Sunday, September 13, 2026
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मानव मन के नाजुक कोने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल से सरोबार स्मृतियाँ

By – Dr. Arun Kuksal

हिन्दी साहित्य जगत के प्रिय कथाकार अशोक अग्रवाल की पुस्तक ‘संग-साथ’ विभूतियों के साथ गुजारी उनकी यादों की एक दिलचस्प शब्द-यात्रा है। बुजुर्गियत से लिपटी उम्र के इस पड़ाव के पीछे छोड़ आए वो लोग, वो दोस्त, वो दिन-रात, वो चेहरे, वो बातें, वो जगहें, वो इरादे, वो वायदे सब कुछ सुहाना तो नहीं होगा।

वो जैसे भी रहे हों अशोक जी ने उन्हें दिल खोल कर याद किया है।

अशोक अग्रवाल अपने जीवनीय संगी-साथियों के जरिए विगत 50 वर्षों का एक गहन एवं व्यापक सामाजिक परिदृश्य को सार्वजनिक करते हैं। इस परिदृश्य में भारतीय समाज के ताने-बाने अपनी मजबूती, खिंचाव और बिखराव के साथ मौजूद हैं। अशोक बात अपने साहित्यिक मित्रों की करते हैं परन्तु उसमें उनके मित्र और खुद वो हाशिए पर हैं।

नागार्जुन, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, लक्ष्मीधर मालवीय, जितेन्द्र कुमार, पंकज सिंह, अशोक माहेश्वरी, विश्वेश्वर, नवीन सागर, अमितेश्वर, प्रियदर्शी प्रकाश, ज्ञानेन्द्रपति और सुमन श्रीवास्तव ने जीवन के भटकाव और अपयशों के बीच जीवन की मधुरता और रचनात्मकता को कैसे बचाये रखा? अशोक उसके दृष्टा बने हैं।

इस बेहद संवदेनशील नितांत निजी सूत्रों को सार्वजनिक करने के खतरों से अशोक अग्रवाल वाकिफ़ हैं। उन्होने इन खतरों की चुनौती को स्वीकारा और बखूबी अन्जाम भी दिया है। वे स्वीकारते हैं कि ‘‘अधूरी इच्छाओं के साथ जीवन का सफ़र पूरे करने का अभिशाप तो मनुष्य जाति के साथ सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा है।’’ (पृष्ठ-108)

‘‘…काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में, जहाँ मेरे पिता बम्बई का अपना चलता कारोबार छोड़कर स्वयं अपने पिता पण्डित मदन मोहन मालवीय की सेवा-सुश्रुषा में आ गये थे। इतने प्रसिद्ध नाम का भारी बोझ हम सब बच्चों के सिर पर था। हमारा परिवार निर्धन था-आपको शायद विश्वास न हो कि मेरे पिता के देहान्त पर उनका शरीर एक रोज़ पड़ा रहा था और बम्बई के हमारे एक हितैषी परिवार से दो हज़ार रुपये आने पर उनकी मिट्टी उठी थी। बड़े होने पर हम सभी भाइयों ने गुपचुप सलाह की कि हम देश सेवा नहीं करेंगे।’’( लक्ष्मीधर मालवीय, पृष्ठ-64)

उक्त संदर्भों में ये संस्मरण विगत शताब्दी के उत्तरोत्तर काल का साहित्यिक माहौल एवं मिजाज़, लेखकों की पारिवारिक स्थिति, आपसी चुहल-बाजी, संवाद, तनातनी, आत्मसम्मान, अपमान और उपेक्षा का लेखा-जोखा हैं। अशोक जी ने दोस्ताना संबंधों उजागर करते उसे गहरे से उघाड़ा भी है। इसलिए इनमें बहुत सी खरोंचांे के साथ अंदर के घाव भी बिना कोई सीमा रेखा या रहमोकरम के बाहर आये हैं। जो छिप भी गया उसका आभास पाठक को स्वतः हो जाता है।

कवि पंकज सिंह पर लिखी अजय सिंह की कविता
मैं कहीं भी रहूँ- चाहे प्रधानमंत्री निवास में
या लेफ्टिनेंट गवर्नर के महल में या अकबर रोड के बंगले में
दिल तो मेरा वामपंथ के साथ हइए है। (पृष्ठ- 176)

