Sunday, June 28, 2026
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भावना और एक विशेष अवसर का प्रतीक है – उलुऐ

By Dr. Leela chauhan

भारत की विविधता में छिपे ग्रामीण व्यंजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक है उलुऐ, जिसे जौनसार बावर में “सभी व्यंजनों का राजा” कहा जाता है। यह केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि एक परंपरा, एक भावना और एक विशेष अवसर का प्रतीक है। खासकर तब जब बेटी मायके आती है, तो उलुऐ बनाना उसके स्वागत और प्रेम को दर्शाने का माध्यम बन जाता है। हर त्योहार में उलुऐ का बनना अनिवार्य सा है। यह व्यंजन परिवार के जुड़ाव, मेहनत, सहयोग और स्वाद का मेल है। इसके स्वाद के साथ भावनाएँ जुड़ी होती हैं ।

बनाने की जटिल और श्रमसाध्य प्रक्रिया:

उलुऐ को बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और समय लेने वाली होती है। धुले चावल के आटे और उसके साथ कुछ मात्रा में गेहूं आया झोगारा डालते है इस आटे को ‘उलाड़ि’ कहा जाता है।

इसे बनाने की तीन प्रमुख विधियाँ हैं:


पहली विधि:

इस विधि में आटे को गूंथकर मोटी रोटियाँ बनाई जाती हैं। इन रोटियों को कुछ सेकंड गरम तवे पर सेंका जाता है। फिर उबलते पानी के ऊपर लकड़ी के सहारे रखकर भाप दी जाती है। इस प्रक्रिया में रोटी की बाहरी परत कुरकुरी हो जाती है और उसमें कैरेमेलाइजेशन के कारण हल्ला मीठापन आ जाता है।
करीब 20 मिनट तक स्टीम करने के बाद, रोटियों को परात में डालकर गरम-गरम ही लोटे या गिलास से गूंथा जाता है ताकि मिश्रण पूरी तरह एकसार हो जाए। फिर उसे कुछ समय के लिए ढककर रखा जाता है जिससे वह मुलायम हो जाए। इसके बाद गोले बनाए जाते हैं, जिनमें स्टफिंग भरकर दूसरी रोटी से ढक दिया जाता है। इस रोटी को नींबू या हल्दी के पत्तों से ढककर फिर से भाप में 30–40 मिनट पकाया जाता है और उसके बाद निकाल देते है अब इसका रंग हल्का पीला हो जाता है। पक जाने के बाद इसे घी के साथ परोसा जाता है।

दूसरी विधि:

इसमें चूल्हे पर बर्तन में पानी को उबाला जाता है। फिर धीरे-धीरे उसमें आटा डालते हैं और लकड़ी के हत्ते से लगातार हिलाते रहते हैं ताकि गुठलियाँ न बनें। यह प्रक्रिया 10-15 मिनट लगभग तक चलती है। इसके बाद इस मिश्रण को परात में डालकर गरम-गरम गूंथा जाता है।


स्वाद के प्रकार:

उलुऐ दो प्रकार के होते हैं:
1. नमकीन उलुऐ – इसमें उड़द या मसूर की दाल को भिगोकर सिलबट्टे पर दरदरा पीसा जाता है और उसमें नमक, मिर्च, धनिया मिलाकर स्टफिंग तैयार की जाती है।
2. मीठा उलुऐ – इसमें पोस्ता दाना , अखरोट और बंगजीर को पीसकर उसमें गुड़ का पाउडर या चीनी को मिलाया जाता है। इसका स्वाद विशेष रूप से त्योहारी अवसरों के लिए उपयुक्त होता है।

वैज्ञानिक पहलू:

पोषण मूल्य – चावल और गेहूं ऊर्जा के स्रोत हैं, दाल प्रोटीन देती है, और औखरोट आदि बीज ओमेगा-3, कैल्शियम, मैग्नीशियम व एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करते हैं। गुड़ से आयरन मिलता है।
पकाने की तकनीक – भाप में पकाने से पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और स्टार्च जेलैटिनाइज होकर आसानी से पचने योग्य बन जाता है। तवे पर सेंकने से Maillard Reaction होती है, जो हल्का मीठा, गहरा स्वाद देती है। स्वास्थ्य लाभ – यह हल्का, कम तैलीय, उच्च फाइबर व संतुलित अमीनो एसिड वाला व्यंजन है, जो पाचन सुधारता है और ऊर्जा देता है।

डॉ लीला चौहान वैज्ञानिक है

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