By – Dr. Arun Kuksal
हिन्दी साहित्य जगत के प्रिय कथाकार अशोक अग्रवाल की पुस्तक ‘संग-साथ’ विभूतियों के साथ गुजारी उनकी यादों की एक दिलचस्प शब्द-यात्रा है। बुजुर्गियत से लिपटी उम्र के इस पड़ाव के पीछे छोड़ आए वो लोग, वो दोस्त, वो दिन-रात, वो चेहरे, वो बातें, वो जगहें, वो इरादे, वो वायदे सब कुछ सुहाना तो नहीं होगा।
वो जैसे भी रहे हों अशोक जी ने उन्हें दिल खोल कर याद किया है।
अशोक अग्रवाल अपने जीवनीय संगी-साथियों के जरिए विगत 50 वर्षों का एक गहन एवं व्यापक सामाजिक परिदृश्य को सार्वजनिक करते हैं। इस परिदृश्य में भारतीय समाज के ताने-बाने अपनी मजबूती, खिंचाव और बिखराव के साथ मौजूद हैं। अशोक बात अपने साहित्यिक मित्रों की करते हैं परन्तु उसमें उनके मित्र और खुद वो हाशिए पर हैं।
नागार्जुन, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, लक्ष्मीधर मालवीय, जितेन्द्र कुमार, पंकज सिंह, अशोक माहेश्वरी, विश्वेश्वर, नवीन सागर, अमितेश्वर, प्रियदर्शी प्रकाश, ज्ञानेन्द्रपति और सुमन श्रीवास्तव ने जीवन के भटकाव और अपयशों के बीच जीवन की मधुरता और रचनात्मकता को कैसे बचाये रखा? अशोक उसके दृष्टा बने हैं।
इस बेहद संवदेनशील नितांत निजी सूत्रों को सार्वजनिक करने के खतरों से अशोक अग्रवाल वाकिफ़ हैं। उन्होने इन खतरों की चुनौती को स्वीकारा और बखूबी अन्जाम भी दिया है। वे स्वीकारते हैं कि ‘‘अधूरी इच्छाओं के साथ जीवन का सफ़र पूरे करने का अभिशाप तो मनुष्य जाति के साथ सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा है।’’ (पृष्ठ-108)
‘‘…काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में, जहाँ मेरे पिता बम्बई का अपना चलता कारोबार छोड़कर स्वयं अपने पिता पण्डित मदन मोहन मालवीय की सेवा-सुश्रुषा में आ गये थे। इतने प्रसिद्ध नाम का भारी बोझ हम सब बच्चों के सिर पर था। हमारा परिवार निर्धन था-आपको शायद विश्वास न हो कि मेरे पिता के देहान्त पर उनका शरीर एक रोज़ पड़ा रहा था और बम्बई के हमारे एक हितैषी परिवार से दो हज़ार रुपये आने पर उनकी मिट्टी उठी थी। बड़े होने पर हम सभी भाइयों ने गुपचुप सलाह की कि हम देश सेवा नहीं करेंगे।’’( लक्ष्मीधर मालवीय, पृष्ठ-64)
उक्त संदर्भों में ये संस्मरण विगत शताब्दी के उत्तरोत्तर काल का साहित्यिक माहौल एवं मिजाज़, लेखकों की पारिवारिक स्थिति, आपसी चुहल-बाजी, संवाद, तनातनी, आत्मसम्मान, अपमान और उपेक्षा का लेखा-जोखा हैं। अशोक जी ने दोस्ताना संबंधों उजागर करते उसे गहरे से उघाड़ा भी है। इसलिए इनमें बहुत सी खरोंचांे के साथ अंदर के घाव भी बिना कोई सीमा रेखा या रहमोकरम के बाहर आये हैं। जो छिप भी गया उसका आभास पाठक को स्वतः हो जाता है।
कवि पंकज सिंह पर लिखी अजय सिंह की कविता
मैं कहीं भी रहूँ- चाहे प्रधानमंत्री निवास में
या लेफ्टिनेंट गवर्नर के महल में या अकबर रोड के बंगले में
दिल तो मेरा वामपंथ के साथ हइए है। (पृष्ठ- 176)
इन संस्मरणों को पढ़ते हुए एक बात की ओर ध्यान बार-बार जाता है कि आधी शताब्दी पूर्व तब मित्रों के एक-दूसरे के घर आना-जाना और रहना कितना सहज, सरल और स्वाभाविक होता था। परन्तु इसी सहजता में साहित्यकारों के प्रति परिवारजनों की मनोस्थिति एवं मनोधारणा जिन्होने उन्हें झेलने की हद तक निभाया को भी समझा जा सकता है।
प्रसिद्ध व्यक्तियों की नजदीकियाँ एक सामान्य आदमी को कभी-कभी लापरवाह और आवारा बना देती हैं। बड़े लोगों के सानिध्य से उपजी आत्ममुग्धता उसे अपने जीवनीय दायित्वों से विमुख कर देती है। ऐसे में पारिवारिक स्थितियों को नजर-अंन्दाज करना उसकी आदत बन जाती है। जिसका खामियाजा उनके परिवारजनों को उठाना पड़ता है। एक अलग-थलग और वीरान जिन्दगी परिवार के सदस्यों के हिस्से आती है। और वे उसकी छोड़ी हुई उलझनों से उभरने में ही जिन्दगी गुजारते हैं। ऐसे अभिभावकों की सामाजिक लोकप्रियता भी उनको चुभन देती है। वे परिणामतया उसके दिवंगत होने के बाद उसकी उस विरासत से छिटक कर ही जीना पंसद करते हैं।