इन संस्मरणों को पढ़ते हुए एक बात की ओर ध्यान बार-बार जाता है कि आधी शताब्दी पूर्व तब मित्रों के एक-दूसरे के घर आना-जाना और रहना कितना सहज, सरल और स्वाभाविक होता था। परन्तु इसी सहजता में साहित्यकारों के प्रति परिवारजनों की मनोस्थिति एवं मनोधारणा जिन्होने उन्हें झेलने की हद तक निभाया को भी समझा जा सकता है।

प्रसिद्ध व्यक्तियों की नजदीकियाँ एक सामान्य आदमी को कभी-कभी लापरवाह और आवारा बना देती हैं। बड़े लोगों के सानिध्य से उपजी आत्ममुग्धता उसे अपने जीवनीय दायित्वों से विमुख कर देती है। ऐसे में पारिवारिक स्थितियों को नजर-अंन्दाज करना उसकी आदत बन जाती है। जिसका खामियाजा उनके परिवारजनों को उठाना पड़ता है। एक अलग-थलग और वीरान जिन्दगी परिवार के सदस्यों के हिस्से आती है। और वे उसकी छोड़ी हुई उलझनों से उभरने में ही जिन्दगी गुजारते हैं। ऐसे अभिभावकों की सामाजिक लोकप्रियता भी उनको चुभन देती है। वे परिणामतया उसके दिवंगत होने के बाद उसकी उस विरासत से छिटक कर ही जीना पंसद करते हैं।

अशोक अग्रवाल जी ऐसे ही कुछ मित्रों यथा- अशोक माहेश्वरी, अमितेश्वर, विश्वेश्वर और प्रियदर्शी प्रकाश से पाठकों का परिचय कराया है। उनके मित्र अशोक माहेश्वरी स्वीकारते हैं कि अपनी जिन्दगी भर की लापरवाही के कारण ‘‘बड़े भाई, अब पूरी तरह खर्च हो गए।’’ अमितेश्वर जैसे संवेदनशील एवं समर्पित व्यक्ति की ‘‘पचास-बावन की उम्र तो कोई इस तरह जाने की नहीं होती।’’ विश्वेश्वर जैसा फंतासी भरा व्यक्तित्व जो कि मित्रों से बड़ी धौंस से अपना ‘जजिया कर’ वसूल करता और फिर आप सभी धूर्त हैं कहकर गरियाता हुआ पुनः आने के लिए वीराने में अज्ञात हो जाता था। प्रियदर्शी प्रकाश जैसा अराजक व्यक्ति जिसके लिए अशोक जी अचंभित होकर कह देते हैं कि ‘क्या कोई इतने गुपचुप तरीके से दुनिया के नक़्शे से गायब हो सकता है?

अशोक माहेश्वरी, विश्वेश्वर, अमितेश्वर और प्रियदर्शी प्रकाश की रचनात्मकता प्रतिभा और विकट जीवन-वृत्तों से अशोक जी ने मानव जीवन के द्वन्द्व को तटस्थता से रेखांकित किया है। उन्होने इनके जीवन की धूप-छाँव के बखूबी चित्र खींचे हैं।

वे अपने मित्रों के जीने के ढंग पर प्रतिक्रिया न देते हुए भी उनकी कमजोरियों को बताते हैं। लक्ष्मीधर मालवीय का कवि पंकज सिंह के लिए यह कथन कि ‘‘हर समय अपने को मर्द डिक्लेयर करते रहने की क्या ज़रूरत है?’’ एक व्यक्ति के लिए कहा गया यह कथन मुझे अपने लिए और अपने अनेकों मित्रों के सटीक लगता है।

अशोक अग्रवाल जी ने इन संस्मरणों के जरिए अपने जीवनीय सबक वाले क्षणों और अवसरों का भी खुलासा किया है। इसमें उनका संकोच कहीं आड़े नहीं आया है।

