरोला स्टेट बैंक में मैनेजर के पद पर हरिमोहन जुवांठा बैठे थे। जब हरिमोहन जुवांठा वहां से तबादला हुए तब जाकर उक्त महिला का बैंक खाता खुल पाया। यही नहीं एक बार पुरोला की एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्था ने स्टेट बैंक में बचत खाता खोलना था। मगर खाता खोलने के बाद भी तत्काल स्टेट बैंक के मैनेजर रहे हरिमोहन जुवांठा ने न की सिर्फ बैंक खाता खोलने के कानून पढ़ाये, बल्कि इस संस्था का खाता ही बैंक से बंद करवा दिया। जिसका उन्हें कुछ समय बाद खामियाजा भी भुगताना पड़ा। दरअसल हरिमोहन जुवांठा के ऐसे कई कारनामे है जिन्हें लोग आजकल उनके चुनाव मैदान में आते ही याद कर रहे है।








