नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गीतों का पुनर्पाठ करती पुस्तक ‘कल फिर जब सुबह होगी’ !
By – Beena Benjwal
‘आज हमुन रोपणि सकलि।’ देहरादून में ‘जागरण संवादी’ कार्यक्रम के पहले दिन दर्शक दीर्घा में बैठे एक ब्यूरोक्रेट के मुख से ये वाक्य सुनकर सुखद आश्चर्य होना स्वाभाविक था। जिज्ञासा ने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया। ज्ञात हुआ वे हर शनिवार को खदरी खड़कमाफी स्थित घर जाकर खेतों में निराई, गुड़ाई का जब जो भी काम हो करते हैं और उसी समय नेगी जी के गीतों को सुनते हुए बाद में तिबार में बैठकर उन पर अपनी मीमांसा लिखते हैं। बात सत्य भी है, नेगी जी के गीतों पर लिखने के लिए उस माटी से जुड़ना, उस भाषा की लय का सांसों के साथ गुंथा होना जरूरी है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसी अन्तर्प्रेरणा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वहीं उनके मोबाइल पर नेगी जी के गीतों के विषय में लिखी उनकी भूमिका के उस अंश को भी पढ़ने का सुअवसर मिला जिसमें वे भूपेन हजारिका, बाॅब डिलन एवं नेगी जी के गीतों में निहित मानवता और करुणा को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘अपने-अपने प्रशंसकों के लिए वे एक किंवदंती हैं और समूची पीढ़ी के लिए मुखपत्र ‘।
गीत, संगीत और गायन की अप्रतिम मेधा की विराट हिमालयी पहचान का नाम है नरेन्द्र सिंह नेगी! और उनके समृद्ध गीति साहित्य में से शताधिक गीतों का अद्भुत पुनर्पाठ करने वाले ये लेखक हैं ललित मोहन रयाल। जिनकी पुस्तक ‘कल फिर जब सुबह होगी’ का लोकार्पण 12 अगस्त, 2024 को नेगी जी के जन्मदिन के अवसर पर देहरादून स्थित संस्कृति विभाग के प्रेक्षागृह में हुआ। ये भी अनूठा संयोग रहा कि नेगी जी के गीतों के केन्द्र में रहने वाली पहाड़ की बेटी-ब्वारी की उस दिन भी मंच पर राज्य की मुख्य सचिव राधा रतूड़ी जी एवं दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो.सुरेखा डंगवाल जी के रूप में उपस्थिति गौरवान्वित करने वाली थी।
आई.ए.एस.अधिकारी ललित मोहन रयाल जी की इस लेखकीय यात्रा की बात करें तो इससे पूर्व उनकी चार पुस्तकें खड़कमाफी की स्मृतियों से (संस्मरण), अथश्री प्रयाग कथा (संस्मरण), काऽरी तु कब्बि ना हाऽरि (जीवनी) और चाकरी चतुरंग (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं। रयाल जी की इस पुस्तक को पढ़ने से पूर्व शब्द की संगीतमय यात्रा पर इन्द्रजीत सिंह जी द्वारा गीतकार शैलेन्द्र पर संपादित पुस्तक ‘धरती कहे पुकार के….,’ यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित ‘यार जुलाहे….. गुलज़ार’, प्रसून जोशी की ‘धूप के सिक्के’ पढ़ने का सुअवसर मिला। स्वयं नेगी जी के रचना संसार पर अक्षत’ से लेकर इस पुस्तक से