‘‘मेरा नाम सुन शमशेरजी उठे और किताबों के ढेर में से मेरे कहानी-संग्रह ‘उसका खेल’ को ढूँढ निकाला और मुस्कुराते हुए पूछा- ‘‘क्या इसका लेखक मैं ही हूँ।’’ मेरे हाँ में सिर हिलाते ही उन्होंने कहानी-संग्रह मुझे थमाते हुए कहा-‘‘इसे ज़रा सरसरी निगाह से उलट-पुलट लो।’’ मैंने पाया कि पूरी किताब का शायद ही कोई पन्ना ऐसा रहा होगा जहाँ किसी-न-किसी शब्द या वाक्य को उन्होने लाल रंग से न रंगा हो।…इस समय पुरस्कार प्राप्ति का सारा अहंकार जाता रहा।’’ (पृष्ठ-9)

त्रिलोचन ‘‘सुनो पण्डित तुमने मेरे सामने ‘छोड़ आओ’ का प्रयोग किया…छोड़ा चूहों को जाता है, छोड़ा बिल्ली को जाता है, आदमी को पहुँचाया जाता है।’’(पृष्ठ-40)

अज्ञेय, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और अन्य कालजयी रचनाकारों के बड़प्पन और निर्भीकता के कई रोचक प्रसंगों का जिक्र इस किताब में है।

‘‘…उनका मानना है कि रचना में संशोधन करने या न करने का अधिकार सिर्फ़ लेखक का अपना है, यदि मैं अपनी अनुमति उन्हें दूँगा तभी वे उपरोक्त संशोधन करेंगे।…मैं सिर्फ़ यह सोच कर विस्मित था कि हिन्दी के अपने समय के इतने सम्मानित, वरिष्ठ और प्रसिद्ध लेखक और सम्पादक मुझ जैसे नये-नये कहानीकार को पत्र लिख कर इतनी विनम्रता से अनुमति माँग रहे हैं। उस समय से लेकर आज तक के लेखकीय जीवन में ऐसा संवेदनशील और लेखक की गरिमा का ध्यान रखने वाला कोई दूसरा सम्पादक मैंने नहीं देखा।’’(अज्ञेय, पृष्ठ-17)

‘‘…एक ही मंच पर ‘इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको’ और ‘आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी’ जैसी व्यक्तिवादी सत्ता विरोधी कविताओं का सर्जक और श्रीमती इंदिरा गाँधी उपस्थित थे। पहली पंक्ति में मौजूद शोभाकांत विस्मित थे कि जब कभी बाबा की और श्रीमती गाँधी की निगाहें परस्पर मिलती तो दोनों एक-दूसरे की ओर देखते मुस्कुराते। समारोह के समापन के बाद शोभाकांत ने उनसे पूछा कि वह इंदिराजी को देख क्यों मुस्कुरा रहे थे? उत्तर मिला-यह सोचते हुए कि जिस तानाशाह चरित्र के विरुद्ध कविताएँ लिखीं आज उन्हीं के हाथ पुरस्कार ग्रहण करना है। इंदिराजी आपको देख क्यों मुस्कुरा रही होंगी? यहीं कि अभी पता नहीं किन-किन समारोह में इस खडूस बूढे से़े आमना-सामना होगा।’’(नागार्जुन, पृष्ठ-34)

अशोक जी ने अपने प्रिय मित्रों की जीवनगाथा के अनुछुये पक्षों और संघर्षों को बहुत मार्मिकता से छुआ है। जिसमें उनकी सफलता और असफलता से ज्यादा जीवनीय अतृप्तता और निरीहता पसरी है। इस मायने में ये जीवंत स्मृतियाँ मानव मन के सबसे नाजुक कोने की गहरी मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी है।

अशोक अग्रवाल जी को आत्मीय बधाई आप हर समय स्वस्थ और प्रसन्न रहें। प्रिय अभिषेक अग्रवाल जी को इस अनुपम भेंट के लिए आत्मीय धन्यवाद और शुभाशीष।

पुस्तक- संग साथ (संस्मरण)
लेखक- अशोक अग्रवाल
संस्करण- प्रथम, 2023, पृष्ठ-223, मूल्य- ₹ 300
प्रकाशक- संभावना प्रकाशन, रेवती कुंज, हापुड़- 110032
संपर्क मोबाइल-7017437410

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