पहले तक प्रकाशित कृतियां भी नजरों के सामने से गुजरी हैं। शब्द और संवेदना की उस अद्भुत संगीतमय यात्रा को यह पुस्तक अपने ही उस लोक में पहुंचा गई जिसके सांस्कृतिक आलोक में बचपन बीता। जिसकी बोली-भाषा सांसों में घुली-मिली है। जिसके उकाळ-उंदार नापने के अनुभवों को जीवन का पाथेय बनाने में नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गीतों की अहम भूमिका रही है।
लेखक नेगी जी के गीतों को गढ़वाली भाषा के सांस्कृतिक शब्दकोश कहते हुए गीतकार को समूचे लोक की सांस्कृतिक चेतना का सूत्रधार बताते हैं। उनका कहना है ‘गीतों के जरिए नेगी जी ने आम लोगों में निज भाषा के प्रति जो गौरव भाव भरा, पीढ़ियों को संस्कारित किया, उनकी इस जबरदस्त भूमिका के लिए यह समाज कभी उऋण नहीं हो सकता।’ वास्तव में इन गीतों के साथ रहना मतलब आत्मगौरव की हिमालयी यात्रा करना है।
भूपेन हजारिका, बाॅब डिलन और नरेंद्र सिंह नेगी जी की गीत यात्रा पर लेखक की पाँच पृष्ठों की टिप्पणी का सार उनके इन शब्दों में निहित है, ‘उनके गीतों की रेंज और विषय वस्तु का वैराट्य उन्हें पिछली सदी के दो बड़े महान गायकों भूपेन हजारिका और बाॅब डिलन के समकक्ष खड़ा करते हैं। इन तीनों ने अपने गीत, संगीत और गायन से सिर्फ मनोरंजन ही नहीं किया बल्कि अपने समाज के वे प्रतिनिधि स्वर भी बने।’
‘पचास बर्स बिटिन मिस्यां छिन, झुक्यां छिन’ से आगे बढ़ती भूमिका में बोली-भाषा संरक्षण की बात करते हुए लेखक ‘न्यूति बुलौलु पूजि पठौलु’ के अन्तर्गत लोकसंगीत, मांगळ, बेदि न धूळि अरघ, वास्तु कला, लोक व्यवहार, शिष्टाचार और शकुन शास्त्र की बात करते हैं। और फिर ‘हरि तरि झपन्याळी डाळी’ में गीतों में वर्णित भूगोल और प्रकृति-संस्कृति के समूचे परिवेश को समेटते हुए ‘अणबोली बत्थौंकि गवै त नी पर चुप को मतलब हां ही होंदो’ शीर्षक में नेगी जी की प्रेम जैसी मानवीय अनुभूति को उजागर करने वाली अद्वितीय सिद्धहस्तता पर विस्तार से अपने विचार रखते हैं।
‘बेटुलाकि तेरि जोन, जोन छोरि जिंदगिभर खुदेण’ के अन्तर्गत गढ़नारी की करुण गाथा को नेगी जी के गीतों का केन्द्रीय विषय बताते हुए लेखक ‘खड़ि उकाळ कटे ग्याई रै उंदार घिलमुंडि खैल्या’ में स्त्रियों -बुजुर्गों के प्रति बरती जाने वाली उपेक्षा पर गीतकार की बेजोड़ संवेदनशीलता का जिक्र करते हैं। वो ‘ये जमानम ईं व्यवस्थम् हत्त पसारी हक नि मिलुण’ में प्रतिरोध के स्वर का उल्लेख करते हुए ‘रीति-रिवाज भि बणौंदा हमीं बदला सुधार क्वी कसर कमी’ में समाज की विडंबनाओं, विसंगतियों को उजागर करने के प्रति नेगी जी की प्रतिबद्धता को बताने वाली यह भूमिका 56 पृष्ठों का विस्तार लिए है।
नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गीतों के विशाल फलक में से एक सौ एक गीतों को चुनकर आठ शीर्षकों के अन्तर्गत उनकी भावभूमि और शब्द शिल्प का सारगर्भित और सटीक विश्लेषण करने के लिए जैसी काव्य चेतना, सूक्ष्म लोकदृष्टि और विवेच्य भाषा की समझ चाहिए, वह इस पुस्तक में देखने को मिलती है। लेखक की भाषा शैली और उसका शब्द विन्यास विस्मित करता है। यही कारण है कि प्रकृति, परम्परा और परिवेश; ऋतुगीत, पर्व-त्योहार ; श्रृंगार-सौन्दर्य, प्रणय-आकर्षण, विरह, वियोग, वेदना, व्यथा; पलायन, प्रवास, विस्थापन; आह्वान गीत; समस्या, संक्रमण, ऊहापोह तथा लोरी, मनुहार, आशीष, नसीहत शीर्षकों के अंतर्गत की गई विवेचना गीतों के भीतर के एक और संसार को खोलते हुए कहीं-कहीं गीतकार के गीतों से जुड़े यादगार अनुभवों से भी रूबरू करवाती है।
‘लड़ीक’ गीत की प्रस्तुति के दूसरे दिन एक वृद्धा माता का उस गीत में अपनी व्यथा अनुभूत कर दो रुपए का नोट नेगी जी के सिरहाने रखना, ‘गाणी’ गीत के सृजन के पीछे मुंबई के एक प्रवासी पर्वतवासी की मातृभूमि से अलग होने की पीड़ा ये कुछ ऐसे ही हृदयस्पर्शी अनुभव हैं। ‘दगड़्या’ गीत के सृजन की पृष्ठभूमि के विषय में लेखक बताते हैं कि नेगी जी की पोस्टिंग उत्तरकाशी में थी। उन्हें पुलिस लाइन से वायरलेस संदेश आता है कि उनकी पत्नी अस्पताल में भर्ती हैं। उनका ऑपरेशन होने वाला है। वे टैक्सी बुक करके रात पौड़ी के लिए रवाना होते हैं। उसी अन्तर्द्वंद्व की स्थिति में इस गीत की रचना हुई। ‘झ्यूंतू तेरी जमादारी’ गीत को लेकर शिक्षाविद एस.पी. सेमवाल जी से जुड़ा वाकया भी कम रोचक एवं प्रेरणाप्रद नहीं है।
नेगी जी के गीतों की संगत का ही असर है कि उनके गीतों की मीमांसा में रिवर्स माइग्रेशन, रिनेसां, लिविंग वाॅटर, आर्गेनिक फूड, रिचुअल्स, आइकाॅन, बाॅर्डर, कोलाज, एथनिक लुक, ग्रीनरी, इको साउंड, लैंडमार्क्स, विजुअलाइज, ओवरलोड, सेल्फमेड, ग्रीन फोरेस्ट जैसी प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त अंग्रेजी की शब्दावली भी लोक के ही ढब में ढली
नजर आती है।
गीतों में प्रयुक्त सांस्कृतिक शब्दावली जैसे भैल्ला, इगास बग्वाळ, पैंणै पकोड़ि , दोण-दैज आदि का अर्थ भावों को समझने में मदद करता है। विशिष्ट शब्दों का कहीं-कहीं दिया गया व्युत्पत्तिपरक अर्थ गढ़वाली भाषा के प्रति लेखक की रुचि एवं अध्ययनशीलता का परिचय देता है। लोक मापकों एवं विभिन्न फसलों वाले खेतों की नामावली जो गढ़वाली भाषा की विशिष्ट शब्द संपदा है, पर भी लेखक ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां दी हैं।
अनेकानेक गीतों में अर्थगौरव लिए लोकोक्तियों एवं मुहावरों पर टीका लेखक के गहन लोकज्ञान की द्योतक है। ‘कौजाळ पाणि मा छाया नि आंद, कछिड़ि लगाण, पंचैति बैठाण, पाळै सी सेक्की तेरी घाम आण तक’ मुक्क मोड़्यूं छ, गेड़ि खोलि जा इसी प्रकार की उक्तियाँ एवं मुहावरे हैं। लोक में अप्रचलित या विलुप्ति के कगार पर पहुंचे शब्दों को गीतों में संरक्षित करने का श्रेय भी रयाल जी गीतकार को देते हैं।
कांडा लग्यां, ‘सुंचिणी रैग्यैनी, ह्येळि गाड़ण, अणांदरु, मठखाणी, जिकुड़ी, सौर, पाण, भौंकुछ जैसे शब्दों की व्याख्या तथा छिबड़ाट, घ्याळ, भिबड़ाट; पर्वाण, फुंद्या और फुटल्याचंद जैसे शब्दों में सूक्ष्म अर्थभेद बताना रोचक व ज्ञानवर्धक है। नै-नवांण ऊमी के विषय में पाठकों से लेखक का निवेदन और उसमें ऊमी को सांस्कृतिक पदार्थ कहना अनूठा है।
‘घाम’ गीत की पंक्ति ‘झम्म झौळ लगी आंख्यूंमा’ में प्रयुक्त ‘झम्म’ विशिष्ट प्रभावात्मकता वाला शब्द है। इसे हिन्दी गीतों तक पहुंचाने वाले प्रसून जोशी अपनी पुस्तक ‘धूप के सिक्के’ में ‘तारे जमीं पर’ फिल्म हेतु लिखे गीत में इसके प्रयोग के विषय में कहते हैं, ‘इस गीत में मैंने आमतौर पर प्रयोग किए जाने वाले ‘छम्म’ शब्द की जगह ‘झम’ (तू धूप है, झम से बिखर) का प्रयोग किया, ‘झम’ एक पहाड़ी शब्द है।’ लेखक ने प्रसून जोशी जी द्वारा एक इण्टरव्यू में भी इस शब्द का उल्लेख किए जाने का संदर्भ दिया है।
फ्लैप पर दी गई देवेश जोशी एवं अनिल के. रतूड़ी जी की अभ्युक्तियां पुस्तक की महत्ता एवं उपादेयता को रेखांकित करती हैं। देवेश जोशी लिखते हैं, ‘काव्यशास्त्र और लोक अनुभव दोनों में सिद्धहस्त वह ऐसे गीतकार हैं, जिनकी कलम से निकले शब्द अनायास ही लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं। उनके लिखे बोल मुहावरों का स्थान ले लेते हैं। उनके सृजन में शब्द, संगीत और स्वर तीनों आयामों में पहाड़ी जनजीवन की आत्मा का मौलिक स्पर्श देखने को मिलता है। काव्य-सौष्ठव, अर्थ गौरव के श्रेष्ठ तत्वों से संपन्न उनके गीतों में पहाड़ी जनजीवन के हर्ष-विषाद के भावों का समूचा प्रतिबिंब परिलक्षित होता है। निश्चित तौर पर उनका सृजन विश्व के श्रेष्ठ गीतिकाव्य में गिने जाने योग्य है। उनके शताधिक गीतों का विश्वसनीय विश्लेषण इस पुस्तक में प्रकाशित हो रहा है। मध्य हिमालयी (गढ़वाली) संस्कृति के सरस परिचय के रूप में यह कृति निश्चित तौर पर संग्रहणीय और पठनीय होगी।’
‘ठण्डो रे ठण्डो’ गीत के विषय में लेखक कहते हैं किसी गीत के मुखड़े का रिंगटोन बनना उसकी अपार लोकप्रियता को दर्शाता है।** उत्साही पर्यटकों को इस गीत में रमणीक उत्तराखण्ड की झांकी मिलती है। ‘कख देखी होली’ के बारे में कहते हैं, ‘गौर करें तो पाएंगे कि समूचा गीत ठेठ स्थानीय उपमाओं से भरा है, जो चिर-परिचित इलाके से उठाई गई हैं।’ ‘भोळ जब फिर रात खुलाली’ शीर्षक गीत के विषय में उनका कहना है, ‘नेगी जी के गीतों में दशकों का तजुर्बा दिखता है। उन्होंने बहुत लिखा। जो भी लिखा, सारवान लिखा। चुस्तबयानी उनके गीतों को एक खास तेवर और धार देती है।’ ‘डरेबरी कलेण्डरीमा’ गीत में पर्वतीय यातायात व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं को समय से मुहैया कराने वाले ड्राइवर- कंडक्टर के कष्टसाध्य जीवन की मार्मिक अभिव्यक्ति का विश्लेषण भी वैसी ही हृदयस्पर्शी भावप्रवणता लिए है।
‘ सदानि यनि दिन रैनी’ ही वह पहला गीत है जिससे शुरू नेगी जी की गीत यात्रा इस मुकाम तक पहुंची है। इस गीत के विषय में लिखते हुए लेखक नेगी जी की माता जी समुद्रा देवी को स्मरण करना नहीं भूलते। नेगी जी उन्हें ही हमेशा अपनी नायिका मानते रहे। उनके दिवंगत होने पर नेगी जी ने रुंधे कंठ से कहा था- मेरी नायिका हमेशा के लिए चली गई।
मेरे दिल के बहुत करीब ‘औये लछि घौर’ गीत में लेखक पर्वतीय जनजीवन में मवेशियों की महत्ता और पशुचारकों की दिनचर्या के सहज प्रसंग पाते हैं। ‘मोटर चली’ गीत के बारे में भी उनकी टिप्पणी ध्यान खींचती है, ‘गीत के जरिए उन्होंने पर्वतीय मार्गों की दुरूह यात्रा को मूर्तिमान किया, जिसमें आमफहम जीवन की बातचीत है, शिकायतें हैं, समझाइशें हैं, सलाहें हैं, नसीहतें हैं।’ ‘सुपिन्यों मा’ गीत श्रोताओं, खासकर युवा वर्ग को दूर तक रोमांचित करने वाला बताया गया है। ‘तीलू बाखरी’ गीत लेखक को भरे-पूरे गाँव के सभी मोहल्ले-टोलों की खबर लेने वाला लगता है।
नरेन्द्र सिंह नेगी जी के अप्रतिम गीति साहित्य पर केन्द्रित इस पुस्तक के विषय में अनिल के.रतूड़ी जी कहते हैं, ‘इस पुस्तक के लेखक ललित मोहन रयाल ने नरेंद्र सिंह नेगी के समग्र गीत-संसार में से, ऐसे 101 प्रतिनिधि गीतों को चुनकर शामिल किया है, जो नेगी जी के रचनात्मक विस्तार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन गीतों में निहित भावनाओं-विचारों पर गहन शोध करके लेखक ने पर्वतीय परिवेश, जनजीवन, संस्कृति जैसे विषयों को सरल, पठनीय और रुचिकर तरीके से प्रस्तुत किया है।’
विनसर पब्लिशिंग कम्पनी से प्रकाशित इस पुस्तक के आवरण चित्र के छायाचित्रकार कमल जोशी हैं। आवरण संयोजन अशोक पाण्डे द्वारा किया गया है। गढ़वाली भाषा में गीत विधा को अप्रतिम ऊंचाइयाँ देने वाले नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों पर एकाग्र 388 पृष्ठ की यह पुस्तक जहाँ शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शन का काम करेगी। वहीं गढ़वाली गीत-संगीत एवं भाषा प्रेमियों को आत्मगौरव की अनुभूति कराती हुई सांस्कृतिक विरासत को संजोने का भी काम करेगी। अमेजाॅन पर भी उपलब्ध इस पुस्तक का मूल्य 375 रुपए है। पांच दशकों तक अपने गीतों का जादू बिखेरने वाले नरेंद्र सिंह नेगी जी को गढ़-संस्कृति संरक्षण की जीती-जागती मिसाल कहने वाले लेखक ललित मोहन रयाल जी की इन बेजोड़ गीतों के साथ की गई यह आत्मीय शब्दयात्रा उनकी रचनाधर्मिता की एक अद्भुत उपलब्धि है।
लेखक – वरिष्ठ साहित्यकार है।







